• About
  • Advertise
  • Privacy & Policy
  • Contact
Fasal Kranti Agriculture News
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
  • Login
No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
No Result
View All Result
Fasal Kranti Agriculture News
No Result
View All Result
Home कृषि समाचार

पारंपरिक मछुआरों के अधिकार और आजीविका संरक्षण पर सरकार का जोर, आरक्षित क्षेत्रों में निगरानी होगी मजबूत

Government emphasizes protecting the rights and livelihoods of traditional fishermen; surveillance in reserved areas to be strengthened.

Emran Khan by Emran Khan
August 13, 2026
in कृषि समाचार
0
कृत्रिम प्रवाल भित्तियों से बढ़ेगा मछली भंडार

कृत्रिम प्रवाल भित्तियों से बढ़ेगा मछली भंडार

0
SHARES
5
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

देश के तटीय क्षेत्रों में पारंपरिक मछुआरों की आजीविका और मछली पकड़ने के अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कई स्तरों पर कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार ने पारंपरिक और गैर-यांत्रिक मछुआरों के लिए समुद्री क्षेत्रों को सुरक्षित रखने, आधुनिक तकनीक से निगरानी बढ़ाने, मछली संसाधनों के संरक्षण और मछुआरा परिवारों को सामाजिक सुरक्षा देने पर जोर दिया है।

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि तटीय राज्यों द्वारा समुद्र में मछली पकड़ने को संबंधित विनियमन अधिनियमों के तहत नियंत्रित किया जाता है। सामान्य तौर पर आधार रेखा से 12 समुद्री मील तक का समुद्री क्षेत्र तटीय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

पारंपरिक मछुआरों के लिए आरक्षित क्षेत्र

समुद्री मत्स्य-ग्रहण विनियमन अधिनियमों के तहत कई तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अलग-अलग श्रेणी की मत्स्य नौकाओं और जहाजों के लिए विशेष मत्स्य क्षेत्र निर्धारित किए हैं।

आमतौर पर तट से 5 से 10 किलोमीटर तक का निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र पारंपरिक और गैर-यांत्रिक मछली पकड़ने वाली नौकाओं के लिए आरक्षित रखा जाता है। इसका उद्देश्य छोटे और पारंपरिक मछुआरों की आजीविका की रक्षा करना है।

आरक्षित क्षेत्रों से यंत्रीकृत नौकाओं को दूर रखने से न केवल पारंपरिक मछुआरों को मछली पकड़ने का सुरक्षित अवसर मिलता है, बल्कि मछली पकड़ने के अलग-अलग तरीकों और उपकरणों को लेकर होने वाले विवादों को कम करने में भी मदद मिलती है। साथ ही समुद्री संसाधनों के अत्यधिक दोहन को नियंत्रित करने में भी यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है।

संयुक्त गश्त और तकनीक से होगी निगरानी

पारंपरिक मछुआरों के लिए निर्धारित क्षेत्रों में यंत्रीकृत मछली पकड़ने वाले जहाजों की अवैध घुसपैठ रोकने के लिए राज्य के मत्स्य विभाग और प्रवर्तन एजेंसियां भारतीय तटरक्षक बल के साथ मिलकर संयुक्त गश्त करते हैं।

इसके अलावा सरकार ने निगरानी व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने पर भी जोर दिया है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना यानी पीएमएमएसवाई के तहत यंत्रीकृत और मोटरयुक्त मत्स्य पालन जहाजों पर उपग्रह आधारित ट्रांसपोंडर लगाए गए हैं।

इन उपकरणों को जियोफेंसिंग तकनीक से जोड़ा गया है। जियोफेंसिंग के माध्यम से किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के चारों ओर डिजिटल सीमा बनाई जा सकती है। यदि कोई जहाज पारंपरिक मछुआरों के लिए आरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो संबंधित अधिकारियों को वास्तविक समय में इसकी जानकारी और स्वचालित अलर्ट मिल सकता है।

इससे समुद्र में निगरानी को मजबूत करने के साथ-साथ पारंपरिक मछुआरों के हितों की रक्षा में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

ब्लू इकोनॉमी में मछुआरों की अहम भूमिका

सरकार के अनुसार, ब्लू इकोनॉमी यानी समुद्री संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था में मत्स्य पालन सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। भारत में समुद्री संसाधनों के टिकाऊ उपयोग और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग पहल की जा रही हैं।

केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भारत की ब्लू इकोनॉमी के लिए राष्ट्रीय नीति का मसौदा तैयार कर रहा है। वहीं, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय की सागरमाला परियोजना का उद्देश्य बंदरगाह आधारित विकास को बढ़ावा देना है।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि बंदरगाह आधारित परियोजनाओं के विकास के दौरान स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन किया जाना आवश्यक है।

परियोजनाओं में सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन

सागरमाला के तहत किसी परियोजना के प्रस्तावक को संबंधित क्षेत्र में बसे समुदाय और पर्यावरण पर संभावित प्रभावों के आकलन के लिए सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव रिपोर्ट तैयार करनी होती है।

