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National Agricultural Research System: नई तकनीक, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक सलाह से किसानों की बदल रही खेती

National Agricultural Research System: Farmers' agriculture is being transformed through new technology, training, and scientific advice.

Fiza by Fiza
June 11, 2026
in योजना
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National Agricultural Research System

National Agricultural Research System

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National Agricultural Research System: भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां करोड़ों किसान अपनी आजीविका के लिए खेती, पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन और कृषि से जुड़े अन्य कार्यों पर निर्भर हैं। बदलते मौसम, मिट्टी की घटती उर्वरता, कीट-रोग, पानी की कमी और बढ़ती लागत ने खेती को पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। ऐसे समय में किसानों को केवल परंपरागत अनुभव ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जानकारी, नई किस्मों, आधुनिक तकनीक और सही प्रशिक्षण की भी जरूरत है। इसी जरूरत को पूरा करने में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली अहम भूमिका निभाती है।

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली यानी National Agricultural Research System भारत की कृषि को वैज्ञानिक आधार देने वाली एक बड़ी व्यवस्था है। इसके माध्यम से कृषि वैज्ञानिक नई फसल किस्मों, बेहतर खेती तकनीकों, जल प्रबंधन, मिट्टी स्वास्थ्य, पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन और जलवायु अनुकूल खेती पर काम करते हैं। यह व्यवस्था सीधे किसान को पैसा देने वाली योजना नहीं है, बल्कि किसानों तक शोध, तकनीक और प्रशिक्षण पहुंचाने वाली प्रणाली है।

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली क्या है?

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली भारत में कृषि अनुसंधान, शिक्षा और प्रसार का संगठित नेटवर्क है। इसके केंद्र में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR है। ICAR देश में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में शोध, शिक्षा और तकनीकी मार्गदर्शन का प्रमुख संस्थान है। इसके साथ कृषि विश्वविद्यालय, अनुसंधान केंद्र, राष्ट्रीय ब्यूरो, निदेशालय, कृषि विज्ञान केंद्र और राज्य स्तरीय कृषि संस्थान मिलकर काम करते हैं।

इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य है कि प्रयोगशालाओं और अनुसंधान केंद्रों में विकसित तकनीक खेतों तक पहुंचे। किसान को ऐसी जानकारी मिले, जिससे उत्पादन बढ़े, लागत घटे, फसल की गुणवत्ता सुधरे और खेती जलवायु परिवर्तन के दौर में भी टिकाऊ बनी रहे।

किसानों के लिए यह व्यवस्था क्यों जरूरी है?

आज किसान कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। कभी कम बारिश होती है, कभी बेमौसम बारिश फसल खराब कर देती है। कई बार कीट और रोग अचानक फैल जाते हैं। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी भी उत्पादन को प्रभावित करती है। ऐसे में वैज्ञानिक सलाह के बिना खेती में नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली किसानों को सही समय पर सही जानकारी देने का काम करती है। उदाहरण के लिए किसान को यह बताया जाता है कि उसके क्षेत्र के लिए कौन सी फसल किस्म बेहतर है, किस मौसम में कौन सा बीज बोना चाहिए, कितनी सिंचाई करनी चाहिए, कौन सा उर्वरक कितनी मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए और कीट-रोग नियंत्रण के लिए कौन सा सुरक्षित तरीका अपनाना चाहिए।

यह किसानों के लिए कैसे काम कर रही है?

