भारत की कृषि व्यवस्था में यूरिया सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। धान, गेहूं, मक्का, गन्ना और अधिकांश फसलों की अच्छी पैदावार के लिए किसान बड़े पैमाने पर यूरिया का उपयोग करते हैं। लेकिन वर्षों से भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि देश अपनी कुल आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा आयातित यूरिया से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, कच्चे माल की उपलब्धता और भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत के उर्वरक क्षेत्र पर पड़ता है।
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने ग्रीन यूरिया मिशन की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के तहत ग्रीन अमोनिया आधारित यूरिया उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना तैयार की गई है। इसका उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि भारत को उर्वरक उत्पादन में अधिक आत्मनिर्भर बनाना भी है।
ऐसे में सवाल उठता है कि ग्रीन यूरिया मिशन किसानों, उर्वरक कंपनियों और देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए क्या बदलाव लेकर आएगा? आइए विस्तार से समझते हैं।
ग्रीन यूरिया क्या है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ग्रीन यूरिया कोई नया रासायनिक उर्वरक नहीं है। इसकी रासायनिक संरचना वही रहती है जो सामान्य यूरिया की होती है। अंतर केवल इसके उत्पादन की प्रक्रिया में होता है।
आज अधिकांश यूरिया का उत्पादन प्राकृतिक गैस से बनने वाले ग्रे अमोनिया के माध्यम से किया जाता है। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का उत्सर्जन होता है।
इसके विपरीत ग्रीन यूरिया बनाने के लिए पहले नवीकरणीय ऊर्जा (सौर या पवन ऊर्जा) की मदद से पानी का इलेक्ट्रोलिसिस करके ग्रीन हाइड्रोजन तैयार किया जाता है। इसके बाद इस ग्रीन हाइड्रोजन से ग्रीन अमोनिया बनाया जाता है, जिससे आगे यूरिया का उत्पादन होता है। इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन बहुत कम होता है।
यानी किसान जिस यूरिया का उपयोग करेंगे, उसकी गुणवत्ता और उपयोग का तरीका लगभग वही रहेगा, लेकिन उसका उत्पादन पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल होगा।
सरकार का ग्रीन यूरिया मिशन क्या है?
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन अमोनिया उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजना तैयार की है। इसके तहत सरकार हर वर्ष लगभग 7.24 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया की खरीद का लक्ष्य लेकर चल रही है।
सरकार ने ग्रीन यूरिया संयंत्र स्थापित करने के लिए उद्योग से रुचि की अभिव्यक्ति (EOI) आमंत्रित की है। साथ ही, नई एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया परियोजनाओं के विकास के लिए लगभग 19,744 करोड़ रुपये की सहायता उपलब्ध करा रहा है।
इस योजना के तहत सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) ग्रीन अमोनिया खरीदेगा और घरेलू उर्वरक कंपनियों को उपलब्ध कराएगा। यदि ग्रीन अमोनिया की कीमत ग्रे अमोनिया से अधिक होगी, तो दोनों के बीच का अंतर सरकार वहन करेगी।
किसानों को क्या फायदा होगा?
- यूरिया की उपलब्धता अधिक स्थिर होगी
भारत हर वर्ष बड़ी मात्रा में यूरिया आयात करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में संकट आता है या सप्लाई बाधित होती है, तो इसका असर देश के किसानों पर पड़ सकता है।
ग्रीन यूरिया मिशन से घरेलू उत्पादन बढ़ेगा, जिससे भविष्य में आयात पर निर्भरता कम होगी और किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
- सब्सिडी व्यवस्था अधिक टिकाऊ बन सकती है
भारत सरकार हर वर्ष उर्वरक सब्सिडी पर भारी खर्च करती है। यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है और आयात कम होता है, तो लंबे समय में सब्सिडी व्यवस्था अधिक स्थिर और प्रभावी हो सकती है।
- वैश्विक संकट का असर कम होगा
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव या प्राकृतिक गैस की कीमतों में वृद्धि जैसे घटनाक्रम यूरिया उत्पादन को प्रभावित करते हैं। ग्रीन हाइड्रोजन आधारित उत्पादन से इन जोखिमों में कमी आ सकती है।
- पर्यावरण के लिए बेहतर खेती
ग्रीन यूरिया का उद्देश्य खेत में अलग तरह का उर्वरक देना नहीं, बल्कि उसके उत्पादन के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना है। इससे कृषि क्षेत्र का कुल कार्बन फुटप्रिंट घटाने में मदद मिलेगी।
क्या किसानों को ग्रीन यूरिया अलग से खरीदना होगा?
