Lobia Ki Kheti: कम समय में तैयार होने वाली दलहनी फसलों की बात करें तो लोबिया किसानों के लिए एक उपयोगी विकल्प है। इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में दलहन, हरी सब्जी, पशुओं के चारे और हरी खाद के रूप में उगाया जाता है। लोबिया को अंग्रेजी में Cowpea और कई इलाकों में चवली या बरबटी के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खास बात यह है कि इसे खरीफ के अलावा उपयुक्त सिंचाई और जलवायु वाले क्षेत्रों में गर्मी तथा कुछ दक्षिणी राज्यों में रबी मौसम में भी उगाया जा सकता है।
लोबिया शुष्क और अर्ध-शुष्क परिस्थितियों में भी अच्छी तरह बढ़ सकती है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में बनने वाली गांठें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में उपलब्ध कराने में मदद करती हैं। इस वजह से फसल चक्र में लोबिया को शामिल करना मिट्टी की उर्वरता के लिए भी फायदेमंद हो सकता है। ICAR-भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के अनुसार लोबिया खरीफ की महत्वपूर्ण फसल है और इसे गर्मी तथा सर्दी के मौसम में भी विभिन्न क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। (ICAR IIPR)
इस आर्टिकल में जानते हैं कि लोबिया की खेती कैसे करें, इसके लिए कौन सी मिट्टी अच्छी है, लोबिया की बुवाई कब करनी चाहिए, इसकी खेती किन राज्यों में होती है, कीटों से फसल को कैसे बचाएं और किसानों को सरकारी योजनाओं के तहत किस प्रकार सहायता मिल सकती है।
लोबिया की खेती के लिए कैसी मिट्टी होनी चाहिए?
लोबिया की अच्छी पैदावार के लिए जल निकासी वाली मिट्टी सबसे जरूरी है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने पर पौधों की जड़ों और फसल की बढ़वार पर बुरा असर पड़ सकता है। अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयोगी मानी जाती है। जैविक पदार्थ वाली मिट्टी सब्जी वाली लोबिया के लिए विशेष रूप से अच्छी रहती है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के कृषि पोर्टल पर भी सब्जी वाली लोबिया के लिए अच्छी जल निकासी और अधिक जैविक पदार्थ वाली मिट्टी की सलाह दी गई है। (Agritech TNAU)
किसान बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच जरूर करा सकते हैं। Soil Health Card या मिट्टी जांच रिपोर्ट के आधार पर ही खाद और उर्वरक की मात्रा तय करना बेहतर होता है। इससे अनावश्यक उर्वरक पर होने वाला खर्च कम किया जा सकता है।
खेत तैयार करते समय मिट्टी को भुरभुरा बनाएं और पिछली फसल के अवशेष तथा खरपतवार हटा दें। जहां पानी रुकने की आशंका हो, वहां उचित नालियां बनाकर जल निकासी की व्यवस्था करें।
किन राज्यों में होती है लोबिया की खेती?
लोबिया भारत के कई हिस्सों में उगाई जाती है। इसकी खेती का मौसम और उद्देश्य क्षेत्र के अनुसार बदल सकता है। देश में राजस्थान, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात के शुष्क तथा अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में इसकी खेती देखने को मिलती है। इसके अलावा पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी किसान इसे खरीफ और गर्मी के मौसम में उगाते हैं। (ARCC Journals)
ICAR-भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के अनुसार ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में भी लोबिया की खेती की संभावना है। प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में इसे रबी में भी उगाया जा सकता है। (ICAR IIPR)
इसलिए किसान को केवल राज्य के आधार पर बुवाई का फैसला नहीं करना चाहिए। स्थानीय तापमान, वर्षा, सिंचाई की सुविधा और कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह को ध्यान में रखना चाहिए।
लोबिया की बुवाई का सही समय क्या है?