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ किसानों तक कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से पहुंचता है। कृषि विज्ञान केंद्र यानी KVK जिले स्तर पर किसानों के लिए ज्ञान और प्रशिक्षण केंद्र की तरह काम करते हैं। यहां किसानों को खेती की नई तकनीक, फसल प्रबंधन, पशुपालन, बागवानी, जैविक खेती, प्राकृतिक खेती, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन और कृषि यंत्रों की जानकारी दी जाती है।

KVK किसानों के खेतों पर प्रदर्शन भी करता है। इसे फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन कहा जाता है। इसमें वैज्ञानिक नई तकनीक या नई फसल किस्म को किसान के खेत में दिखाते हैं, ताकि दूसरे किसान भी उसका परिणाम देखकर उसे अपनाएं। इससे किसानों में भरोसा बढ़ता है और तकनीक का उपयोग तेजी से होता है।

नई किस्मों का विकास और किसानों को लाभ

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के तहत गेहूं, धान, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज, गन्ना, कपास, सब्जियों और फलों की बेहतर किस्मों पर लगातार काम किया जाता है। वैज्ञानिक ऐसी किस्में विकसित करने का प्रयास करते हैं जो अधिक उत्पादन दें, रोगों से लड़ने की क्षमता रखें, कम पानी में भी अच्छी पैदावार दें और बदलते मौसम में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

किसानों के लिए इसका सीधा फायदा यह है कि उन्हें स्थानीय जलवायु और मिट्टी के हिसाब से उपयुक्त किस्मों की जानकारी मिलती है। इससे उत्पादन बढ़ सकता है और फसल खराब होने का जोखिम कम हो सकता है।

मिट्टी स्वास्थ्य और पोषण प्रबंधन में मदद

खेती की सफलता मिट्टी की सेहत पर निर्भर करती है। कई किसान लंबे समय तक एक ही तरह के रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के तहत वैज्ञानिक मिट्टी जांच, संतुलित उर्वरक उपयोग, जैव उर्वरक, हरी खाद, कंपोस्ट और एकीकृत पोषण प्रबंधन पर किसानों को सलाह देते हैं।

इससे किसान जरूरत के अनुसार उर्वरक का उपयोग कर सकते हैं। अनावश्यक खाद खर्च घटता है और मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहती है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों की मदद

आज जलवायु परिवर्तन खेती के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। तापमान बढ़ रहा है, बारिश का पैटर्न बदल रहा है और कई क्षेत्रों में सूखा या जलभराव जैसी स्थिति बन रही है। राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली जलवायु अनुकूल खेती पर भी काम करती है।

किसानों को सूखा सहन करने वाली किस्में, कम अवधि वाली फसलें, जल संरक्षण तकनीक, मल्चिंग, ड्रिप सिंचाई, फसल विविधीकरण और मौसम आधारित सलाह दी जाती है। इससे किसान जोखिम कम कर सकते हैं और बदलते मौसम में भी बेहतर उत्पादन ले सकते हैं।

पशुपालन, मत्स्य और बागवानी में भी सहायता

यह व्यवस्था केवल खेत की फसलों तक सीमित नहीं है। पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन, मधुमक्खी पालन और बागवानी जैसे क्षेत्रों में भी किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी दी जाती है।

कई छोटे किसान खेती के साथ पशुपालन या बागवानी करके अपनी आय बढ़ाते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र ऐसे किसानों को नस्ल सुधार, पशु आहार, टीकाकरण, रोग प्रबंधन, फल-सब्जी उत्पादन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की जानकारी देते हैं। इससे किसान केवल कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय उससे बेहतर कमाई का रास्ता भी सीखते हैं।

कौन-कौन से राज्यों में यह व्यवस्था चल रही है?

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली पूरे भारत में कार्य कर रही है। यह किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। देश के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ICAR संस्थान, कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र या राज्य कृषि विभागों के माध्यम से इसका लाभ किसानों तक पहुंचता है।

उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में भी यह प्रणाली अलग-अलग रूप में काम कर रही है।

हर राज्य की खेती की जरूरत अलग होती है। जैसे पंजाब और हरियाणा में गेहूं-धान प्रणाली पर ज्यादा काम होता है, राजस्थान में सूखा प्रबंधन और बाजरा जैसी फसलों पर जोर रहता है, महाराष्ट्र में कपास, सोयाबीन, गन्ना और बागवानी अहम हैं, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में जैविक खेती, बागवानी, मसाले और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

किसान इस योजना के लिए कैसे अप्लाई करें?

