पश्चिमी एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव अब केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। खासकर उर्वरक (फर्टिलाइजर) सेक्टर पर इसका प्रभाव बेहद गंभीर माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में उछाल, सप्लाई चेन में बाधाएं और आयात लागत बढ़ने से भारत का खाद सब्सिडी बिल तेजी से बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है, तो केंद्र सरकार का खाद सब्सिडी खर्च मौजूदा वित्त वर्ष में 3 लाख करोड़ रुपये के पार जा सकता है।
यह आंकड़ा सरकार द्वारा बजट में तय किए गए 1.79 लाख करोड़ रुपये के अनुमान से कहीं अधिक है। हालांकि राहत की बात यह है कि देश में खाद का पर्याप्त भंडार मौजूद है और किसानों को फिलहाल बुवाई के समय खाद की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन इस सुरक्षा कवच को बनाए रखने की कीमत सरकार को भारी सब्सिडी के रूप में चुकानी पड़ रही है।
क्यों बढ़ रहा है खाद सब्सिडी का बोझ?
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर साल करीब 7 करोड़ टन खाद की खपत होती है। इसमें लगभग 4 करोड़ टन यूरिया, 1 करोड़ टन डीएपी (DAP) और 1.5 करोड़ टन एनपीकेएस (NPKS) शामिल हैं।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। विशेष रूप से यूरिया, डीएपी और इनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के लिए भारत विदेशी बाजारों पर निर्भर है। पश्चिमी एशिया और रूस जैसे क्षेत्र वैश्विक उर्वरक आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में युद्ध या राजनीतिक तनाव का सीधा असर कीमतों पर पड़ता है।
उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव कृष्ण कांत पाठक के अनुसार, पश्चिमी एशिया में तनाव शुरू होने से पहले भारत का खाद सब्सिडी बिल करीब 2 लाख करोड़ रुपये था। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस, अमोनिया और फॉस्फेट की कीमतें बढ़ने से उर्वरकों की लागत बढ़ गई है। सरकार किसानों को सस्ती दर पर खाद उपलब्ध कराने के लिए कंपनियों को सब्सिडी देती है। इसलिए लागत बढ़ने का सीधा दबाव सरकारी खजाने पर पड़ रहा है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है सब्सिडी खर्च
भारत में अब तक का सबसे बड़ा खाद सब्सिडी बिल वित्त वर्ष 2022-23 में दर्ज किया गया था, जब सरकार ने करीब 2.51 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। उस समय रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक सप्लाई संकट के कारण उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल आया था।
अब पश्चिमी एशिया का संकट उसी तरह की नई चुनौती बनकर सामने आया है। यदि यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो सरकार को किसानों के हित में भारी अतिरिक्त सब्सिडी देनी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है और सरकार की अन्य विकास योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसानों को महंगे उर्वरकों का बोझ न उठाना पड़े और साथ ही वित्तीय संतुलन भी बना रहे।
किसानों के लिए राहत की खबर
हालांकि आर्थिक दबाव बढ़ रहा है, लेकिन किसानों के लिए फिलहाल स्थिति नियंत्रण में दिखाई दे रही है। सरकार का दावा है कि देश में 2 करोड़ टन से अधिक उर्वरकों का सुरक्षित भंडार मौजूद है। इसका मतलब है कि खरीफ और रबी सीजन में किसानों को खाद की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उर्वरक भंडारण और आपूर्ति तंत्र को मजबूत करने पर काफी काम किया है। इसी का परिणाम है कि वैश्विक संकट के बावजूद देश में उर्वरकों की उपलब्धता बनी हुई है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर खाद उपलब्ध रहती है, तो उत्पादन पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन लंबे समय तक बढ़ती लागत और आयात निर्भरता भविष्य में चिंता का विषय बन सकती है।
यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता बनी बड़ी समस्या
भारत की कृषि व्यवस्था लंबे समय से यूरिया आधारित खेती पर निर्भर रही है। किसानों को यूरिया पर भारी सब्सिडी मिलने के कारण इसका उपयोग लगातार बढ़ा है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार खेतों में डाले गए यूरिया का केवल 30 प्रतिशत हिस्सा ही फसलों और मिट्टी द्वारा उपयोग किया जाता है, जबकि बाकी हिस्सा बर्बाद हो जाता है।
यह अतिरिक्त यूरिया मिट्टी की गुणवत्ता को खराब करता है, भूजल प्रदूषण बढ़ाता है और पर्यावरण पर भी नकारात्मक असर डालता है। यही वजह है कि सरकार पिछले कुछ वर्षों से वैकल्पिक उर्वरकों और नई तकनीकों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है।
क्या नैनो और नीम-कोटेड यूरिया समाधान हैं?