लोबिया की बुवाई का समय इस बात पर निर्भर करता है कि किसान इसे खरीफ, गर्मी या सिंचित फसल के रूप में लगा रहे हैं।
खरीफ की फसल: मानसून की शुरुआत के साथ जून से जुलाई का समय कई क्षेत्रों में उपयुक्त रहता है। पर्याप्त नमी मिलने पर बीज का अंकुरण तेजी से होता है।
गर्मी की फसल: सिंचाई की सुविधा होने पर कई क्षेत्रों में फरवरी से मार्च के दौरान इसकी बुवाई की जा सकती है।
दक्षिण और प्रायद्वीपीय भारत: यहां जलवायु के अनुसार लोबिया खरीफ के साथ कुछ क्षेत्रों में रबी मौसम में भी ली जाती है। (ICAR IIPR)
सब्जी वाली लोबिया के लिए तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने वर्षा आधारित खेती में जून-जुलाई और सिंचित परिस्थितियों में फरवरी-मार्च का समय बताया है। (Agritech TNAU) किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि स्थानीय परिस्थितियों के कारण बुवाई की तारीख में बदलाव हो सकता है। इसलिए अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र यानी KVK या राज्य कृषि विभाग की स्थानीय सिफारिश को प्राथमिकता दें।
कितने बीज की जरूरत पड़ती है?
बीज की मात्रा किस्म, फसल के उद्देश्य और बुवाई की दूरी के अनुसार बदलती है। सब्जी वाली लोबिया के लिए करीब 20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की सिफारिश कुछ कृषि पैकेज में की गई है। वहीं ICAR द्वारा विकसित काशी निधि जैसी किस्म के लिए 20 से 25 किलो प्रति हेक्टेयर बीज दर बताई गई है। (Agritech TNAU) किसान प्रमाणित और स्वस्थ बीज को प्राथमिकता दें। बीज खरीदते समय उसकी किस्म, अंकुरण क्षमता, पैकिंग और वैधता की जांच करना भी जरूरी है।
लोबिया की प्रमुख उन्नत किस्में
लोबिया की किस्म का चयन किसान को अपने क्षेत्र और खेती के उद्देश्य के अनुसार करना चाहिए। हरी फली के लिए लगाई जाने वाली किस्म और दाने के लिए लगाई जाने वाली किस्म अलग हो सकती है। सब्जी वाली लोबिया की कुछ प्रचलित किस्मों में पूसा कोमल, अर्का गरिमा, PKM-1, CO-2 और VBN-2 आदि शामिल हैं। (Agritech TNAU)
इसके अलावा ICAR-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित काशी निधि भी महत्वपूर्ण किस्म है। ICAR के अनुसार यह जल्दी तैयार होने वाली किस्म है, जिसमें बुवाई के लगभग 35 से 40 दिनों बाद फूल आने लगते हैं और करीब 50 से 55 दिनों में हरी फलियों की तुड़ाई शुरू हो सकती है। इसकी संभावित हरी फली उपज 140 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है। यह Cowpea Golden Mosaic Virus के प्रति प्रतिरोधी भी बताई गई है। (Indian Council of Agricultural Research) किसान अपने क्षेत्र के लिए अधिसूचित किस्म का ही चुनाव करें, क्योंकि एक किस्म का प्रदर्शन सभी राज्यों और मौसमों में समान होना जरूरी नहीं है।
बीज उपचार क्यों है जरूरी?
बुवाई से पहले बीज उपचार करने से शुरुआती अवस्था में फसल को कई समस्याओं से बचाने में मदद मिल सकती है। दलहनी फसल होने के कारण लोबिया के बीज को उपयुक्त Rhizobium culture से उपचारित करने की सलाह दी जाती है। सब्जी वाली लोबिया के लिए TNAU ने 20 किलो बीज पर 600 ग्राम Rhizobium bacterial culture का उल्लेख किया है। (Agritech TNAU) जैव उर्वरक या अन्य बीज उपचार करते समय उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश का पालन करें।
लोबिया में खाद और उर्वरक प्रबंधन
लोबिया दलहनी फसल है, इसलिए दूसरी कई फसलों की तुलना में इसकी नाइट्रोजन की जरूरत अलग होती है। फिर भी शुरुआती विकास के लिए संतुलित पोषण जरूरी है। उर्वरकों की मात्रा तय करने का सबसे अच्छा तरीका मिट्टी परीक्षण है। खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट डालने से जैविक पदार्थ बढ़ाया जा सकता है।
सिंचित और असिंचित फसल में उर्वरक की आवश्यकता अलग-अलग हो सकती है। TNAU के दलहनी लोबिया पैकेज में वर्षा आधारित परिस्थितियों में 12.5 किलो नाइट्रोजन, 25 किलो फॉस्फोरस, 12.5 किलो पोटाश और 10 किलो सल्फर प्रति हेक्टेयर तथा सिंचित फसल में इनकी अधिक मात्रा की सिफारिश दी गई है। (Agritech TNAU) हालांकि किसानों को इसे पूरे देश के लिए एक निश्चित मात्रा न मानकर अपने राज्य की सिफारिश और Soil Test Report के अनुसार खाद देनी चाहिए।
सिंचाई का रखें विशेष ध्यान
खरीफ में अच्छी बारिश होने पर सिंचाई की आवश्यकता कम हो सकती है। लेकिन बारिश में लंबा अंतर आने पर जरूरत के अनुसार सिंचाई करनी पड़ सकती है। सिंचित फसल में बुवाई के तुरंत बाद पानी दिया जा सकता है। इसके बाद मिट्टी और मौसम देखकर सिंचाई करें। फूल आने और फलियां बनने की अवस्था पानी की दृष्टि से महत्वपूर्ण होती है। साथ ही खेत में पानी जमा न होने दें। TNAU के अनुसार सिंचित लोबिया में मिट्टी और मौसम के आधार पर करीब 7 से 10 दिनों के अंतर पर सिंचाई की जा सकती है। (Agritech TNAU)
खरपतवार नियंत्रण कैसे करें?
