Bhubaneswar में आयोजित पूर्वी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री Shivraj Singh Chouhan और Mohan Charan Majhi ने पूर्वी भारत की कृषि को नई दिशा देने के लिए साझा रणनीति और रोडमैप पर जोर दिया। सम्मेलन में ओडिशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कृषि विकास, किसानों की आय बढ़ाने, टिकाऊ खेती और आधुनिक कृषि तकनीकों पर व्यापक मंथन हुआ।
भुवनेश्वर के मेफेयर कन्वेंशन सेंटर में आयोजित इस सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पूर्वी भारत अपनी उर्वरा भूमि, जल संसाधनों और मेहनतकश किसानों के कारण देश के कृषि विकास का “ग्रोथ इंजन” बनने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि यदि सही नीतियों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ कार्य किया जाए तो यह क्षेत्र कृषि उत्पादन और किसानों की समृद्धि में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह सम्मेलन केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और आधुनिक बनाने का गंभीर प्रयास है। उन्होंने किसानों को “अन्नदाता” ही नहीं बल्कि “जीवनदाता” बताते हुए कहा कि किसानों की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है।
Narendra Modi के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश आत्मनिर्भर और विकसित भारत की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और कृषि इस विकास यात्रा की आधारशिला है। उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए तीन प्रमुख लक्ष्य बताए— देशवासियों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, पौष्टिक आहार उपलब्ध कराना और किसानों की आय में स्थायी वृद्धि करना।
सम्मेलन में श्री चौहान ने उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती की लागत कम करने और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अब केवल धान और गेहूं पर निर्भर रहने का समय नहीं है, बल्कि दलहन, तिलहन, फल, सब्जियों और अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती को बढ़ावा देना होगा।
उन्होंने विशेष रूप से इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल को छोटे किसानों के लिए भविष्य का समाधान बताया। उनके अनुसार खेती के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, बागवानी और कृषि वानिकी जैसी गतिविधियों को जोड़कर किसानों की आमदनी कई गुना बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों से आग्रह किया कि ऐसे मॉडल को गांव-गांव तक व्यवहारिक रूप में पहुंचाया जाए।
केंद्रीय मंत्री ने मृदा स्वास्थ्य को टिकाऊ खेती की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिना मिट्टी परीक्षण के अंधाधुंध उर्वरकों का प्रयोग न केवल लागत बढ़ाता है बल्कि भूमि की उर्वरता को भी नुकसान पहुंचाता है। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने की भी अपील की और कहा कि कम से कम अपनी जमीन के एक हिस्से में जैविक और प्राकृतिक खेती की शुरुआत करनी चाहिए।
श्री चौहान ने घोषणा की कि 1 जून से “खेत बचाओ अभियान” शुरू किया जाएगा। इस अभियान के तहत किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी संरक्षण, आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि सब्सिडी वाला खाद केवल किसानों और खेती के कार्यों में ही उपयोग हो।
उन्होंने नकली खाद, घटिया बीज और नकली कीटनाशकों को किसानों के खिलाफ बड़ा अपराध बताते हुए कहा कि ऐसे तत्वों के विरुद्ध सख्त अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने राज्यों से भी इस दिशा में कठोर कार्रवाई करने की अपील की ताकि किसानों को गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान उपलब्ध हो सकें।
दलहन और तिलहन उत्पादन पर विशेष जोर देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पूर्वी भारत देश को इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि किसानों को तभी प्रोत्साहन मिलेगा जब उन्हें उनकी उपज की सुनिश्चित खरीद का भरोसा होगा। इसके लिए पीएम-आशा योजना, नैफेड और अन्य खरीद एजेंसियों की भूमिका को और मजबूत बनाया जाएगा।
श्री चौहान ने कृषि अनुसंधान और आधुनिक तकनीक को खेत तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि Indian Council of Agricultural Research, कृषि विज्ञान केंद्रों और वैज्ञानिक संस्थानों के शोध सीधे किसानों तक पहुंचने चाहिए, ताकि किसान नई तकनीकों का लाभ उठा सकें।
उन्होंने फार्मर आईडी को कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाला कदम बताते हुए कहा कि इससे किसानों की जमीन, परिवार और योजनाओं से जुड़ी जानकारी एकीकृत होगी, जिससे ऋण, सब्सिडी और अन्य सुविधाएं अधिक पारदर्शी और तेज गति से उपलब्ध हो सकेंगी।
सम्मेलन में ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी ने कहा कि यह आयोजन पूर्वी भारत के राज्यों के लिए कृषि भविष्य का साझा रोडमैप तैयार करने का ऐतिहासिक अवसर है। उन्होंने कहा कि पूर्वी भारत कृषि उत्पादकता, जलवायु-अनुकूल खेती और समावेशी विकास के क्षेत्र में देश का नेतृत्व कर सकता है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि ओडिशा सरकार फसल विविधीकरण, दलहन उत्पादन, खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि धान उत्पादन बढ़ने के साथ भंडारण, विपणन और मूल्य संवर्धन की चुनौतियां भी सामने आई हैं, जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
श्री मांझी ने किसानों के हित में चलाई जा रही योजनाओं का उल्लेख करते हुए धान खरीद, फसल बीमा, कृषि यंत्रीकरण, किसान उत्पादक संगठनों (FPO), कोल्ड स्टोरेज विस्तार और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि किसानों को लाभकारी खेती से जोड़ने के लिए बेहतर बाजार व्यवस्था और कृषि उद्यमिता को प्रोत्साहित करना जरूरी है।
मुख्यमंत्री ने मिलेट्स को “सुपर फूड” बताते हुए कहा कि यह कम पानी और कम लागत में उगाई जाने वाली फसल है, जो विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों के किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। उन्होंने ऑर्गेनिक खेती, जैव विविधता संरक्षण और पारंपरिक खाद्यान्नों के संवर्धन की दिशा में भी अधिक प्रयास करने की आवश्यकता बताई।
सम्मेलन में केंद्र और विभिन्न राज्यों के कृषि मंत्री, वैज्ञानिक, नीति निर्माता, किसान प्रतिनिधि, एफपीओ, स्टार्टअप्स और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ भी उपस्थित रहे। सम्मेलन का उद्देश्य पूर्वी भारत की कृषि क्षमता को नई दिशा देना और किसानों की आय बढ़ाने के लिए साझा रणनीति तैयार करना रहा।