नहीं। वर्तमान योजना के अनुसार किसानों को अलग से किसी “ग्रीन यूरिया” उत्पाद की तलाश नहीं करनी होगी। उत्पादन प्रक्रिया बदलेगी, लेकिन अंतिम उत्पाद सामान्य यूरिया जैसा ही रहेगा। यदि भविष्य में इसे अलग ब्रांडिंग के साथ बाजार में लाया जाता है, तब सरकार और कंपनियां इसकी जानकारी देंगी।
उर्वरक उद्योग के लिए क्या बदलेगा?
- नई तकनीकों में निवेश बढ़ेगा
उर्वरक कंपनियों को ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रोलाइजर, नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रीन अमोनिया उत्पादन जैसी नई तकनीकों में निवेश करना होगा। इससे उद्योग आधुनिक और ऊर्जा दक्ष बनेगा।
- प्राकृतिक गैस पर निर्भरता घटेगी
वर्तमान में अधिकांश यूरिया संयंत्र प्राकृतिक गैस पर आधारित हैं। ग्रीन हाइड्रोजन के उपयोग से भविष्य में गैस पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सकती है।
- नए रोजगार और उद्योग विकसित होंगे
ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और कार्बन कैप्चर जैसी तकनीकों में नए उद्योग विकसित होंगे। इससे इंजीनियरिंग, विनिर्माण और ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
- निर्यात की संभावना
यदि भारत बड़े पैमाने पर कम-कार्बन उर्वरक उत्पादन में सफल होता है, तो भविष्य में ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया से जुड़े उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
क्या चुनौतियां भी हैं?
ग्रीन यूरिया मिशन जितना महत्वाकांक्षी है, उतनी ही बड़ी इसकी चुनौतियां भी हैं।
उच्च उत्पादन लागत: फिलहाल ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया का उत्पादन पारंपरिक तकनीक की तुलना में महंगा है। इसलिए सरकार को लागत अंतर की भरपाई करनी होगी।
बड़ी बिजली आवश्यकता: ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में सस्ती और निरंतर नवीकरणीय बिजली की जरूरत होगी।
इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण: भारत को इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण क्षमता तेजी से बढ़ानी होगी ताकि आयात पर निर्भरता कम हो।
नई अवसंरचना: ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया के भंडारण, परिवहन और उपयोग के लिए नई अवसंरचना विकसित करनी होगी।
पुराने संयंत्रों का आधुनिकीकरण: देश के कई यूरिया संयंत्र 30 वर्ष से अधिक पुराने हैं। उन्हें नई तकनीक के अनुरूप अपग्रेड करना समय और निवेश दोनों की मांग करेगा।
क्या इससे यूरिया की कीमत बढ़ेगी?
सरकार की मौजूदा योजना के अनुसार किसानों पर अतिरिक्त कीमत का बोझ डालने का उद्देश्य नहीं है। ग्रीन अमोनिया और ग्रे अमोनिया की लागत के बीच का अंतर सरकार वहन करने की तैयारी कर रही है। इसलिए शुरुआती चरण में किसानों के लिए यूरिया की कीमत में बड़ा बदलाव होने की संभावना कम मानी जा रही है। हालांकि भविष्य की कीमतें सरकार की सब्सिडी नीति, उत्पादन लागत और बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी।
भविष्य की दिशा
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। उर्वरक उद्योग देश के उन क्षेत्रों में शामिल है जहां कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत अधिक होता है। ऐसे में ग्रीन यूरिया मिशन केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, कृषि सुरक्षा और जलवायु रणनीति का संयुक्त प्रयास है।
यदि सरकार, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र मिलकर इस योजना को सफलतापूर्वक लागू करते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल आयातित यूरिया पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा, बल्कि ग्रीन हाइड्रोजन आधारित उर्वरक उत्पादन में भी वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
ग्रीन यूरिया मिशन भारत की कृषि और उर्वरक नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य किसानों तक यूरिया की स्थिर उपलब्धता सुनिश्चित करना, आयात पर निर्भरता कम करना, उर्वरक उद्योग को आधुनिक बनाना और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन प्रणाली विकसित करना है।
हालांकि इस मिशन को सफल बनाने के लिए भारी निवेश, नई तकनीक, मजबूत नीतिगत समर्थन और उद्योग की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होगी। यदि ये सभी पहलू योजनानुसार आगे बढ़ते हैं, तो ग्रीन यूरिया मिशन आने वाले दशक में भारतीय कृषि, उर्वरक उद्योग और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक परिवर्तन साबित हो सकता है।

