भारत में दलहनी फसलों की खेती किसानों की आय और मिट्टी की उर्वरता दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। इन्हीं फसलों में कुल्थी भी शामिल है। कुल्थी को देश के अलग-अलग हिस्सों में कुलथ, गहत, हुलगा और अंग्रेजी में Horse Gram के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Macrotyloma uniflorum है।
Horse Gram Farming खासतौर पर उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है जिनके पास सिंचाई के सीमित साधन हैं। कुल्थी को अपेक्षाकृत कम पानी और वर्षा आधारित परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। किसान सही किस्म, समय पर बुवाई और बेहतर फसल प्रबंधन अपनाकर इससे अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
कुल्थी क्या है और इसकी खेती क्यों की जाती है?
कुल्थी एक दलहनी फसल है। इसके दानों का उपयोग दाल और कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ बनाने में किया जाता है। इसके अलावा पौधों का इस्तेमाल पशु चारे और हरी खाद के रूप में भी किया जा सकता है। कुल्थी में प्रोटीन सहित कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। ICAR-Indian Institute of Pulses Research के अनुसार कुल्थी के दानों में लगभग 17.9 से 25.3 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जा सकता है।
इस फसल की एक बड़ी खासियत कम संसाधनों वाली खेती के लिए इसकी उपयोगिता है। खासकर वर्षा आधारित क्षेत्रों में Kulthi Cultivation किसानों के लिए दलहन उत्पादन का एक विकल्प हो सकती है।
कुल्थी की खेती के लिए कौन सी मिट्टी अच्छी है?
कुल्थी की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। हालांकि अच्छी पैदावार के लिए ऐसी मिट्टी बेहतर रहती है जिसमें पानी आसानी से निकल सके। हल्की से मध्यम दोमट, लाल और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में कुल्थी की खेती की जा सकती है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहना फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। किसानों को बुवाई से पहले मिट्टी की जांच करवानी चाहिए। इससे यह पता चलता है कि खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है और कितनी मात्रा में खाद या उर्वरक की आवश्यकता होगी। खेत तैयार करते समय मिट्टी को भुरभुरा और समतल कर लेना चाहिए। खेत में पिछली फसल के अवशेष और खरपतवार अधिक हों तो उन्हें भी साफ करना चाहिए।
किन राज्यों में होती है कुल्थी की खेती?
भारत में कुल्थी की खेती मुख्य रूप से दक्षिण, मध्य और पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में की जाती है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों में:
- कर्नाटक
- आंध्र प्रदेश
- तमिलनाडु
- ओडिशा
- महाराष्ट्र
- छत्तीसगढ़
शामिल हैं।
इसके अलावा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में भी कुल्थी की खेती देखने को मिलती है।अलग-अलग राज्यों की जलवायु और मिट्टी अलग होने के कारण Horse Gram Farming की बुवाई, किस्म और फसल प्रबंधन की सिफारिशें भी अलग हो सकती हैं। इसलिए किसान स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की सलाह जरूर लें।
कुल्थी की बुवाई का सही समय
कुल्थी की बुवाई का समय खेती के क्षेत्र, मानसून और उपलब्ध नमी पर निर्भर करता है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में इसकी बुवाई मानसून और मिट्टी में पर्याप्त नमी को ध्यान में रखकर की जाती है।
दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में कुल्थी की बुवाई अक्टूबर से नवंबर के दौरान भी की जाती है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की कुछ सिफारिशों में वर्षा आधारित कुल्थी के लिए नवंबर का समय बताया गया है। इसलिए किसान किसी एक तारीख को पूरे देश के लिए सही न मानें। अपने जिले की जलवायु और कृषि विभाग की सिफारिश के अनुसार बुवाई करना बेहतर रहता है।समय पर बुवाई करने से पौधों को मिट्टी में मौजूद नमी का फायदा मिलता है और शुरुआती बढ़वार बेहतर हो सकती है।
कुल्थी की बुवाई कैसे करें?
कुल्थी की बुवाई से पहले अच्छी गुणवत्ता और प्रमाणित बीज का चयन करें। रोगग्रस्त, टूटे हुए और खराब अंकुरण वाले बीजों से बचना चाहिए। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश के अनुसार शुद्ध कुल्थी की फसल में करीब 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल किया जा सकता है। वहां लगभग 30 सेंटीमीटर पंक्ति से पंक्ति और 10 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी की सिफारिश भी दी गई है। हालांकि बीज दर और दूरी किस्म तथा राज्य के अनुसार बदल सकती है। किसान अपने क्षेत्र की सिफारिश को प्राथमिकता दें।
कुल्थी की प्रमुख किस्में
Kulthi Cultivation में सही किस्म का चयन बेहद महत्वपूर्ण है। अलग-अलग कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों ने क्षेत्र विशेष के लिए कुल्थी की किस्में विकसित की हैं। इनमें Paiyur 1, Paiyur 2, Indira Kulthi 1 और Gujarat Dantiwada Horsegram 1 जैसी किस्मों का उल्लेख कृषि संस्थानों के दस्तावेजों में मिलता है।
उदाहरण के तौर पर Paiyur 2 लगभग 100 से 105 दिनों में और Paiyur 1 करीब 110 दिनों में तैयार हो सकती है। लेकिन किसान केवल अधिक उत्पादन के दावे को देखकर किस्म न चुनें। अपने जिले के लिए अनुशंसित और प्रमाणित किस्म को प्राथमिकता देना चाहिए।
कुल्थी की फसल में खाद कैसे दें?
