देश के कई राज्यों में किसानों का गुस्सा एक बार फिर सड़कों पर दिखाई दिया है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में किसानों ने यूरिया उर्वरक की कथित कमी, बढ़ती खेती लागत और प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विरोध में प्रदर्शन किए। ऑल इंडिया किसान मजदूर मोर्चा (KMM) के आह्वान पर आयोजित इन प्रदर्शनों में किसानों ने केंद्र सरकार के पुतले जलाकर अपनी नाराजगी जाहिर की और कृषि क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर तत्काल कार्रवाई की मांग की।
किसानों का सबसे बड़ा आरोप यूरिया उर्वरक की उपलब्धता को लेकर है। उनका कहना है कि सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया नहीं मिल रहा है। कई क्षेत्रों में किसानों को अपनी जरूरत के अनुसार उर्वरक प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। किसान संगठनों का आरोप है कि कुछ निजी डीलर इस स्थिति का फायदा उठाकर यूरिया की ब्लैक मार्केटिंग कर रहे हैं, जिससे किसानों को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।
किसान नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कई सहकारी समितियां और उर्वरक वितरण केंद्र किसानों को यूरिया खरीदने के साथ-साथ नैनो यूरिया और अन्य उत्पाद भी खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि उनकी वास्तविक आवश्यकता पारंपरिक यूरिया की है, लेकिन उन्हें अतिरिक्त उत्पाद लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है और खेती की लागत में अनावश्यक वृद्धि हो रही है।
ऑल इंडिया किसान मजदूर मोर्चा का कहना है कि कृषि विभाग इस संकट से निपटने में पूरी तरह विफल रहा है। संगठन ने मांग की है कि सरकार किसानों को उनकी आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराए और कालाबाजारी करने वाले तत्वों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करे। किसानों का मानना है कि यदि समय पर उर्वरक उपलब्ध नहीं हुआ तो फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है, जिसका असर देश की खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
उर्वरक संकट के अलावा किसानों ने डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों को भी गंभीर चिंता का विषय बताया। कृषि कार्यों में डीजल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि अधिकांश कृषि मशीनरी और सिंचाई उपकरण डीजल पर निर्भर हैं। डीजल की कीमतों में लगातार वृद्धि से खेती की लागत तेजी से बढ़ रही है। इसके अलावा घरेलू गैस सिलेंडर की महंगाई का असर ग्रामीण परिवारों के बजट पर भी पड़ रहा है।
किसानों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने के बावजूद देश के उपभोक्ताओं और किसानों को अपेक्षित राहत नहीं मिल रही है। इससे किसानों में असंतोष बढ़ रहा है। उनका कहना है कि सरकार को ईंधन की कीमतों में राहत देकर कृषि क्षेत्र को समर्थन देना चाहिए, ताकि उत्पादन लागत को नियंत्रित किया जा सके।
प्रदर्शन कर रहे किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। उनका कहना है कि फसलों के MSP में बहुत सीमित बढ़ोतरी की जा रही है, जबकि बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीजल और अन्य कृषि आदानों की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसी स्थिति में किसानों की आय और लागत के बीच संतुलन बिगड़ता जा रहा है। किसान संगठनों का मानना है कि MSP निर्धारण में वास्तविक उत्पादन लागत और बढ़ती महंगाई को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
इसके साथ ही किसानों ने प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि यदि इस समझौते के तहत कृषि उत्पादों के आयात को अधिक छूट दी गई तो भारतीय किसानों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। किसान संगठनों का आरोप है कि इससे घरेलू कृषि बाजार प्रभावित होगा और छोटे तथा मध्यम किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है।
कुल मिलाकर किसानों के हालिया प्रदर्शन केवल यूरिया की कमी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह कृषि क्षेत्र से जुड़े कई व्यापक मुद्दों को सामने लाते हैं। उर्वरक उपलब्धता, बढ़ती उत्पादन लागत, MSP, ईंधन की कीमतें और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते जैसे विषय आज किसानों की प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं। किसान संगठनों का कहना है कि यदि इन समस्याओं का समय रहते समाधान नहीं किया गया तो देश का कृषि क्षेत्र गंभीर चुनौतियों का सामना कर सकता है। इसलिए सरकार और संबंधित विभागों के लिए आवश्यक है कि वे किसानों की मांगों पर गंभीरता से विचार करें और कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।

