टिकाऊ खेती और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए जैविक तरीकों को बढ़ावा देने की दिशा में Punjab Agricultural University ने एक महत्वपूर्ण पहल की। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ऑर्गेनिक एंड नेचुरल फार्मिंग की ओर से Punjab Agricultural Management and Extension Training Institute में “वर्मी-कम्पोस्टिंग और मिट्टी का स्वास्थ्य” विषय पर एक विशेषज्ञ व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि विशेषज्ञों, छात्रों और अन्य हितधारकों को जैविक कचरा प्रबंधन और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के महत्व के बारे में जागरूक करना था।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध पर्यावरण वैज्ञानिक और पारिस्थितिकी विशेषज्ञ Sultan Ahmed Ismail थे। उन्होंने कई दशकों तक केंचुआ विज्ञान, वर्मी-कम्पोस्टिंग और जैविक कचरे के पुनर्चक्रण पर शोध और जागरूकता कार्य किया है। उनके प्रयासों ने किसानों के बीच केंचुओं के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और जैविक कचरे के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है।
कार्यक्रम की शुरुआत में K. B. Singh ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि आधुनिक कृषि में पारिस्थितिक दृष्टिकोण को अपनाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि वर्मी-कम्पोस्टिंग जैसी टिकाऊ तकनीकें मिट्टी की सेहत को सुधारने, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को बढ़ाने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।
अपने व्याख्यान में डॉ. सुल्तान अहमद इस्माइल ने वर्मी-कम्पोस्टिंग के वैज्ञानिक आधार और उसके व्यावहारिक उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि केंचुए जैविक कचरे को पोषक तत्वों से भरपूर खाद में बदल देते हैं, जिसे वर्मी-कम्पोस्ट कहा जाता है। यह खाद मिट्टी की संरचना सुधारने के साथ-साथ पौधों की वृद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
उन्होंने “वर्मी-वॉश” की अवधारणा पर भी प्रकाश डाला, जो वर्मी-कम्पोस्टिंग प्रणाली से प्राप्त एक तरल जैविक घोल होता है। यह घोल पौधों की वृद्धि को बढ़ाने और मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को मजबूत करने में मदद करता है। डॉ. इस्माइल ने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही टिकाऊ कृषि की बुनियाद है और किसानों को मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक एवं प्राकृतिक समाधानों को अपनाना चाहिए।
इस दौरान Umendra Dutt ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल खेती की ओर बढ़ना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। वर्मी-कम्पोस्टिंग जैसी पहलें किसानों की उत्पादन लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
कार्यक्रम के अंत में S. S. Walia ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के व्याख्यान किसानों, छात्रों और कृषि विशेषज्ञों के बीच टिकाऊ एवं जैविक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाने में बेहद उपयोगी साबित होते हैं।
इस कार्यक्रम का संचालन और समन्वय Amandeep Singh Sidhu ने किया। उन्होंने प्रतिभागियों और विशेषज्ञ वक्ता के बीच संवाद को भी सुगम बनाया, जिससे उपस्थित लोगों को विषय से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुईं।

