भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देशों में से एक है, जहां फसलों की अच्छी पैदावार के लिए उर्वरकों का व्यापक उपयोग किया जाता है। इनमें यूरिया सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। हर साल करोड़ों किसान धान, गेहूं, गन्ना, मक्का और अन्य फसलों में यूरिया का प्रयोग करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी ग्रीन यूरिया (Green Urea) के बारे में सुना है?
हाल के वर्षों में ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया की चर्चा तेजी से बढ़ी है। इसी के साथ ग्रीन यूरिया भी कृषि और उर्वरक उद्योग में एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। केंद्र सरकार भी राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ग्रीन यूरिया उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि ग्रीन यूरिया क्या है, यह कैसे बनता है और किसानों के लिए इसका क्या महत्व है।
ग्रीन यूरिया क्या है?
ग्रीन यूरिया ऐसा यूरिया है, जिसे ग्रीन अमोनिया (Green Ammonia) के माध्यम से तैयार किया जाता है। यह सामान्य यूरिया की तरह ही नाइट्रोजन उर्वरक है और इसकी रासायनिक संरचना (CO(NH₂)₂) भी वही रहती है। यानी खेत में इसका उपयोग, फसलों पर प्रभाव और पौधों को मिलने वाली नाइट्रोजन सामान्य यूरिया के समान ही होती है।
असल अंतर इसके उत्पादन की प्रक्रिया में होता है। पारंपरिक यूरिया बनाने में प्राकृतिक गैस का उपयोग किया जाता है, जिससे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का उत्सर्जन होता है। वहीं ग्रीन यूरिया के उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन काफी कम हो जाता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो ग्रीन यूरिया कोई नया उर्वरक नहीं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल तरीके से तैयार किया गया यूरिया है।
सामान्य यूरिया कैसे बनता है?
आज दुनिया के अधिकांश यूरिया संयंत्र प्राकृतिक गैस पर आधारित हैं। इस प्रक्रिया में सबसे पहले प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन तैयार किया जाता है। फिर हाइड्रोजन और हवा से प्राप्त नाइट्रोजन को मिलाकर अमोनिया बनाया जाता है। इसके बाद अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड की प्रतिक्रिया से यूरिया तैयार किया जाता है।
हालांकि यह प्रक्रिया प्रभावी और स्थापित है, लेकिन इसमें बड़ी मात्रा में जीवाश्म ईंधन का उपयोग होता है और कार्बन उत्सर्जन भी अधिक होता है। यही कारण है कि इसे पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ नहीं माना जाता।
ग्रीन यूरिया कैसे बनता है?
ग्रीन यूरिया के उत्पादन की प्रक्रिया आधुनिक और स्वच्छ ऊर्जा पर आधारित होती है। इसमें सबसे पहले सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से बिजली तैयार की जाती है। इस बिजली की मदद से पानी (H₂O) का इलेक्ट्रोलिसिस किया जाता है, जिससे ग्रीन हाइड्रोजन प्राप्त होता है।
इसके बाद वातावरण से नाइट्रोजन अलग करके ग्रीन हाइड्रोजन के साथ मिलाया जाता है, जिससे ग्रीन अमोनिया बनता है। अंत में इसी ग्रीन अमोनिया से यूरिया तैयार किया जाता है।
चूंकि इस पूरी प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन का उपयोग बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता, इसलिए इसे ग्रीन यूरिया उत्पादन कहा जाता है।
ग्रीन यूरिया की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत हर वर्ष बड़ी मात्रा में यूरिया का उत्पादन करता है, लेकिन इसके बावजूद देश को अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए लाखों टन यूरिया का आयात भी करना पड़ता है। इसके अलावा घरेलू यूरिया उत्पादन का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस पर आधारित है, जिसका एक बड़ा भाग विदेशों से आयात किया जाता है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक गैस या यूरिया की कीमतें बढ़ती हैं या वैश्विक संकट पैदा होता है, तो इसका असर भारत के उर्वरक क्षेत्र पर भी पड़ता है। ऐसे में ग्रीन यूरिया उत्पादन भारत को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सरकार की क्या योजना है?
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) के तहत ग्रीन अमोनिया आधारित यूरिया उत्पादन को बढ़ावा देने का रोडमैप तैयार किया है।
सरकार की योजना के अनुसार देश में नए ग्रीन यूरिया संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। ग्रीन अमोनिया के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय सहायता भी दी जाएगी। सरकार ने ग्रीन अमोनिया की खरीद के लिए विशेष व्यवस्था बनाई है ताकि शुरुआती वर्षों में अधिक लागत के बावजूद उद्योग को आर्थिक सहायता मिल सके।
इसका उद्देश्य भविष्य में भारत को कम-कार्बन उर्वरक उत्पादन की दिशा में अग्रणी देशों में शामिल करना है।
किसानों को क्या लाभ होगा?
ग्रीन यूरिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसानों को भविष्य में यूरिया की उपलब्धता अधिक स्थिर हो सकती है। यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो आयात पर निर्भरता कम होगी और वैश्विक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर भी कम पड़ेगा।
दूसरा, यदि ग्रीन यूरिया उत्पादन सफल होता है तो सरकार पर आयात का बोझ घट सकता है। इससे लंबे समय में उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन तकनीक अपनाने से कृषि क्षेत्र का कार्बन फुटप्रिंट कम होगा, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
क्या ग्रीन यूरिया सामान्य यूरिया से बेहतर है?
पोषक तत्वों की दृष्टि से ग्रीन यूरिया और सामान्य यूरिया में कोई अंतर नहीं होता। दोनों में नाइट्रोजन की मात्रा लगभग समान रहती है और दोनों का उपयोग एक ही तरीके से किया जाता है।
फर्क केवल यह है कि ग्रीन यूरिया का निर्माण कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक से होता है। इसलिए इसे पर्यावरण की दृष्टि से अधिक टिकाऊ माना जाता है।
क्या चुनौतियां भी हैं?
ग्रीन यूरिया उत्पादन के सामने कई चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती इसकी अधिक उत्पादन लागत है। वर्तमान समय में ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करना प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन बनाने की तुलना में महंगा है।
इसके अलावा बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रोलाइजर, ग्रीन हाइड्रोजन भंडारण, ग्रीन अमोनिया उत्पादन और नई औद्योगिक अवसंरचना की आवश्यकता होगी। इन सभी क्षेत्रों में भारी निवेश करना पड़ेगा।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे तकनीक विकसित होगी और उत्पादन बढ़ेगा, वैसे-वैसे लागत भी कम होती जाएगी।
निष्कर्ष
ग्रीन यूरिया भारत के उर्वरक उद्योग में एक नई सोच का प्रतिनिधित्व करता है। यह कोई अलग उर्वरक नहीं है, बल्कि यूरिया बनाने की ऐसी आधुनिक तकनीक है जो स्वच्छ ऊर्जा पर आधारित है और कार्बन उत्सर्जन को कम करती है। इससे भविष्य में भारत की उर्वरक आत्मनिर्भरता मजबूत हो सकती है, प्राकृतिक गैस और आयात पर निर्भरता घट सकती है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि इसके सामने लागत, तकनीक और बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन यदि सरकार और उद्योग मिलकर इस दिशा में सफलतापूर्वक काम करते हैं तो आने वाले वर्षों में ग्रीन यूरिया भारतीय कृषि और उर्वरक क्षेत्र के लिए एक बड़ा परिवर्तन साबित हो सकता है। यह पहल किसानों, उद्योग और पर्यावरण—तीनों के लिए दीर्घकालिक लाभ लेकर आने की क्षमता रखती है।

