भारत में टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) की दिशा में तेजी से बदलाव हो रहा है। रासायनिक कृषि इनपुट्स पर बढ़ती निर्भरता, जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट और सुरक्षित खाद्य उत्पादन की बढ़ती मांग ने कृषि जैविक (Biologicals) उत्पादों की आवश्यकता को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया है। बायो-फर्टिलाइजर, बायो-पेस्टीसाइड, बायो-स्टिमुलेंट और माइक्रोबियल आधारित उत्पाद अब केवल वैकल्पिक समाधान नहीं रह गए हैं, बल्कि भविष्य की कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं।
इसी परिप्रेक्ष्य में किसान-विज्ञान फ़ाउंडेशन (KAKV) द्वारा जारी एक हालिया श्वेत पत्र (White Paper) भारत के जैविक कृषि उद्योग के लिए महत्वपूर्ण नीतिगत सुझाव प्रस्तुत करता है। रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह है कि यदि भारत को कृषि जैविक नवाचार (Agri Biological Innovation) का वैश्विक केंद्र बनना है, तो Regulatory Data Protection (RDP) अर्थात नियामक डेटा संरक्षण और Confidential Business Information (CBI) अर्थात गोपनीय व्यावसायिक जानकारी की सुरक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढांचा विकसित करना होगा।
तेजी से बढ़ रहा है भारत का जैविक कृषि बाजार
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कृषि में जैविक उत्पादों का उपयोग लगातार बढ़ा है। किसान ऐसे समाधानों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जो फसल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करें, रासायनिक अवशेषों को कम करें और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को घटाएं।
KAKV के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 तक भारत का कृषि जैविक बाजार लगभग 700 से 900 मिलियन अमेरिकी डॉलर का हो चुका है और इसमें 12 से 15 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि की संभावना है। यदि यही गति बनी रही तो आने वाले वर्षों में यह उद्योग भारत के कृषि क्षेत्र का सबसे तेजी से विकसित होने वाला सेगमेंट बन सकता है।
हालांकि इस विकास को स्थायी बनाने के लिए केवल बाजार की मांग पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ऐसा नियामक वातावरण भी आवश्यक है जो अनुसंधान करने वाली कंपनियों को उनके निवेश का उचित संरक्षण प्रदान करे।
जैविक उत्पाद विकसित करना आसान नहीं
कई लोगों को लगता है कि किसी सूक्ष्मजीव (Microbe) की पहचान करके उसे सीधे बाजार में उतार देना ही जैविक उत्पाद विकसित करना है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
एक नए जैविक कृषि उत्पाद को विकसित करने के लिए कंपनियों को वर्षों तक अनुसंधान करना पड़ता है। इसमें उपयुक्त सूक्ष्मजीवीय स्ट्रेन की खोज, प्रयोगशाला परीक्षण, फॉर्मूलेशन विकास, स्थिरता परीक्षण, विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में प्रभावकारिता का मूल्यांकन, विषाक्तता अध्ययन (Toxicology), पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल, गुणवत्ता परीक्षण और अंततः नियामक स्वीकृति जैसी लंबी प्रक्रिया शामिल होती है।
इन सभी चरणों में भारी वित्तीय निवेश के साथ-साथ वैज्ञानिक विशेषज्ञता और तकनीकी संसाधनों की आवश्यकता होती है। कई बार किसी उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने में पांच से दस वर्ष तक का समय लग सकता है।
क्या है Regulatory Data Protection (RDP)?