सरकार ने नैनो यूरिया और नीम-कोटेड यूरिया जैसे प्रयोग शुरू किए थे, ताकि यूरिया की खपत कम हो और उपयोग क्षमता बढ़े। नीम-कोटेड यूरिया ने कुछ हद तक दुरुपयोग रोकने में मदद की, लेकिन इससे कुल खपत में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया।
नैनो यूरिया को भी भविष्य की तकनीक माना गया, लेकिन अभी तक इसका प्रभाव सीमित ही दिखाई दिया है। कई कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि किसानों को नई तकनीकों के प्रति जागरूक करने और उनके व्यवहार में बदलाव लाने में समय लगेगा।
जिंक और सल्फर-कोटेड यूरिया बन सकते हैं बेहतर विकल्प
विशेषज्ञ अब जिंक-कोटेड और सल्फर-कोटेड यूरिया को अधिक प्रभावी विकल्प मान रहे हैं। ये उर्वरक पोषक तत्वों की उपलब्धता को बेहतर बनाते हैं और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में भी मदद करते हैं।
इसी तरह अमोनियम सल्फेट का उपयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। बताया जाता है कि मिट्टी अमोनियम सल्फेट को लगभग 70 प्रतिशत तक अवशोषित कर लेती है, जो सामान्य यूरिया की तुलना में काफी बेहतर है। इससे न केवल उर्वरक की बर्बादी कम होगी, बल्कि किसानों की लागत और पर्यावरणीय नुकसान भी घट सकता है।
फसल विविधीकरण से कम होगी निर्भरता
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ उर्वरक तकनीक बदलने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए खेती के तरीके में भी बदलाव जरूरी है।
भारत में धान और गेहूं जैसी फसलों की खेती में रासायनिक खाद का अत्यधिक उपयोग होता है। यदि किसान रागी, तिल, मोटे अनाज और दालों जैसी फसलों की ओर बढ़ते हैं, तो रासायनिक उर्वरकों की जरूरत काफी कम हो सकती है।
दालें मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिर करने की क्षमता रखती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इसी तरह मोटे अनाज कम पानी और कम रासायनिक खाद में भी अच्छी पैदावार देते हैं। यह बदलाव न केवल किसानों की लागत घटाएगा, बल्कि देश की खाद आयात निर्भरता भी कम करेगा।
आत्मनिर्भरता ही स्थायी समाधान
भारत लंबे समय से उर्वरकों के मामले में आयात पर निर्भर रहा है। वैश्विक संकट बार-बार यह दिखा रहे हैं कि यह निर्भरता भविष्य में बड़ा आर्थिक जोखिम बन सकती है। इसलिए अब घरेलू उत्पादन बढ़ाना, वैकल्पिक उर्वरकों का विकास करना और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना बेहद जरूरी हो गया है।
सरकार को एक तरफ किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध करानी है, तो दूसरी तरफ वित्तीय अनुशासन भी बनाए रखना है। आने वाले वर्षों में यही संतुलन भारतीय कृषि नीति की सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला है।
पश्चिमी एशिया का मौजूदा तनाव सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय संकट नहीं है, बल्कि यह भारत के कृषि ढांचे और आर्थिक नीतियों की कमजोरियों को भी उजागर कर रहा है। यदि समय रहते टिकाऊ समाधान नहीं खोजे गए, तो खाद सब्सिडी का यह बढ़ता बोझ भविष्य में और बड़ी चुनौती बन सकता है।


