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Home कृषि समाचार

खेत बचाओ अभियान के तहत अविकानगर में किसान सम्मेलन आयोजित, टिकाऊ खेती और कृषि-पशुपालन मॉडल पर विशेषज्ञों ने साझा किए महत्वपूर्ण सुझाव

खेत बचाओ अभियान के तहत अविकानगर में किसान सम्मेलन आयोजित, टिकाऊ खेती.

Emran Khan by Emran Khan
June 29, 2026
in कृषि समाचार
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खेत बचाओ अभियान के तहत अविकानगर में किसान सम्मेलन आयोजित, टिकाऊ खेती और कृषि-पशुपालन मॉडल पर विशेषज्ञों ने साझा किए महत्वपूर्ण सुझाव
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किसानों को टिकाऊ कृषि तकनीकों, प्राकृतिक खेती और कृषि-पशुपालन आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (ICAR-CSWRI), अविकानगर में “खेत बचाओ अभियान” और फार्मर फर्स्ट परियोजना (Farmer FIRST Programme) के तहत स्वयं सहायता समूह (SHGs), किसान उत्पादक संगठन (FPOs), कस्टम हायरिंग सेंटर (CHCs) और प्रगतिशील किसानों का संयुक्त सम्मेलन आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों ने बदलते जलवायु परिदृश्य के बीच टिकाऊ खेती, मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण और आधुनिक कृषि-पशुपालन तकनीकों पर विस्तार से जानकारी दी।

इस सम्मेलन का उद्देश्य किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और कृषि संगठनों को वैज्ञानिक खेती की नई तकनीकों से जोड़ना तथा कृषि को अधिक लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए जागरूक करना था। कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

टिकाऊ खेती को बताया भविष्य की आवश्यकता

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. अरुण कुमार तोमर, निदेशक, ICAR-केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर ने कहा कि वर्तमान समय में कृषि केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए टिकाऊ कृषि प्रणाली अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की उर्वरता में कमी और बढ़ती उत्पादन लागत जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए किसानों को वैज्ञानिक खेती के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

उन्होंने किसानों से कृषि और पशुपालन को एक साथ अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि एकीकृत कृषि प्रणाली किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

मृदा संरक्षण और संतुलित उर्वरक उपयोग पर विशेष जोर

सम्मेलन के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने मृदा स्वास्थ्य को खेती की सफलता की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला बताया।

विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी कि खेतों में उर्वरकों का प्रयोग केवल आवश्यकता और मृदा परीक्षण के आधार पर करें। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग न केवल उत्पादन लागत बढ़ाता है बल्कि लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित करता है।

उन्होंने किसानों को संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सलाह दी ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे और फसल उत्पादन में निरंतर सुधार हो सके।

प्राकृतिक खेती से घटेगी लागत, बढ़ेगी मिट्टी की गुणवत्ता

कार्यक्रम में प्राकृतिक खेती के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

वैज्ञानिकों ने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से

  • मिट्टी की जैविक गुणवत्ता बेहतर होती है।
  • उत्पादन लागत कम होती है।
  • रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है।
  • पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
  • लंबे समय तक खेती की उत्पादकता बनी रहती है।

उन्होंने किसानों को स्थानीय संसाधनों के उपयोग, जैविक खाद, जीवामृत, गोबर आधारित पोषक तत्वों और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

कृषि और पशुपालन का एकीकृत मॉडल बढ़ाएगा किसानों की आय

डॉ. अरुण कुमार तोमर ने अपने संबोधन में कृषि और पशुपालन आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System) को किसानों के लिए सबसे प्रभावी मॉडल बताया।

उन्होंने कहा कि यदि किसान फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, चारा उत्पादन और जैविक खाद निर्माण को जोड़ते हैं, तो उनकी आय के कई स्रोत विकसित हो सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार इस मॉडल से

  • खेतों में जैविक खाद की उपलब्धता बढ़ती है।
  • पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था आसान होती है।
  • खेती की लागत कम होती है।
  • किसानों को पूरे वर्ष नियमित आय प्राप्त होती है।

