भारत आज दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। देश में हर वर्ष लगभग 357 मिलियन टन खाद्यान्न, 27 मिलियन टन दलहन, 16 मिलियन टन मोटा अनाज (मिलेट्स) तथा 315 मिलियन टन फल और सब्जियों का उत्पादन हो रहा है। कृषि क्षेत्र देश की जीडीपी में लगभग 18 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग अकेले कृषि जीडीपी में 7 से 8 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। यह क्षेत्र 23 लाख से अधिक उद्यमों को सहारा देता है और लगभग 70 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है।
हालांकि कृषि उत्पादन में लगातार वृद्धि हुई है, लेकिन कटाई के बाद होने वाला 6 से 18 प्रतिशत तक नुकसान आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी समस्या के समाधान के लिए ICAR-Central Institute of Agricultural Engineering के एग्रो प्रोसेसिंग डिवीजन ने नवाचार, तकनीक विकास, उद्यमिता और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर देश में नई पहचान बनाई है।
भोपाल स्थित यह संस्थान अनाज, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज, फल-सब्जियों, औषधीय पौधों और अन्य कृषि उत्पादों के प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक प्रसंस्करण से जुड़ी तकनीकों के विकास पर काम कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना, मूल्य संवर्धन बढ़ाना और किसानों की आय में सुधार करना है।
संस्थान के एग्रो प्रोसेसिंग डिवीजन ने पिछले वर्षों में वैज्ञानिक उत्कृष्टता और तकनीकी नवाचार की मजबूत विरासत तैयार की है। स्थापना से अब तक लगभग 50 वैज्ञानिकों, 100 तकनीकी एवं प्रशासनिक कर्मचारियों तथा 50 रिसर्च एसोसिएट और युवा पेशेवरों ने मिलकर करीब 200 शोध परियोजनाओं पर कार्य किया है। इनमें 170 संस्थागत परियोजनाएं और 30 बाहरी वित्तपोषित परियोजनाएं शामिल हैं, जिनकी कुल लागत लगभग 30 करोड़ रुपये रही। इन शोध प्रयासों के माध्यम से लगभग 100 एग्रो-प्रोसेसिंग तकनीकों का विकास किया गया है।
संस्थान द्वारा विकसित कई तकनीकों ने देश में पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन और खाद्य प्रसंस्करण व्यवस्था को नई दिशा दी है। इनमें ग्रेन क्लीनर-कम-ग्रेडर, मिनी दाल मिल, फ्लोर सेपरेटर, ग्राउंडनट डिकॉर्टिकेटर, फ्रूट ग्रेडर, प्याज डेस्केलर, प्याज भंडारण प्रणाली, माइक्रो-परफोरेटेड मॉडिफाइड एटमॉस्फियर पैकेजिंग सिस्टम, स्मार्ट पैकेजिंग, रिपनिंग चैंबर, कट सब्जियों की मिनिमल प्रोसेसिंग तकनीक, ग्लूटेन एक्सट्रैक्टर, ऑटोमेटिक सोया मिल्क प्लांट और मिलेट प्रोसेसिंग मशीनरी जैसी कई महत्वपूर्ण तकनीकें शामिल हैं।
विशेष रूप से मिलेट्स आधारित खाद्य उत्पादों के क्षेत्र में संस्थान ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों ने मिलेट बिस्किट, इंस्टेंट दलिया, हेल्थ मिक्स, रोस्टेड मिलेट उत्पाद, मिलेट ब्रेड और गुलाब जामुन प्री-मिक्स जैसे पौष्टिक उत्पाद विकसित किए हैं, जो पोषण सुरक्षा और मिलेट्स के मूल्य संवर्धन को बढ़ावा दे रहे हैं।
संस्थान की एक बड़ी उपलब्धि इसकी तकनीकों का सफल व्यावसायीकरण भी है। अब तक लगभग 45 तकनीकों को देशभर के 75 से अधिक उद्योगों और निर्माताओं को लाइसेंस किया जा चुका है, जिससे करीब 150 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। वर्ष 2012 से 2023 के बीच किए गए प्रभाव मूल्यांकन अध्ययनों में पाया गया कि संस्थान की 19 प्रमुख तकनीकों से देश को प्रतिवर्ष लगभग 14,070 करोड़ रुपये का आर्थिक लाभ मिला। इनमें क्लीनर-कम-ग्रेडर, मिनी दाल मिल और मिलेट मिल जैसी तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
संस्थान का अनुसंधान ढांचा अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं और उपकरणों से सुसज्जित है। यहां इंजीनियरिंग प्रॉपर्टी लैब, स्टोरेज इंजीनियरिंग लैब, NABL मान्यता प्राप्त फूड टेस्टिंग लैब, फूड क्वालिटी लैब, फल एवं सब्जी प्रसंस्करण प्रयोगशाला और फूड ग्रेन प्रोसेसिंग लैब जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
