भारत के किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बाधाओं के कारण पिछले कुछ महीनों से उर्वरकों और उनके कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित हो रही थी। अब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य होती दिखाई दे रही है। 0.7 मिलियन टन (7 लाख टन) से अधिक उर्वरक और कच्चा माल लेकर 15 बड़े मालवाहक जहाज़ होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर चुके हैं और जल्द ही भारत के विभिन्न बंदरगाहों पर पहुँचने वाले हैं। इससे खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता और सरकारी भंडार दोनों को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
15 जहाज़ों में क्या-क्या है?
सूत्रों के अनुसार, भारत की ओर आने वाले इन 15 जहाज़ों में अलग-अलग प्रकार के उर्वरक और कच्चा माल लदा हुआ है।
- 8 जहाज़ लगभग 0.33 मिलियन टन यूरिया लेकर आ रहे हैं।
- 4 जहाज़ों में करीब 0.25 मिलियन टन डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) है।
- 3 जहाज़ लगभग 0.11 मिलियन टन सल्फर लेकर भारत आ रहे हैं।
सल्फर उर्वरक उद्योग का एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है, जिसका उपयोग विशेष रूप से फॉस्फेटिक उर्वरकों के निर्माण में किया जाता है। वहीं यूरिया और DAP भारत में सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले उर्वरकों में शामिल हैं।
पाँच और जहाज़ भी जल्द पहुँचेंगे
सरकारी सूत्रों का कहना है कि केवल यही 15 जहाज़ नहीं, बल्कि पाँच और जहाज़ भी जल्द ही होर्मुज जलडमरूमध्य पार करने वाले हैं। इन जहाज़ों में अमोनिया, सल्फर और यूरिया लदा हुआ है। अमोनिया यूरिया उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल माना जाता है। इन अतिरिक्त खेपों के भारत पहुँचने के बाद सरकारी उर्वरक भंडार और मजबूत हो जाएगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से मिली राहत
करीब 22 जून 2026 के आसपास होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही सामान्य होने के बाद पहले ही चार जहाज़ लगभग 0.18 मिलियन टन विभिन्न प्रकार के उर्वरक लेकर भारत के लिए रवाना हो चुके थे। अब लगातार जहाज़ों की आवाजाही शुरू होने से सप्लाई चेन सामान्य होती दिखाई दे रही है।
दरअसल, फरवरी 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर आवाजाही प्रभावित हुई थी। इसका असर केवल उर्वरकों पर ही नहीं, बल्कि LNG, अमोनिया और अन्य कच्चे माल की वैश्विक आपूर्ति पर भी पड़ा था।
LNG की आपूर्ति पर भी पड़ा असर
भारत में बनने वाले यूरिया का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस पर आधारित है। पहले घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए आवश्यक लगभग 50 प्रतिशत LNG कतर से एक दीर्घकालिक समझौते के तहत आयात की जाती थी। पश्चिम एशिया संकट के कारण इस आपूर्ति में भी बाधा आई, जिससे सरकार और उर्वरक कंपनियों को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़े।
हालांकि सरकार ने समय रहते अन्य देशों से आयात की व्यवस्था कर स्थिति को नियंत्रण में रखा, जिससे किसानों को किसी बड़े संकट का सामना नहीं करना पड़ा।
आयात के स्रोतों में विविधता
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में उर्वरक आयात के लिए केवल एक या दो देशों पर निर्भर रहने की रणनीति को बदल दिया है। अब यूरिया कई देशों से खरीदा जा रहा है, जिनमें ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्की और नीदरलैंड शामिल हैं।
इसी प्रकार DAP और NPK उर्वरकों का आयात रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से किया जा रहा है। इससे किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर पूरे देश की उर्वरक आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा कम हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आयात स्रोतों का यह विविधीकरण भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त स्टॉक
सरकारी अधिकारियों के अनुसार वर्तमान खरीफ सीजन में उर्वरकों की कोई कमी नहीं होने वाली है। देश में सरकारी स्तर पर लगभग 16.33 मिलियन टन उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध है। दूसरी ओर किसान खरीफ फसलों की बुवाई के लिए अब तक 16 मिलियन टन से अधिक उर्वरकों की खरीद कर चुके हैं।
आने वाले जहाज़ों से मिलने वाली नई खेप इस स्टॉक को और मजबूत बनाएगी। इससे राज्यों में समय पर उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित करने में आसानी होगी और किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी।
यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बड़ी गिरावट
उर्वरक क्षेत्र के लिए एक और सकारात्मक संकेत अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में आई भारी गिरावट है। पिछले एक महीने के दौरान वैश्विक कीमतों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) को हाल ही में 1.7 मिलियन टन यूरिया आयात करने के लिए 444.9 से 449.3 डॉलर प्रति टन की लैंडेड कॉस्ट पर बोलियां प्राप्त हुईं। यह कीमत पहले हुए अनुबंधों की तुलना में काफी कम है।
इससे पहले इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) द्वारा जारी एक टेंडर में 2.5 मिलियन टन यूरिया की आपूर्ति के लिए लगभग 935 से 959 डॉलर प्रति टन की दर सामने आई थी। यानी वर्तमान कीमतें पहले के मुकाबले आधी से भी कम रह गई हैं।
सब्सिडी का बोझ हो सकता है कम
यूरिया की वैश्विक कीमतों में गिरावट का सीधा लाभ केंद्र सरकार को भी मिल सकता है। भारत में किसानों को उर्वरक नियंत्रित कीमतों पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार हर वर्ष भारी सब्सिडी देती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें इसी तरह नीचे बनी रहती हैं, तो चालू वित्त वर्ष के दौरान सरकार को उर्वरक सब्सिडी पर अपेक्षाकृत कम खर्च करना पड़ सकता है। ऐसे में वित्त मंत्रालय और उर्वरक विभाग सब्सिडी की आवश्यकता का दोबारा आकलन कर सकते हैं।
उत्पादन और खपत दोनों में बढ़ोतरी
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश में लगभग 52 मिलियन टन उर्वरकों का उत्पादन हुआ, जबकि कुल खपत लगभग 72.5 मिलियन टन रही। इसका अर्थ है कि घरेलू मांग पूरी करने के लिए भारत को अब भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की स्थिति, कच्चे माल की उपलब्धता और वैश्विक कीमतें भारत की कृषि व्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालती हैं।
किसानों के लिए क्या है इसका महत्व?
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर उर्वरकों की उपलब्धता खरीफ सीजन में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलों की उत्पादकता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। यदि उर्वरक समय पर उपलब्ध रहते हैं और कीमतें नियंत्रित रहती हैं, तो किसानों को खेती की लागत नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाज़ों की आवाजाही सामान्य होने, आयात स्रोतों में विविधता और अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में गिरावट—इन तीनों घटनाओं ने मिलकर भारत की उर्वरक आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत किया है। इससे न केवल खरीफ सीजन में किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है, बल्कि सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी कम हो सकता है। आने वाले महीनों में यदि वैश्विक परिस्थितियाँ स्थिर रहती हैं, तो देश में उर्वरकों की उपलब्धता और कीमत दोनों संतुलित रहने की संभावना है।
