टप्पल (उत्तर प्रदेश): उत्तर भारत के एक छोटे से गांव टप्पल में महिलाओं का एक समूह रोज़ाना गाय का गोबर, गुड़ और आटा मिलाकर बायोफर्टिलाइज़र तैयार कर रहा है। यह केवल एक स्थानीय उद्यम नहीं, बल्कि भारतीय कृषि के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियों का एक संभावित समाधान भी बनता जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंताओं और टिकाऊ खेती की आवश्यकता के बीच बायोफर्टिलाइज़र की मांग तेजी से बढ़ रही है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर वर्ष लगभग 63 मिलियन टन रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। धान, गेहूं, गन्ना और अन्य प्रमुख फसलों की उत्पादकता काफी हद तक यूरिया, डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) और अन्य रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर है। लेकिन हाल के महीनों में वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने उर्वरक आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
मध्य पूर्व में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ती अनिश्चितता ने उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ा दिया है। भारत अपनी उर्वरक आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है और होर्मुज जलडमरूमध्य इस आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। ऐसे में खरीफ सीजन की बुआई से पहले किसानों के बीच उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
इसी पृष्ठभूमि में बायोफर्टिलाइज़र को लेकर रुचि बढ़ती दिखाई दे रही है। हालांकि भारत का बायोफर्टिलाइज़र बाजार अभी अपेक्षाकृत छोटा है और इसकी अनुमानित कीमत लगभग 150 मिलियन डॉलर है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह बाजार सालाना करीब 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण किसानों द्वारा वैकल्पिक और टिकाऊ कृषि उपायों की तलाश है।
टप्पल समृद्धि महिला किसान लिमिटेड इस बदलाव का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। किसान उत्पादक संगठन (FPO) योजना के तहत स्थापित इस संस्था से 92 गांवों की लगभग 1,050 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। संगठन को सरकार द्वारा “लाइटहाउस एफपीओ” का दर्जा भी दिया गया है, ताकि अन्य क्षेत्रों में भी इस मॉडल को अपनाया जा सके।
संस्था की प्रबंध निदेशक कमलेश देवी बताती हैं कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों को सस्ती तथा टिकाऊ उर्वरक व्यवस्था उपलब्ध कराना था। उनके अनुसार छोटे किसानों को अक्सर पर्याप्त मात्रा में रासायनिक उर्वरक नहीं मिल पाते, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर तैयार बायोफर्टिलाइज़र उनके लिए एक उपयोगी विकल्प साबित हो सकता है।
बायोफर्टिलाइज़र और रासायनिक उर्वरकों में मूलभूत अंतर होता है। जहां रासायनिक उर्वरक सीधे पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं, वहीं बायोफर्टिलाइज़र में मौजूद जीवित सूक्ष्मजीव मिट्टी में पहले से मौजूद पोषक तत्वों को पौधों के लिए अधिक उपलब्ध बनाने का कार्य करते हैं। इससे मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ती है और उसकी गुणवत्ता में सुधार होता है।
इस पहल का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू भी है। टप्पल गांव में महिलाओं को लंबे समय तक केवल घरेलू कार्यों तक सीमित माना जाता रहा है। लेकिन बायोफर्टिलाइज़र उत्पादन ने उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जोगिंदर नामक महिला बताती हैं कि पहले खेती से जुड़े सभी फैसले उनके पति लेते थे, लेकिन अब वे स्वयं खेती के बारे में सुझाव देती हैं और उर्वरक प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। उनके अनुसार इस पहल ने महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाया है और उन्हें परिवार तथा समाज में नई पहचान दी है।
