देश में वर्ष 2026 का मानसून सामान्य से कमजोर रहने की आशंका के बीच कृषि क्षेत्र पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के ताजा पूर्वानुमानों के अनुसार इस वर्ष मानसून का स्वरूप असंतुलित रह सकता है, जिससे खेती, जल संसाधन और आम जनजीवन पर व्यापक असर पड़ने की संभावना है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसूनी वर्षा औसत से कम रह सकती है। इसके साथ ही अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि दिन के साथ-साथ रात में भी गर्मी से राहत कम मिलेगी, जिससे लू और हीटवेव की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया में मानसून का विशेष महत्व है, क्योंकि सालाना वर्षा का लगभग 75 से 90 प्रतिशत हिस्सा इसी अवधि में होता है। ऐसे में यदि इस दौरान बारिश कम होती है, तो इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई, सिंचाई और उत्पादन पर पड़ता है। विशेष रूप से मध्य भारत के कृषि प्रधान क्षेत्रों में वर्षा की कमी का असर अधिक देखने को मिल सकता है।
हालांकि कुछ क्षेत्रों—जैसे उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों—में सामान्य या उससे अधिक वर्षा की संभावना जताई गई है, लेकिन कुल मिलाकर वर्षा का वितरण असमान रहने की आशंका है। इसका मतलब यह है कि कहीं सूखे जैसी स्थिति बन सकती है, तो कहीं अचानक भारी बारिश के कारण बाढ़ का खतरा भी उत्पन्न हो सकता है।
डब्ल्यूएमओ के अनुसार इस वर्ष मानसून पर एल नीनो का प्रभाव पड़ सकता है। यह एक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिससे वैश्विक मौसम प्रणाली प्रभावित होती है। इसका असर अक्सर भारत में कमजोर मानसून और कम वर्षा के रूप में देखा जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि असंतुलित मानसून का सीधा प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। कम बारिश से फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है, जबकि अत्यधिक और अचानक वर्षा से फसलें खराब होने का खतरा रहेगा। इससे किसानों की आय पर असर पड़ सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा, बढ़ती गर्मी और लू की घटनाओं से मानव स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ सकता है। बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर वर्गों के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है। साथ ही, बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की मांग में भी वृद्धि होगी, जिससे ऊर्जा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि वर्तमान समय में ‘स्प्रिंग प्रेडिक्टेबिलिटी बैरियर’ का प्रभाव बना हुआ है, जिसके कारण दीर्घकालिक मौसम पूर्वानुमानों में कुछ अनिश्चितता बनी रहती है। इसके बावजूद शुरुआती संकेत कृषि क्षेत्र के लिए सावधानी बरतने की आवश्यकता दर्शाते हैं।
कुल मिलाकर, कमजोर मानसून और भीषण गर्मी का संभावित प्रभाव देश के कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को फसल चयन, जल प्रबंधन और आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर ध्यान देना होगा, ताकि इस चुनौतीपूर्ण मौसम का सामना किया जा सके।