सबसे पहले किसानों को यह समझना जरूरी है कि राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली कोई ऐसी योजना नहीं है, जिसमें किसान ऑनलाइन फॉर्म भरकर सीधे पैसा या सब्सिडी प्राप्त करें। यह एक अनुसंधान और तकनीकी सहायता व्यवस्था है। किसान इसका लाभ प्रशिक्षण, सलाह, प्रदर्शन, बीज जानकारी, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और फसल समाधान के रूप में ले सकते हैं।

किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकते हैं। लगभग हर जिले में KVK किसानों के लिए प्रशिक्षण और सलाह की सुविधा देता है। किसान KVK जाकर अपनी समस्या बता सकते हैं, जैसे फसल में रोग लगना, मिट्टी की समस्या, बीज चयन, पशु रोग, सब्जी उत्पादन या बागवानी से जुड़ी जानकारी।

आवेदन या संपर्क की प्रक्रिया

किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग कार्यालय, कृषि विश्वविद्यालय या ICAR संस्थान से संपर्क कर सकते हैं। कई KVK प्रशिक्षण कार्यक्रमों की सूचना स्थानीय स्तर पर जारी करते हैं। किसान मोबाइल नंबर, आधार, भूमि से जुड़ी जानकारी और फसल विवरण के साथ अपना नाम प्रशिक्षण या प्रदर्शन कार्यक्रम के लिए दर्ज करा सकते हैं।

कुछ जगहों पर किसान फोन, व्हाट्सऐप ग्रुप, किसान मेले, गांव स्तर की बैठक या कृषि विभाग के माध्यम से भी जुड़ सकते हैं। यदि किसी किसान को विशेष प्रशिक्षण चाहिए, जैसे मशरूम उत्पादन, जैविक खेती, डेयरी, मधुमक्खी पालन या सब्जी नर्सरी, तो वह अपने KVK से अगला प्रशिक्षण कार्यक्रम पूछ सकता है।

किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है?

आमतौर पर KVK प्रशिक्षण के लिए बहुत जटिल दस्तावेजों की जरूरत नहीं होती। फिर भी कई कार्यक्रमों में किसान से नाम, मोबाइल नंबर, गांव, ब्लॉक, जिला, फसल की जानकारी, आधार नंबर और कभी-कभी भूमि से जुड़ी जानकारी मांगी जा सकती है। यदि कोई प्रशिक्षण सरकारी योजना या अनुदान से जुड़ा हो, तो बैंक पासबुक, भूमि रिकॉर्ड, जाति प्रमाण पत्र या अन्य दस्तावेज भी मांगे जा सकते हैं।

किसानों को क्या-क्या लाभ मिलते हैं?

इस प्रणाली से किसानों को कई तरह के लाभ मिलते हैं। सबसे बड़ा लाभ है वैज्ञानिक जानकारी। किसान अनुमान के आधार पर खेती करने के बजाय विशेषज्ञों की सलाह से निर्णय लेता है। इससे गलत दवा, गलत खाद या गलत बीज के कारण होने वाला नुकसान कम हो सकता है।

दूसरा लाभ है प्रशिक्षण। किसान नई तकनीक को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उसे देखकर और सीखकर अपनाता है। तीसरा लाभ है फसल प्रदर्शन। किसान अपने क्षेत्र में नई तकनीक का परिणाम देखता है। चौथा लाभ है लागत में कमी। संतुलित उर्वरक, सही सिंचाई और उचित रोग नियंत्रण से खर्च घट सकता है।

पांचवां लाभ है आय बढ़ाने के नए रास्ते। किसान खेती के साथ डेयरी, बागवानी, मशरूम, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन या प्रसंस्करण से अतिरिक्त कमाई कर सकता है।

