भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका आज भी बेहद महत्वपूर्ण है। देश की लगभग 43 प्रतिशत कार्यशक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है, जबकि राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान करीब 20 प्रतिशत है। ऐसे में कृषि क्षेत्र की मजबूती केवल किसानों की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह पूरे देश की आर्थिक प्रगति, ग्रामीण विकास और खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित करती है।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के अध्यक्ष प्रोफेसर एस. महेंद्र देव ने हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक कॉन्क्लेव में कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने उर्वरक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार किए हैं, जिन्होंने कृषि उत्पादन और संसाधनों के बेहतर उपयोग में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि नीम-कोटेड यूरिया, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), सॉइल हेल्थ कार्ड, नैनो यूरिया, पीएम प्रणाम योजना और न्यूट्रिएंट-बेस्ड सब्सिडी (NBS) जैसी पहलों ने कृषि क्षेत्र को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाने की दिशा में बड़ा योगदान दिया है।
उर्वरक क्षेत्र में सुधारों का प्रभाव
भारत लंबे समय से उर्वरकों पर भारी सब्सिडी देता रहा है ताकि किसानों को कम कीमत पर पोषक तत्व उपलब्ध कराए जा सकें। हालांकि, समय के साथ यह महसूस किया गया कि सब्सिडी का बड़ा हिस्सा कई बार लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता था और उर्वरकों का असंतुलित उपयोग भी बढ़ रहा था। इस समस्या को दूर करने के लिए सरकार ने कई सुधार लागू किए।
नीम-कोटेड यूरिया की शुरुआत ने यूरिया की खपत को अधिक प्रभावी बनाया। इससे यूरिया की चोरी और औद्योगिक उपयोग में कमी आई, जबकि पौधों द्वारा नाइट्रोजन के बेहतर अवशोषण में मदद मिली। इसी तरह डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर प्रणाली ने उर्वरक सब्सिडी वितरण को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया।
सॉइल हेल्थ कार्ड योजना ने किसानों को उनकी मिट्टी की वास्तविक पोषक स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराई। इसके कारण किसान अपनी फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करने लगे, जिससे उत्पादन लागत कम होने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में सहायता मिली।
वहीं नैनो यूरिया जैसी नई तकनीकों ने उर्वरक उपयोग दक्षता को बढ़ाने का रास्ता खोला है। कम मात्रा में अधिक प्रभाव देने वाले इन उत्पादों से भविष्य में पारंपरिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है।
कृषि विकास दर ने दिखाया मजबूती का संकेत
प्रो. महेंद्र देव ने बताया कि 2024-25 में समाप्त हुए दशक के दौरान कृषि और संबद्ध क्षेत्रों ने औसतन 4.4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की। दुनिया की बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं में यह सबसे बेहतर प्रदर्शन माना जा सकता है।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस अवधि में कृषि क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून, बढ़ती उत्पादन लागत और वैश्विक बाजार की अस्थिरता जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र ने लगातार विकास की गति बनाए रखी और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की।
विशेष रूप से पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्रों ने लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर हासिल की, जो कृषि क्षेत्र के भीतर विविधीकरण की बढ़ती संभावनाओं को दर्शाता है। आज कई किसानों की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा डेयरी, पोल्ट्री, बकरी पालन और मछली पालन से आता है। इससे खेती पर निर्भर जोखिम कम हुआ है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिली है।
ग्रामीण समृद्धि से बढ़ती है आर्थिक वृद्धि
प्रो. देव ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती समृद्धि केवल किसानों तक सीमित नहीं रहती। जब किसानों और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ती है, तो उनकी खरीदने की क्षमता भी बढ़ती है। इसका सीधा लाभ उपभोक्ता वस्तुओं, ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, निर्माण सामग्री और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों को मिलता है।
ग्रामीण मांग भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा इंजन है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र का अच्छा प्रदर्शन देश के औद्योगिक उत्पादन और समग्र आर्थिक विकास को भी गति देता है। इसलिए कृषि में निवेश को केवल किसान कल्याण नहीं बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक रणनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए।
पोषण और मिट्टी की सेहत पर अभी और काम जरूरी
हालांकि कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन भारत के सामने अभी भी कुपोषण की गंभीर चुनौती मौजूद है। विशेषकर महिलाओं और बच्चों में पोषण संबंधी समस्याएं चिंता का विषय बनी हुई हैं।
प्रो. महेंद्र देव के अनुसार, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य और संतुलित फसल पोषण का सीधा संबंध मानव पोषण से है। यदि मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होगी तो फसलों की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी, जिसका असर खाद्य पदार्थों के पोषण मूल्य पर पड़ेगा।
यही कारण है कि भविष्य की कृषि नीति केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पोषण-सुरक्षा, मिट्टी की उर्वरता और टिकाऊ खेती पर केंद्रित होनी चाहिए। संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक कार्बन बढ़ाने, सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रबंधन और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देकर ही भारत एक स्वस्थ और पोषण-सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत का उर्वरक और कृषि क्षेत्र पिछले दशक में उल्लेखनीय बदलावों से गुजरा है। नीम-कोटेड यूरिया, डीबीटी, सॉइल हेल्थ कार्ड और नैनो यूरिया जैसी पहलों ने कृषि को अधिक दक्ष और टिकाऊ बनाने में मदद की है। कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्रों की मजबूत वृद्धि दर देश की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए सकारात्मक संकेत है। हालांकि, मिट्टी की सेहत, पोषण सुरक्षा और संसाधनों के संतुलित उपयोग जैसी चुनौतियों पर लगातार ध्यान देना होगा ताकि कृषि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंच सके।