इसके अलावा संस्थान ने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन मिलेट प्रोसेसिंग, पोस्ट-हार्वेस्ट मशीनरी टेस्टिंग सेंटर, ऑन-फार्म एग्रो प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी पार्क और आधुनिक दाल मिल जैसी आधारभूत सुविधाएं भी विकसित की हैं। इन सुविधाओं ने तकनीकी परीक्षण, परामर्श, प्रदर्शन और प्रशिक्षण गतिविधियों को नई गति दी है।
संस्थान द्वारा स्थापित पायलट स्तर की प्रोसेसिंग इकाइयां भी किसानों और उद्यमियों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रही हैं। इनमें प्याज भंडारण संरचना, प्याज पेस्ट निर्माण इकाई, फल एवं सब्जी मिनिमल प्रोसेसिंग यूनिट, बेकरी यूनिट, ऑयल एक्सपेलर और सोया-मिलेट मिल्क पनीर प्रोसेसिंग यूनिट शामिल हैं। इन सुविधाओं की मदद से लगभग 10 उद्यमियों ने अपना खाद्य प्रसंस्करण व्यवसाय शुरू किया है।
संस्थान का पोस्ट-हार्वेस्ट इक्विपमेंट एंड मशीनरी टेस्टिंग सेंटर भी बड़ी उपलब्धि बनकर उभरा है। भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा अधिकृत इस केंद्र ने वर्ष 2019 से अब तक 157 मशीनों का परीक्षण किया है और लगभग 240 लाख रुपये का राजस्व अर्जित किया है।
एग्रो प्रोसेसिंग सेंटर और तकनीकी लाइसेंसिंग गतिविधियों के माध्यम से भी संस्थान को उल्लेखनीय आय प्राप्त हुई है। कुल मिलाकर तकनीकों, सेवाओं और बुनियादी ढांचे के माध्यम से लगभग 500 लाख रुपये का राजस्व अर्जित किया गया है।
क्षमता निर्माण और कौशल विकास संस्थान की सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है। किसानों, महिलाओं, ग्रामीण युवाओं, शोधार्थियों और उद्यमियों के लिए अब तक लगभग 306 प्रशिक्षण और आउटरीच कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों से करीब 20 हजार हितधारकों को लाभ मिला है।
महिलाओं के सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी संस्थान ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। महिलाओं को सोया और खाद्य प्रसंस्करण उपकरण, ग्रेन क्लीनर और अन्य महिला अनुकूल तकनीकों का प्रशिक्षण देकर उनकी आय बढ़ाने और श्रम कम करने में मदद की गई है। करीब 4,500 महिलाओं को इन कार्यक्रमों से प्रत्यक्ष लाभ मिला है।
संस्थान ने उद्योग और अकादमिक जगत के बीच सहयोग को भी मजबूत किया है। लगभग 10 औद्योगिक मीट्स आयोजित कर उद्योगों, एफपीओ और गैर-सरकारी संगठनों को एक मंच पर लाया गया। इसके परिणामस्वरूप लगभग 200 उद्यमियों ने एग्रो-प्रोसेसिंग और सोया प्रसंस्करण आधारित व्यवसाय स्थापित किए हैं।
उच्च शिक्षा और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में भी संस्थान की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यहां से लगभग 100 छात्रों ने एम.टेक और एम.एससी. की डिग्री प्राप्त की, जबकि करीब 50 छात्रों ने पीएचडी पूरी की। इनमें से अधिकांश छात्र आज वैज्ञानिक, शोधकर्ता और शिक्षण संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।
संस्थान के वैज्ञानिकों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। इनमें रफी अहमद किदवई पुरस्कार, NAAS फैलोशिप, जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार और यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड जैसे सम्मान शामिल हैं।
Shivraj Singh Chouhan और M. L. Jat के मार्गदर्शन में संस्थान अब भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तकनीकों पर कार्य कर रहा है। इनमें AI आधारित एग्रो-प्रोसेसिंग, बेहतर पैकेजिंग, कोल्ड-चेन सिस्टम, वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल और उद्यमिता आधारित मूल्य श्रृंखला विकास प्रमुख हैं।
नवाचार, तकनीकी विकास, उद्यमिता प्रोत्साहन और क्षमता निर्माण के समन्वित प्रयासों के माध्यम से ICAR-CIAE भोपाल का एग्रो प्रोसेसिंग डिवीजन देश में कृषि प्रसंस्करण क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह संस्थान न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक बन रहा है, बल्कि पोषण सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और देश की आर्थिक प्रगति में भी अहम योगदान दे रहा है।

