देश में वन प्रबंधन को अधिक पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए National Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority (राष्ट्रीय प्राधिकरण सीएएमपीए) ने ‘वन सीमाओं के निर्धारण और डिजिटलीकरण’ विषय पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यशाला Ministry of Environment, Forest and Climate Change (एमओईएफसीसी) के तहत आयोजित की गई, जिसमें केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।
इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य देशभर में जीआईएस (Geographic Information System) आधारित वन सीमा डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को तेज करना और इसके लिए एक ठोस कार्ययोजना तैयार करना था। यह पहल Lafarge Umiam Mining Pvt Ltd vs Union of India मामले में Supreme Court of India द्वारा 7 जुलाई 2011 को दिए गए निर्देशों के अनुपालन के तहत की जा रही है।
कार्यशाला में बताया गया कि लंबे समय तक वन सीमाओं को पारंपरिक तरीकों जैसे ट्रैवर्स स्केच और गैर-भू-संदर्भित नक्शों के आधार पर दर्ज किया जाता रहा है। इसके चलते वन क्षेत्रों की सटीक पहचान में कठिनाई, अतिक्रमण का पता लगाने में समस्या और Forest Rights Act 2006 तथा Forest Conservation Act 1980 के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधाएं उत्पन्न हुई हैं।
नई पहल के तहत जीआईएस आधारित डिजिटल मैपिंग से सभी वन क्षेत्रों की सटीक पहचान संभव होगी, चाहे उनकी कानूनी स्थिति कुछ भी हो। इससे न केवल वन भूमि के अन्य उपयोगों की निगरानी बेहतर होगी, बल्कि क्षतिपूर्ति वनीकरण स्थलों पर भी प्रभावी नजर रखी जा सकेगी। साथ ही यह प्रक्रिया वन अधिकारों की रक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही को भी मजबूत करेगी।
कार्यशाला में एक व्यापक तीन-वर्षीय तकनीकी ढांचा प्रस्तुत किया गया, जिसमें डीजीपीएस और सीओआरएस आधारित जियो-रेफरेंसिंग, कैडस्ट्रल और राजस्व डेटा का एकीकरण, संयुक्त सत्यापन, विवाद समाधान और सार्वजनिक परामर्श जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया। इसके अलावा प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में जीआईएस आधारित निर्णय सहायता प्रणाली स्थापित करने की योजना भी साझा की गई।
ओडिशा को इस क्षेत्र में अग्रणी उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया, जहां पहले से ही मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) और डिजिटल मैपिंग के माध्यम से प्रभावी कार्यान्वयन किया गया है। कई अन्य राज्यों ने भी अपनी प्रगति रिपोर्ट और समयबद्ध कार्य योजनाएं साझा कीं।
सीएएमपीए इस पूरी प्रक्रिया में एक केंद्रीय भूमिका निभाएगा। यह नीतिगत निगरानी, तकनीकी मानकीकरण और राष्ट्रीय स्तर पर जीआईएस रिपॉजिटरी के निर्माण का कार्य करेगा। इसके लिए Forest Survey of India, Indian Institute of Remote Sensing, BISAG-N और National Remote Sensing Centre जैसे संस्थानों को तकनीकी सहयोग के लिए शामिल किया जाएगा।
सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया है कि वे वित्त वर्ष 2026-27 के लिए एक समयबद्ध कार्य योजना तैयार करें, जिसे तीन वर्षों में लागू किया जाएगा। इस योजना के लिए ‘शुद्ध वर्तमान मूल्य’ (NPV) फंड के तहत वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाएगी।
कार्यशाला में वन महानिदेशक एवं विशेष सचिव Sushil Kumar Awasthi मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष Siddhanta Das ने सह-अध्यक्षता की। विशेषज्ञों ने इस पहल को भारत के वन शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और सतत विकास सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
कुल मिलाकर, यह पहल न केवल वन सीमाओं के सटीक निर्धारण में मदद करेगी, बल्कि देश के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन के लिए एक मजबूत आधार भी तैयार करेगी।