इसके साथ ही परियोजना के कारण होने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए सामाजिक और पर्यावरणीय प्रबंधन योजना भी तैयार और लागू की जानी होती है।

सरकार के अनुसार, सागरमाला के तटीय समुदाय विकास कार्यक्रम के तहत तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की आजीविका में सुधार के लिए भी परियोजनाएं लागू की जा रही हैं। इसका उद्देश्य तटीय विकास के साथ वहां रहने वाले मछुआरा समुदायों के हितों को भी ध्यान में रखना है।

तटीय विनियमन में मछुआरों की चिंताओं को महत्व

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तटीय विनियमन क्षेत्र से जुड़े मामलों का नोडल मंत्रालय है। मंत्रालय समय-समय पर जारी तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचनाओं की समीक्षा करता है।

तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विभिन्न हितधारकों से प्राप्त सुझावों और प्रस्तावों के आधार पर तटीय बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित नियमों की समीक्षा की जाती है। इस प्रक्रिया में मछुआरा समुदाय की चिंताओं को भी शामिल किया जाता है।

इसका उद्देश्य तटीय क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम करना है, ताकि विकास परियोजनाओं के कारण पारंपरिक मछुआरों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव कम से कम पड़े।

2025 के ईईजेड नियमों में संरक्षण पर जोर

समुद्री मत्स्य संसाधनों के सतत उपयोग और छोटे एवं पारंपरिक मछुआरों के कल्याण के लिए केंद्र सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) में मत्स्य ग्रहण के सतत दोहन संबंधी नियम, 2025 अधिसूचित किए हैं।

इन नियमों में समुद्री मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। इनमें मत्स्य प्रबंधन में पारितंत्र आधारित दृष्टिकोण अपनाना, मछलियों के प्रजनन काल के दौरान मछली पकड़ने पर प्रतिबंध, मछलियों के लिए निर्धारित वैधानिक न्यूनतम आकार का पालन और आकस्मिक पकड़ यानी बायकैच को कम करने के उपाय शामिल हैं।

इसके अलावा विनाशकारी तरीके से मछली पकड़ने और छोटे आकार की मछलियों को पकड़ने पर रोक लगाने तथा मछली पकड़ने के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बेहतर प्रथाओं को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है।

सालाना 61 दिन मछली पकड़ने पर प्रतिबंध

समुद्री मत्स्य संसाधनों के संरक्षण, मछली भंडार बढ़ाने और समुद्र में मछुआरों की सुरक्षा के लिए भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में मछलियों के प्रजनन के चरम मौसम के दौरान 61 दिनों का वार्षिक मत्स्य-ग्रहण प्रतिबंध लागू किया जाता है।

तटीय राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भी अपने क्षेत्रीय जलक्षेत्र में इसी तरह का प्रतिबंध लागू करते हैं। उनके प्रतिबंध कार्यक्रम को केंद्र सरकार के मत्स्य विभाग द्वारा अधिसूचित प्रतिबंध के अनुरूप रखा जाता है।

इस प्रतिबंध का उद्देश्य मछलियों को प्रजनन के लिए पर्याप्त समय देना और भविष्य के लिए समुद्री मछली भंडार को बनाए रखना है।

प्रतिबंध अवधि में पारंपरिक मछुआरों को सहायता

मछली पकड़ने पर प्रतिबंध की अवधि या कम उत्पादन वाले समय में पारंपरिक मछुआरा परिवारों के सामने आय और पोषण से जुड़ी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इसे ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े सक्रिय पारंपरिक मछुआरा परिवारों को आजीविका एवं पोषण संबंधी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

इसके अलावा सक्रिय मछुआरों के लिए समूह दुर्घटना बीमा योजना भी संचालित की जाती है। इसका उद्देश्य समुद्र में मछली पकड़ने के दौरान दुर्घटना की स्थिति में मछुआरों और उनके परिवारों को सामाजिक सुरक्षा तथा जोखिम से संरक्षण प्रदान करना है।

कृत्रिम प्रवाल भित्तियों से बढ़ेगा मछली भंडार

पीएमएमएसवाई के तहत सरकार ने पहली बार देश के तटीय क्षेत्रों में समुद्री मत्स्य पालन और कृत्रिम प्रवाल भित्तियों (Artificial Reef) की स्थापना के लिए समर्पित सहायता का प्रावधान किया है।

कृत्रिम प्रवाल भित्तियां समुद्री जीवों के लिए आवास उपलब्ध कराने में मदद करती हैं। इनसे समुद्री पर्यावास के क्षरण को कम करने, मछली भंडार बढ़ाने और तटीय मछुआरों की आजीविका को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।

इस तरह की पहल का उद्देश्य समुद्री पारिस्थितिकी को मजबूत करने के साथ मछुआरों के लिए भविष्य में अधिक टिकाऊ मत्स्य संसाधन उपलब्ध कराना है।