महिलाओं और युवा किसानों के लिए अवसर

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली महिलाओं और युवा किसानों के लिए भी उपयोगी है। ग्रामीण महिलाएं मशरूम उत्पादन, सब्जी प्रसंस्करण, अचार, पापड़, मसाला, पोषण वाटिका, डेयरी और मुर्गी पालन जैसे कार्यों में प्रशिक्षण लेकर आय बढ़ा सकती हैं।

युवा किसान कृषि स्टार्टअप, ड्रोन, सटीक खेती, नर्सरी, जैविक उत्पाद, ऑनलाइन मार्केटिंग और मूल्य संवर्धन के क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं। KVK और कृषि विश्वविद्यालय इस दिशा में युवाओं को कौशल आधारित प्रशिक्षण देते हैं।

किसान मेले और जागरूकता कार्यक्रम

ICAR, कृषि विश्वविद्यालय और KVK समय-समय पर किसान मेले, प्रशिक्षण शिविर, जागरूकता कार्यक्रम और खेत दिवस आयोजित करते हैं। इन कार्यक्रमों में किसान नई मशीनें, नई किस्में, उर्वरक प्रबंधन, रोग नियंत्रण और बाजार से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

किसान मेले किसानों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं, क्योंकि यहां उन्हें वैज्ञानिकों, कृषि अधिकारियों, कंपनियों और प्रगतिशील किसानों से सीधे बातचीत करने का मौका मिलता है।

क्या इससे किसान की आय बढ़ सकती है?

हां, यदि किसान राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली से मिलने वाली जानकारी को सही तरीके से अपनाते हैं, तो उनकी आय बढ़ने की संभावना मजबूत होती है। बेहतर बीज, सही पोषण, समय पर रोग नियंत्रण, फसल विविधीकरण, बागवानी, पशुपालन और प्रसंस्करण से किसान अपनी कमाई को बेहतर बना सकते हैं।

हालांकि आय बढ़ना फसल, क्षेत्र, मौसम, बाजार भाव और किसान के प्रबंधन पर भी निर्भर करता है। इसलिए किसान को स्थानीय KVK या कृषि विशेषज्ञ से क्षेत्र के हिसाब से सलाह जरूर लेनी चाहिए।

किसानों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

किसानों को किसी भी नई तकनीक को अपनाने से पहले स्थानीय वैज्ञानिक या कृषि अधिकारी से सलाह लेनी चाहिए। इंटरनेट या सोशल मीडिया पर मिली जानकारी हमेशा सही नहीं होती। अपने क्षेत्र की मिट्टी, मौसम और पानी की उपलब्धता के अनुसार ही फसल और तकनीक चुननी चाहिए।

किसान को मिट्टी जांच करानी चाहिए, प्रमाणित बीज का उपयोग करना चाहिए, फसल चक्र अपनाना चाहिए और कीटनाशकों का उपयोग केवल जरूरत के अनुसार करना चाहिए। इससे खेती सुरक्षित और लाभदायक बन सकती है।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली भारत की कृषि को वैज्ञानिक और आधुनिक बनाने वाली मजबूत व्यवस्था है। यह सीधे सब्सिडी देने वाली योजना नहीं है, बल्कि किसानों को नई तकनीक, बेहतर किस्में, प्रशिक्षण, वैज्ञानिक सलाह और फसल समाधान उपलब्ध कराने वाला बड़ा नेटवर्क है।

आज जब खेती में मौसम, लागत और बाजार की चुनौतियां बढ़ रही हैं, तब किसानों के लिए वैज्ञानिक खेती अपनाना बेहद जरूरी हो गया है। कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय और ICAR संस्थान किसानों को इसी दिशा में आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। किसान यदि अपने नजदीकी KVK से जुड़ें, प्रशिक्षण लें और वैज्ञानिक सलाह को खेत में लागू करें, तो खेती अधिक टिकाऊ, लाभदायक और सुरक्षित बन सकती है।

 

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