100 से अधिक प्रतिभागियों ने लिया सम्मेलन में हिस्सा

सम्मेलन में विभिन्न वर्गों के प्रतिभागियों ने भाग लिया।

इनमें शामिल थे—

  • स्वयं सहायता समूह (SHG) की महिला सदस्य
  • किसान उत्पादक संगठन (FPO) के प्रतिनिधि
  • कस्टम हायरिंग सेंटर संचालक
  • प्रगतिशील किसान
  • मालपुरा एवं टोंक क्षेत्र के किसान
  • पशु चिकित्सा के अंतिम वर्ष के इंटर्न विद्यार्थी

प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से खेती और पशुपालन से जुड़े विभिन्न विषयों पर जानकारी प्राप्त की तथा अपने अनुभव भी साझा किए।

विशेषज्ञों ने साझा की वैज्ञानिक खेती की आधुनिक जानकारी

कार्यक्रम के दौरान संस्थान के कई वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से परिचित कराया।

इस अवसर पर—

  • डॉ. एस.एस. मिश्रा (विभागाध्यक्ष, पशु आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग)
  • डॉ. एस.एस. डांगी (प्रधान अन्वेषक, फार्मर फर्स्ट परियोजना)
  • डॉ. लीलाराम गुर्जर
  • डॉ. राजेश बिश्नोई
  • डॉ. मेघा पांडे

ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए।

उन्होंने किसानों को कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पशुधन प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य सुधार, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने की सलाह दी।

जल संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य पर दी गई महत्वपूर्ण जानकारी

बदलते मौसम और जल संकट को देखते हुए विशेषज्ञों ने जल संरक्षण को कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।

किसानों को वर्षा जल संरक्षण, खेत में नमी बनाए रखने, सिंचाई जल के कुशल उपयोग और मिट्टी के कटाव को रोकने के उपायों की जानकारी दी गई।

साथ ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक कार्बन बढ़ाने, फसल चक्र अपनाने और हरी खाद के उपयोग पर भी विशेष जोर दिया गया।

कस्टम हायरिंग सेंटर की भूमिका पर भी हुई चर्चा

सम्मेलन में कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) की भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

विशेषज्ञों ने बताया कि छोटे और सीमांत किसान महंगे कृषि उपकरण खरीदने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में कस्टम हायरिंग सेंटर के माध्यम से वे कम लागत पर आधुनिक कृषि मशीनों का उपयोग कर सकते हैं।

इससे समय की बचत, श्रम लागत में कमी और खेती की दक्षता बढ़ती है।

महिला स्वयं सहायता समूहों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा

कार्यक्रम में स्वयं सहायता समूहों की महिला सदस्यों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई।

वैज्ञानिकों ने महिलाओं को कृषि आधारित स्वरोजगार, पशुपालन, ऊन उत्पादन, जैविक खाद निर्माण और मूल्य संवर्धन गतिविधियों से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि महिला समूहों की सक्रिय भागीदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

संस्थान भ्रमण के दौरान देखीं अनुसंधान गतिविधियां

सम्मेलन के बाद प्रतिभागियों को संस्थान का भ्रमण भी कराया गया।

इस दौरान किसानों ने विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं, पशुधन विकास कार्यक्रमों, चारा उत्पादन तकनीकों और अनुसंधान प्रयोगशालाओं की जानकारी प्राप्त की।

वैज्ञानिकों ने उन्हें बताया कि संस्थान में विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

किसानों और वैज्ञानिकों के बीच हुआ सीधा संवाद

कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा किसानों और वैज्ञानिकों के बीच सीधा संवाद रहा।

किसानों ने खेती, पशुपालन, उर्वरक प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और बाजार से जुड़े कई प्रश्न पूछे।

विशेषज्ञों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक समाधान सुझाए और किसानों को नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

ICAR-केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI), अविकानगर द्वारा आयोजित यह संयुक्त किसान सम्मेलन किसानों को वैज्ञानिक, टिकाऊ और जलवायु अनुकूल कृषि प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। कार्यक्रम में मृदा संरक्षण, प्राकृतिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग, जल संरक्षण, कृषि-पशुपालन आधारित एकीकृत कृषि प्रणाली और आधुनिक कृषि तकनीकों पर उपयोगी जानकारी साझा की गई। स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों और प्रगतिशील किसानों की सक्रिय भागीदारी ने इस सम्मेलन को और अधिक प्रभावी बनाया। ऐसे कार्यक्रम न केवल किसानों को नई तकनीकों से जोड़ते हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि और आय वृद्धि की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

Tags: AgricultureFamrngIndia
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