समुद्री शैवाल और पिंजरा मत्स्य पालन को बढ़ावा

समुद्र में पारंपरिक मछली पकड़ने के दबाव को कम करने के लिए सरकार समुद्री कृषि से जुड़ी गतिविधियों को भी बढ़ावा दे रही है। पीएमएमएसवाई के तहत समुद्री शैवाल की खेती और खुले समुद्र में पिंजरा मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इन गतिविधियों से मछुआरों के लिए आय के वैकल्पिक स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। साथ ही समुद्री संसाधनों का अधिक विविध और टिकाऊ उपयोग संभव हो सकता है।

100 तटीय गांवों को बनाया जाएगा जलवायु-अनुकूल

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए पीएमएमएसवाई के तहत 100 तटीय मछुआरा गांवों को जलवायु-अनुकूल तटीय मछुआरा गांव के रूप में विकसित करने की योजना भी शामिल है।

चयनित गांवों को तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर आवश्यकता आधारित सहायता प्रदान की जाएगी। इसमें बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ आजीविका बढ़ाने वाली गतिविधियों पर भी ध्यान दिया जाएगा।

इस पहल का लक्ष्य तटीय गांवों को आर्थिक रूप से अधिक सक्षम और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए अधिक तैयार बनाना है।

विकास के साथ आजीविका और पर्यावरण संरक्षण

सरकार की मौजूदा पहलों से स्पष्ट है कि तटीय क्षेत्रों में विकास को केवल बंदरगाह, बुनियादी ढांचे या समुद्री अर्थव्यवस्था के विस्तार तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। इसके साथ पारंपरिक मछुआरों की आजीविका, समुद्री जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व दिया जा रहा है।

आरक्षित मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों की निगरानी, उपग्रह आधारित ट्रांसपोंडर, जियोफेंसिंग, मछली पकड़ने पर मौसमी प्रतिबंध, कृत्रिम प्रवाल भित्तियां और मछुआरों के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसी पहलें इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा हैं।

कुल मिलाकर, सरकार का प्रयास समुद्री संसाधनों के संरक्षण और तटीय समुदायों की आर्थिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने का है। पारंपरिक मछुआरों के लिए सुरक्षित समुद्री क्षेत्र और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, वैकल्पिक समुद्री गतिविधियों और जलवायु-अनुकूल गांवों के विकास पर जोर दिया जा रहा है। इससे देश की नीली अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ पारंपरिक मछुआरा समुदायों की आजीविका को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।

 

Tags: AgricultureFarmingIndian Agriculture
Previous Post

पीएम-एमकेएसएसवाई से मत्स्य क्षेत्र को मिलेगी नई रफ्तार, 1.70 लाख रोजगार सृजन का लक्ष्य

Next Post

Bihar Tarkari Sudha Outlet: सुधा की तर्ज पर खुलेंगे ‘तरकारी सुधा’ बूथ, सीधे बाजार तक पहुंचेगी किसानों की सब्जी

Next Post
Bihar Tarkari Sudha Outlet

Bihar Tarkari Sudha Outlet: सुधा की तर्ज पर खुलेंगे ‘तरकारी सुधा’ बूथ, सीधे बाजार तक पहुंचेगी किसानों की सब्जी

Recent Posts

  • मत्स्य पालन क्षेत्र के समग्र विकास पर सरकार का जोर, बीमा से लेकर बुनियादी ढांचे तक कई योजनाएं लागू
  • Bihar Tarkari Sudha Outlet: सुधा की तर्ज पर खुलेंगे ‘तरकारी सुधा’ बूथ, सीधे बाजार तक पहुंचेगी किसानों की सब्जी
  • पारंपरिक मछुआरों के अधिकार और आजीविका संरक्षण पर सरकार का जोर, आरक्षित क्षेत्रों में निगरानी होगी मजबूत
  • पीएम-एमकेएसएसवाई से मत्स्य क्षेत्र को मिलेगी नई रफ्तार, 1.70 लाख रोजगार सृजन का लक्ष्य
  • Mustard Farming: सही बुवाई से बेहतर पैदावार तक, जानें मिट्टी, समय, कीट प्रबंधन और सरकारी सहायता की पूरी जानकारी

Recent Comments

No comments to show.
Fasal Kranti is a leading monthly agricultural magazine dedicated to empowering Indian farmers. Published scince 2013 in Hindi, Punjabi, Marathi, and Gujarati, it provides valuable insights, modern farming techniques, and the latest agricultural updates. With a vision to support 21st-century farmers, Fasal Kranti strives to be a trusted source of knowledge and innovation in the agricultural sector.

Category

  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes

Newsletter

Subscribe to our Newsletter. You choose the topics of your interest and we’ll send you handpicked news and latest updates based on your choice.

Quick Links

  • Privacy policy
  • Terms and Conditions

Contact

Promote your brand with Fasalkranti. Connect with us for advertising.
  • E-Mail: info@fasalkranti.in
  • Phone: +91 9625941688
Copyrights © 2026. Fasal Kranti, Inc. All Rights Reserved. Maintained By Fasalkranti Team .

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry

© 2026 Fasalkranti - News and Magazine by Fasalkranti news.