कुल्थी दलहनी फसल है। फिर भी अच्छी पैदावार के लिए पौधों को संतुलित पोषण मिलना जरूरी है।
खाद और उर्वरक की सही मात्रा जानने के लिए मिट्टी परीक्षण करवाना सबसे अच्छा विकल्प है। खेत की तैयारी के समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट का उपयोग किया जा सकता है।
मिट्टी की जांच के अनुसार नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों की जरूरत पूरी की जा सकती है। दलहनी फसल होने के कारण उपयुक्त जैव उर्वरकों का उपयोग भी स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से किया जा सकता है।
बिना मिट्टी जांच के जरूरत से ज्यादा रासायनिक उर्वरक डालने से किसान का खर्च बढ़ सकता है।
कुल्थी में सिंचाई कैसे करें?
कुल्थी को मुख्य रूप से वर्षा आधारित परिस्थितियों में उगाया जाता है। इसलिए Horse Gram Farming कम सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।हालांकि फसल के अंकुरण के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होना जरूरी है। लंबे समय तक बारिश नहीं होने और खेत में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर आवश्यकता के अनुसार जीवनरक्षक सिंचाई की जा सकती है।इसके विपरीत खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए। पानी जमा होने की संभावना वाले खेतों में उचित निकासी व्यवस्था बनाना जरूरी है।
खरपतवार से कैसे बचाएं कुल्थी की फसल?
कुल्थी की शुरुआती बढ़वार के दौरान खरपतवार फसल के साथ पानी, पोषक तत्व और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। फसल के शुरुआती दिनों में खेत की निगरानी करते रहें। आवश्यकता के अनुसार हाथ से निराई या यांत्रिक गुड़ाई की जा सकती है। कुछ कृषि सिफारिशों में बुवाई के लगभग 25 से 30 दिन बाद निराई-गुड़ाई को उपयोगी बताया गया है। खरपतवारों को समय रहते नियंत्रित करने से मुख्य फसल को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह और पोषण मिल सकता है।
कुल्थी में कीट लग जाए तो कौन सी दवा डालें?
कुल्थी की फसल में क्षेत्र और मौसम के अनुसार पत्ती खाने वाले, रस चूसने वाले और फलियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट दिखाई दे सकते हैं। यहां सबसे जरूरी बात यह है कि किसान कीट दिखाई देते ही कोई भी कीटनाशक इस्तेमाल न करें। पहले यह पता लगाएं कि फसल को नुकसान पहुंचाने वाला कीट कौन सा है और उसका प्रकोप कितना है।
शुरुआती स्तर पर खेत की नियमित निगरानी, संक्रमित पौधों या अवशेषों का उचित प्रबंधन और एकीकृत कीट प्रबंधन यानी IPM अपनाना उपयोगी हो सकता है। आवश्यकता के अनुसार नीम आधारित या अन्य जैविक विकल्प भी स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
रासायनिक कीटनाशक की जरूरत पड़ने पर केवल कुल्थी और संबंधित कीट के लिए पंजीकृत उत्पाद का इस्तेमाल करें। इसकी मात्रा और छिड़काव की विधि उत्पाद के लेबल और कृषि विभाग की सिफारिश के अनुसार रखें।गलत कीटनाशक या गलत मात्रा का इस्तेमाल फसल को नुकसान पहुंचाने के साथ किसान का खर्च भी बढ़ा सकता है।
कुल्थी में रोग लगने पर क्या करें?
कुल्थी की फसल में मौसम और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग रोग दिखाई दे सकते हैं। रोगों से बचाव की शुरुआत स्वस्थ और प्रमाणित बीज से करनी चाहिए।खेत में जलभराव न होने दें और संक्रमित पौधों की समय पर पहचान करें। लगातार एक ही खेत में एक ही फसल लगाने के बजाय उचित फसल चक्र अपनाना भी उपयोगी हो सकता है।
यदि पौधों की पत्तियों पर असामान्य धब्बे दिखाई दें, पौधे अचानक सूखने लगें या फसल की बढ़वार रुक जाए तो तुरंत कृषि विशेषज्ञ से संपर्क करें। रोग की सही पहचान के बाद ही अधिकृत फफूंदनाशक या अन्य उपचार अपनाएं।
कुल्थी की फसल कब तैयार होती है?
