भारत सरकार ने देश में ग्रीन यूरिया उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) के तहत ग्रीन अमोनिया आधारित यूरिया उत्पादन के लिए विस्तृत रोडमैप तैयार किया है। इस पहल का उद्देश्य आयातित यूरिया पर भारत की निर्भरता कम करना, उर्वरक उद्योग को पर्यावरण के अनुकूल बनाना और वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करना है।
इसी दिशा में उर्वरक विभाग (Department of Fertilizers) ने देश में ग्रीन यूरिया संयंत्र स्थापित करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया है। हाल ही में नोएडा स्थित प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (PDIL) के मुख्यालय में एक उच्च स्तरीय प्री-ईओआई बैठक भी आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव एवं पीडीआईएल के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक के.के. पाठक ने की। इसमें एनटीपीसी, सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI), प्रमुख उर्वरक कंपनियों, तकनीकी प्रदाताओं, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माताओं तथा ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया क्षेत्र से जुड़े उद्योग प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
हर साल खरीदा जाएगा 7.24 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया
सरकार की योजना के अनुसार राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत प्रतिवर्ष 7.24 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया की खरीद की जाएगी। इस ग्रीन अमोनिया का उपयोग देश के उर्वरक संयंत्रों में ग्रीन यूरिया के उत्पादन के लिए किया जाएगा। इसका उद्देश्य पारंपरिक प्राकृतिक गैस आधारित ग्रे अमोनिया की जगह स्वच्छ ऊर्जा से तैयार ग्रीन अमोनिया का उपयोग बढ़ाना है।
ग्रीन अमोनिया का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार ग्रीन हाइड्रोजन के माध्यम से किया जाता है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन काफी कम होता है और उर्वरक उद्योग के डीकार्बोनाइजेशन को गति मिलती है।
सरकार देगी लागत का अंतर
ग्रीन अमोनिया की उत्पादन लागत फिलहाल पारंपरिक ग्रे अमोनिया की तुलना में अधिक है। इस चुनौती को देखते हुए सरकार ने एक विशेष सब्सिडी व्यवस्था का प्रस्ताव तैयार किया है।
इसके तहत सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) ग्रीन अमोनिया उत्पादकों से इसकी खरीद करेगा और उसे घरेलू उर्वरक कंपनियों को ग्रे अमोनिया के बाजार मूल्य पर उपलब्ध कराएगा। ग्रीन अमोनिया की वास्तविक लागत और बाजार मूल्य के बीच का अंतर उर्वरक विभाग वहन करेगा। इससे उर्वरक कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा और ग्रीन यूरिया उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
10 वर्षों तक मिलेगा प्रोत्साहन
ग्रीन अमोनिया की खरीद प्रतिस्पर्धी ई-रिवर्स नीलामी के माध्यम से की जाएगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि चयनित परियोजनाओं को वाणिज्यिक आपूर्ति शुरू होने की तारीख से 10 वर्षों तक प्रोत्साहन दिया जाएगा। इससे निवेशकों और परियोजना डेवलपर्स को दीर्घकालिक स्थिरता मिलेगी और ग्रीन यूरिया क्षेत्र में बड़े निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
इस योजना के अंतर्गत निर्माणाधीन और परिचालन दोनों प्रकार की परियोजनाएं पात्र होंगी।
19,744 करोड़ रुपये का मिलेगा समर्थन
नई एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत लगभग 19,744 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रहा है। इस राशि का उपयोग ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, ग्रीन अमोनिया उत्पादन और आवश्यक ऊर्जा अवसंरचना विकसित करने में किया जाएगा। इससे भारत में स्वच्छ ऊर्जा आधारित औद्योगिक विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है।
क्यों जरूरी है ग्रीन यूरिया?
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ताओं में शामिल है। इसके बावजूद देश हर वर्ष लगभग एक करोड़ मीट्रिक टन यूरिया का आयात करता है। इसके अलावा कई घरेलू यूरिया संयंत्र 30 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं, जिनकी ऊर्जा दक्षता भी अपेक्षाकृत कम है।
ऐसे में सरकार का मानना है कि नई ग्रीन यूरिया परियोजनाएं न केवल आयात पर निर्भरता कम करेंगी, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत बनाएंगी। साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर तकनीक और ग्रीन अमोनिया आधारित एकीकृत परियोजनाएं भविष्य के उर्वरक उद्योग का आधार बन सकती हैं।
किसानों और देश को होगा लाभ
ग्रीन यूरिया उत्पादन बढ़ने से लंबे समय में भारत की उर्वरक आत्मनिर्भरता मजबूत होगी। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, आयात पर निर्भरता घटेगी और वैश्विक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर भी कम होगा। इसके अलावा स्वच्छ उत्पादन तकनीकों के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने के भारत के प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना निर्धारित समय पर सफलतापूर्वक लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में भारत ग्रीन यूरिया उत्पादन में वैश्विक स्तर पर अग्रणी देशों में शामिल हो सकता है। यह पहल न केवल उर्वरक क्षेत्र बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, औद्योगिक विकास और टिकाऊ कृषि के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।