इस सीजन में टप्पल की यह इकाई लगभग 200 किसानों को बायोफर्टिलाइज़र की आपूर्ति कर चुकी है। अधिकांश किसान आसपास के गांवों से हैं, लेकिन इस मॉडल की चर्चा अब अन्य राज्यों तक भी पहुंचने लगी है। सरकार भी प्राकृतिक और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित कर रही है।
हालांकि यह इकाई पिछले वर्ष शुरू की गई थी, लेकिन हालिया वैश्विक तनावों और उर्वरक आपूर्ति को लेकर फैल रही आशंकाओं ने इसकी मांग को और बढ़ा दिया है। भरतपुर गांव के प्रधान अमित चौहान का कहना है कि किसानों में विशेष रूप से यूरिया और डीएपी की उपलब्धता को लेकर चिंता है। कुछ किसानों ने तो पहले से ही उर्वरकों का भंडारण शुरू कर दिया है।
किसान किशन प्रसाद बताते हैं कि उन्होंने धान की खेती के लिए पहले ही यूरिया की 40 बोरियां खरीदकर रख ली हैं। उनके अनुसार बाजार में ऐसी चर्चाएं हैं कि आने वाले समय में उर्वरकों की कमी हो सकती है, इसलिए उन्होंने पहले से तैयारी करना उचित समझा।
कीमत के लिहाज से भी बायोफर्टिलाइज़र किसानों को आकर्षित कर रहे हैं। टप्पल में तैयार किया गया 40 किलोग्राम का बायोफर्टिलाइज़र बैग लगभग 300 रुपये में उपलब्ध है। वहीं 50 किलोग्राम यूरिया की सब्सिडी वाली बोरी 266 रुपये और डीएपी की बोरी लगभग 1,350 रुपये में मिलती है। हालांकि बायोफर्टिलाइज़र पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों का विकल्प नहीं हैं, लेकिन इनके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की खपत कम की जा सकती है।
स्थानीय किसान नीतू बताती हैं कि उन्होंने अपनी बाजरा फसल में बायोफर्टिलाइज़र का उपयोग किया और यूरिया की मात्रा लगभग एक-तिहाई तक कम कर दी, जबकि उत्पादन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। अब वे धान की खेती में भी इसका उपयोग बढ़ाने की योजना बना रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बायोफर्टिलाइज़र कृषि के लिए उपयोगी पूरक हैं, लेकिन फिलहाल वे पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों का स्थान नहीं ले सकते। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिक बृजेश मिश्रा के अनुसार बायोफर्टिलाइज़र पर्यावरण के अनुकूल और किफायती विकल्प हैं, लेकिन इनके लाभ धीरे-धीरे दिखाई देते हैं। साथ ही अलग-अलग फसलों के लिए अलग प्रकार के बायोफर्टिलाइज़र की आवश्यकता होती है।
वे बताते हैं कि कई किसान तुरंत परिणाम की उम्मीद करते हैं और सही संयोजन का उपयोग नहीं करते, जिससे अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए इनके प्रभावी उपयोग के लिए जागरूकता और प्रशिक्षण भी आवश्यक है।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी बायोफर्टिलाइज़र महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने में मदद करते हैं, जिससे कार्बन अवशोषण बढ़ता है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता मिलती है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की 2024 की रिपोर्ट में भी उर्वरकों से होने वाले नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन को जलवायु लक्ष्यों के लिए गंभीर चुनौती बताया गया है। ऐसे में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
टप्पल की महिलाओं के लिए हालांकि यह केवल पर्यावरण या बाजार का मुद्दा नहीं है। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात अपनी मिट्टी की सेहत को फिर से बेहतर बनाना है। संस्था की एक अन्य प्रबंध निदेशक सुमन कहती हैं कि उनके पूर्वजों के समय खेतों की मिट्टी अधिक उपजाऊ और स्वस्थ हुआ करती थी। उनका उद्देश्य उसी मिट्टी की गुणवत्ता को वापस लाना है।
बायोफर्टिलाइज़र की यह पहल दिखाती है कि यदि स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी को सही दिशा मिले तो कृषि क्षेत्र की कई चुनौतियों का समाधान खोजा जा सकता है। टप्पल की महिलाएं केवल उर्वरक नहीं बना रहीं, बल्कि टिकाऊ खेती, महिला सशक्तिकरण और स्वस्थ मिट्टी की नई कहानी भी लिख रही हैं।