शुरुआती दिनों में खरपतवार लोबिया के पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए खेत को शुरुआती अवस्था में खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है। छोटे खेतों में किसान निराई-गुड़ाई कर सकते हैं। TNAU के अनुसार यदि खरपतवारनाशी का प्रयोग नहीं किया जाता है तो बुवाई के लगभग 15 और 30 दिन बाद निराई की जा सकती है। (Agritech TNAU) रासायनिक खरपतवारनाशी का उपयोग केवल संबंधित फसल के लिए वर्तमान में स्वीकृत उत्पाद, लेबल निर्देश और स्थानीय कृषि अधिकारी की सलाह के अनुसार करें।
लोबिया में कौन-कौन से कीट लग सकते हैं?
लोबिया की फसल में माहू यानी एफिड, फली छेदक, स्पॉटेड पॉड बोरर, लीफ हॉपर और पॉड बग जैसे कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। कीट दिखते ही सीधे कीटनाशक छिड़कना सही तरीका नहीं है। पहले कीट की सही पहचान और नुकसान का स्तर देखें।
फली छेदक के प्रबंधन में खेत की नियमित निगरानी, पक्षियों के बैठने के लिए बर्ड पर्च, फेरोमोन ट्रैप और जैविक विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सकता है। TNAU के अनुसार ग्राम पॉड बोरर के प्रबंधन में नीम आधारित उत्पाद, Bacillus thuringiensis (Bt) और जरूरत पड़ने पर पंजीकृत कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। (Agritech TNAU)
गंभीर फली छेदक प्रकोप में कृषि विशेषज्ञ की सलाह पर संबंधित फसल और कीट के लिए वर्तमान में पंजीकृत Emamectin benzoate 5% SG, Indoxacarb 15.8% SC या Chlorantraniliprole 18.5% SC जैसे विकल्पों में से उपयुक्त उत्पाद चुना जा सकता है। TNAU के cowpea pest-management package में इन सक्रिय तत्वों का उल्लेख किया गया है। (Agritech TNAU)
पॉड बग के लिए भी TNAU के पैकेज में Imidacloprid 17.8 SL और Thiamethoxam 25% WG सहित कुछ विकल्प दिए गए हैं। (Agritech TNAU)
महत्वपूर्ण सावधानी: कीटनाशक का नाम देखकर खुद मात्रा तय न करें। अलग-अलग फॉर्मुलेशन की मात्रा अलग होती है और पंजीकरण/सिफारिशें समय के साथ बदल सकती हैं। केवल भारत में लोबिया और संबंधित कीट के लिए वर्तमान में पंजीकृत उत्पाद का इस्तेमाल करें। लेबल पर दी गई मात्रा, प्रतीक्षा अवधि और सुरक्षा निर्देशों का पालन करें तथा अपने जिले के कृषि अधिकारी या KVK से पुष्टि करें। मित्र कीट और प्राकृतिक शत्रु मौजूद हों तो अनावश्यक छिड़काव से बचें।
लोबिया की फसल में रोग से कैसे करें बचाव?