कुल्थी की फसल तैयार होने में लगने वाला समय किस्म, मौसम और खेती के क्षेत्र पर निर्भर करता है। कुछ किस्में लगभग 100 से 110 दिनों में तैयार हो सकती हैं।जब अधिकांश फलियां पकने लगें और उनका रंग बदल जाए तो फसल कटाई के करीब होती है। बीज उत्पादन में लगभग 75 से 80 प्रतिशत फलियां पकने पर समय से कटाई की सलाह दी जाती है। कटाई के बाद फसल को अच्छी तरह सुखाएं और इसके बाद मड़ाई करें। दानों को भंडारण से पहले अच्छी तरह सुखाना जरूरी है, जिससे नमी के कारण खराब होने का खतरा कम हो।
क्या कुल्थी की खेती पर सरकारी सब्सिडी मिलती है?
कुल्थी की खेती करने वाले किसानों के लिए सरकारी सहायता राज्य, योजना और वित्तीय वर्ष के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए देश के हर किसान के लिए एक निश्चित Horse Gram Subsidy राशि बताना सही नहीं होगा।
केंद्र सरकार की National Food Security and Nutrition Mission जैसी योजनाओं के अंतर्गत दलहनी फसलों के बीज उत्पादन, प्रमाणित बीज वितरण और अन्य कृषि गतिविधियों के लिए विभिन्न प्रकार की सहायता के प्रावधान हो सकते हैं। कुल्थी भी दलहनी फसलों में शामिल है। लेकिन इसका फायदा किसान को किस रूप में मिलेगा, यह राज्य सरकार की योजना, जिले में उपलब्ध कार्यक्रम, बजट और किसान की पात्रता पर निर्भर करेगा।
किसान कुल्थी की बुवाई से पहले अपने जिले के कृषि विभाग, ब्लॉक कृषि कार्यालय या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से पता करें कि वर्तमान सीजन में प्रमाणित बीज, प्रदर्शन, कृषि यंत्र या दलहन उत्पादन से जुड़ी कोई सब्सिडी उपलब्ध है या नहीं।
कुल्थी की खेती से बेहतर उत्पादन के लिए क्या करें?
बेहतर उत्पादन के लिए किसान सबसे पहले अपने क्षेत्र के अनुसार सही किस्म चुनें। प्रमाणित बीज का इस्तेमाल करें और बुवाई सही समय पर करें। खेत में पानी की निकासी अच्छी रखें। मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद और उर्वरक दें। शुरुआती अवस्था में खरपतवारों को नियंत्रित करें और नियमित रूप से फसल का निरीक्षण करते रहें।कीट या रोग का प्रकोप दिखाई देने पर अंदाज से दवा डालने के बजाय उसकी पहचान करवाएं। सही समय पर सही उपचार करने से अनावश्यक खर्च कम किया जा सकता है। इसके अलावा बड़े क्षेत्र में Kulthi Cultivation शुरू करने से पहले किसान स्थानीय बाजार में कुल्थी की मांग और बिक्री की व्यवस्था की जानकारी भी हासिल करें।
किसानों के लिए क्यों फायदेमंद हो सकती है कुल्थी?
कुल्थी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे वर्षा आधारित और अपेक्षाकृत कम पानी वाली परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। इसके दानों का उपयोग भोजन के लिए होता है, जबकि पौधों का इस्तेमाल पशु चारे और अन्य कृषि कार्यों में भी किया जा सकता है।
ऐसे किसान जिनके खेतों में सिंचाई की सुविधा सीमित है, वे स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर Horse Gram Farming को अपने फसल चक्र में शामिल करने पर विचार कर सकते हैं।
निष्कर्ष
कुल्थी भारत की महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में से एक है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इसकी खेती प्रमुख रूप से की जाती है। इसके अलावा देश के कई अन्य क्षेत्रों में भी किसान कुल्थी उगाते हैं।
सफल Kulthi Cultivation के लिए सही मिट्टी, प्रमाणित बीज, क्षेत्र के अनुकूल किस्म, समय पर बुवाई, जल निकासी और संतुलित पोषण पर ध्यान देना जरूरी है। फसल में कीट या रोग दिखाई देने पर बिना पहचान के रासायनिक दवा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
वहीं Horse Gram Subsidy की उपलब्धता राज्य और सरकारी योजना के अनुसार बदल सकती है। किसान बुवाई से पहले अपने स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से वर्तमान योजनाओं की जानकारी जरूर प्राप्त करें।