लोबिया में पाउडरी मिल्ड्यू और मोजेक जैसे रोग भी दिखाई दे सकते हैं। वायरस जनित रोगों में रोगी पौधों को समय पर पहचानना और रोग फैलाने वाले वाहक कीटों का प्रबंधन महत्वपूर्ण है। किसान रोग प्रतिरोधी किस्मों को प्राथमिकता दे सकते हैं। उदाहरण के तौर पर ICAR की काशी निधि को Cowpea Golden Mosaic Virus के प्रति प्रतिरोधी बताया गया है। (Indian Council of Agricultural Research)
फसल में पत्तियों का रंग असामान्य होने, पौधों की वृद्धि रुकने, पत्तियों पर धब्बे या सफेद पाउडर जैसा पदार्थ दिखाई देने पर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से रोग की पहचान करवाएं। गलत पहचान के आधार पर दवा डालने से खर्च बढ़ सकता है और फायदा नहीं मिलता।
लोबिया की फसल कब तैयार होती है?
फसल तैयार होने का समय किस्म और उसके उपयोग पर निर्भर करता है। हरी सब्जी के लिए उगाई गई जल्दी तैयार होने वाली किस्मों में करीब 40 से 55 दिनों के आसपास पहली तुड़ाई शुरू हो सकती है। TNAU ने सब्जी वाली लोबिया में लगभग 40 से 50 दिन में कोमल फलियों की तुड़ाई शुरू होने का उल्लेख किया है। (Agritech TNAU)
काशी निधि में ICAR ने 50 से 55 दिनों में तुड़ाई के लिए तैयार होने की जानकारी दी है। (Indian Council of Agricultural Research) दाने के लिए उगाई गई फसल को फलियां पूरी तरह पकने और सूखने के बाद काटना चाहिए। अलग-अलग किस्मों की अवधि अलग हो सकती है।
क्या लोबिया की खेती पर किसानों को सब्सिडी मिलती है?
किसानों के लिए यह समझना जरूरी है कि लोबिया के नाम से पूरे भारत में हर किसान को एक निश्चित राशि की सीधी सब्सिडी मिलना जरूरी नहीं है। सहायता केंद्र और राज्य सरकार की चल रही योजनाओं, जिले तथा उपलब्ध घटकों पर निर्भर करती है।
दलहनी फसलों को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाओं में समय-समय पर प्रमाणित बीज, प्रदर्शन, पोषक तत्व प्रबंधन, जैव उर्वरक और Integrated Pest Management यानी IPM जैसे घटकों के लिए सहायता का प्रावधान किया जाता रहा है। NFSM के दलहन कार्यक्रम के दस्तावेजों में cowpea यानी लोबिया को भी दलहनी फसलों के प्रदर्शन और उन्नत किस्मों के प्रसार से जुड़े हस्तक्षेपों में शामिल किया गया है। (National Food Security Mission)
NFSM के उपलब्ध दिशा-निर्देशों में प्रमाणित दलहन बीज वितरण, Integrated Nutrient Management और Integrated Pest Management जैसे घटकों के लिए सहायता का प्रावधान भी दर्ज है। हालांकि सहायता की वास्तविक दर, पात्रता और उपलब्धता राज्य तथा योजना वर्ष के अनुसार बदल सकती है। (National Food Security Mission)
इसलिए किसान जिला कृषि विभाग, ब्लॉक कृषि कार्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), राज्य के DBT कृषि पोर्टल या नजदीकी कृषि अधिकारी से मौजूदा योजना की जानकारी लें। बीज खरीदने या किसी योजना में आवेदन करने से पहले यह जरूर जांचें कि उस समय उनके जिले में लोबिया या दलहन के लिए कौन-सा घटक खुला है।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
लोबिया कम अवधि में तैयार होने वाली उपयोगी दलहनी फसल है। अच्छी पैदावार के लिए किसान प्रमाणित और क्षेत्र के अनुकूल किस्म चुनें, सही समय पर बुवाई करें और खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें। बुवाई से पहले मिट्टी की जांच और बीज उपचार पर ध्यान दें।
फसल में कीट या बीमारी दिखाई देने पर तुरंत कई तरह की दवाओं का मिश्रण करने के बजाय पहले समस्या की सही पहचान करें। जहां संभव हो वहां जैविक और एकीकृत कीट प्रबंधन को प्राथमिकता दें। रासायनिक कीटनाशक की जरूरत होने पर केवल संबंधित फसल और कीट के लिए पंजीकृत उत्पाद को लेबल और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही इस्तेमाल करें।
सही किस्म, समय पर बुवाई, संतुलित पोषण, उचित सिंचाई और समय पर कीट-रोग प्रबंधन अपनाकर किसान लोबिया को सब्जी, दलहन, चारे या फसल चक्र के एक उपयोगी विकल्प के रूप में अपना सकते हैं।