नियामक डेटा संरक्षण (Regulatory Data Protection) का अर्थ उन वैज्ञानिक और तकनीकी आंकड़ों की कानूनी सुरक्षा से है जिन्हें कोई कंपनी किसी उत्पाद के पंजीकरण (Registration) के दौरान नियामक एजेंसियों के समक्ष प्रस्तुत करती है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि RDP और पेटेंट (Patent) दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
पेटेंट किसी नए आविष्कार या तकनीक पर बौद्धिक संपदा अधिकार प्रदान करता है, जबकि RDP उन परीक्षणों और अनुसंधानों पर किए गए निवेश की सुरक्षा करता है जो किसी उत्पाद की सुरक्षा, प्रभावशीलता और गुणवत्ता सिद्ध करने के लिए किए जाते हैं।
यदि ऐसी सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती, तो दूसरी कंपनियां बिना समान अनुसंधान किए उसी डेटा का अप्रत्यक्ष लाभ उठाकर उत्पाद बाजार में ला सकती हैं। इससे मूल नवोन्मेषक के निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और भविष्य के अनुसंधान के लिए प्रोत्साहन कम हो जाता है।
जैविक उत्पादों के लिए अलग नीति की जरूरत
जैविक कृषि उत्पाद पारंपरिक उर्वरकों और रासायनिक कीटनाशकों से काफी अलग होते हैं।
इनमें प्रयुक्त सूक्ष्मजीव, माइक्रोबियल कंसोर्टिया, जैव सक्रिय यौगिक, किण्वन (Fermentation) तकनीक और फॉर्मूलेशन प्रक्रियाएं अत्यंत विशिष्ट होती हैं। यही कारण है कि इन उत्पादों का प्रदर्शन अलग-अलग मिट्टी, तापमान, आर्द्रता और कृषि-जलवायु क्षेत्रों में भिन्न हो सकता है।
इन उत्पादों का व्यापक फील्ड वैलिडेशन आवश्यक
यदि कंपनियों को यह भरोसा नहीं होगा कि उनके द्वारा तैयार किया गया वैज्ञानिक डेटा सुरक्षित रहेगा, तो वे जीनोमिक्स आधारित माइक्रोबियल खोज, प्रिसिजन फर्मेंटेशन, अगली पीढ़ी के बायो-स्टिमुलेंट और उन्नत जैविक तकनीकों में निवेश करने से बच सकती हैं।
नवाचार और निवेश को मिलेगा बढ़ावा
किसी भी उभरते हुए उद्योग में निवेशक सबसे पहले नीति की स्थिरता और निवेश सुरक्षा को देखते हैं।
KAKV का मानना है कि यदि भारत मजबूत Regulatory Data Protection और Confidential Business Information सुरक्षा लागू करता है, तो इससे घरेलू और विदेशी दोनों प्रकार के निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
विशेष रूप से वे बहुराष्ट्रीय कंपनियां, जो भारत में अनुसंधान एवं विकास (R&D) केंद्र स्थापित करने की योजना बना रही हैं, ऐसे नियामक वातावरण को अधिक आकर्षक मानेंगी।
इसी प्रकार भारतीय स्टार्टअप्स और बायोटेक कंपनियों को भी उन्नत अनुसंधान में निवेश करने का भरोसा मिलेगा, जिससे देश में उच्च गुणवत्ता वाले जैविक उत्पादों का विकास तेज होगा।
किसानों को होगा प्रत्यक्ष लाभ
अक्सर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि मजबूत डेटा संरक्षण प्रतिस्पर्धा को कम कर देगा और किसानों के लिए उत्पाद महंगे हो जाएंगे।
लेकिन KAKV का दृष्टिकोण इससे अलग है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि कंपनियों को अपने अनुसंधान निवेश की सुरक्षा मिलेगी, तो वे अधिक तेजी से नए उत्पाद विकसित करेंगी और बाजार में लाएंगी। इससे किसानों के पास बेहतर गुणवत्ता वाले, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और अधिक प्रभावी जैविक उत्पाद उपलब्ध होंगे।
इसके अलावा नई तकनीकों से फसल उत्पादन बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता सुधारने, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में भी सहायता मिलेगी।
गोपनीय व्यावसायिक जानकारी (CBI) की सुरक्षा क्यों जरूरी?
KAKV की रिपोर्ट केवल Regulatory Data Protection तक सीमित नहीं है।
इसमें गोपनीय व्यावसायिक जानकारी (Confidential Business Information – CBI) की सुरक्षा पर भी विशेष जोर दिया गया है।
जैविक उत्पाद विकसित करने वाली कंपनियां अक्सर ऐसी स्वामित्व वाली तकनीकों का उपयोग करती हैं जो उनकी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त का आधार होती हैं।
इनमें शामिल हैं—
- विशिष्ट माइक्रोबियल स्ट्रेन का चयन
- फर्मेंटेशन तकनीक
- फॉर्मूलेशन प्रक्रिया
- गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली
- उत्पादन की स्वामित्व वाली विधियां
यदि ऐसी जानकारी सार्वजनिक हो जाए तो वर्षों का अनुसंधान और करोड़ों रुपये का निवेश कुछ ही समय में बेकार हो सकता है।
इसलिए रिपोर्ट सुझाव देती है कि नियामक एजेंसियां उत्पाद की सुरक्षा और प्रभावशीलता से जुड़े आवश्यक तथ्यों को सार्वजनिक रखें, लेकिन व्यावसायिक रूप से संवेदनशील जानकारी को गोपनीय बनाए रखने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था विकसित करें।
वैश्विक मानकों के अनुरूप बनने का अवसर
दुनिया के कई विकसित कृषि बाजार पहले से ही Regulatory Data Protection और Confidential Business Information सुरक्षा के विभिन्न मॉडल अपना चुके हैं।
इन देशों में नवाचार और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए निश्चित अवधि तक डेटा एक्सक्लूसिविटी, डेटा उपयोग के लिए मुआवजा व्यवस्था तथा जोखिम आधारित अनुमोदन प्रणाली जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं।
KAKV का सुझाव है कि भारत भी अपनी कृषि परिस्थितियों और नियामक आवश्यकताओं के अनुरूप ऐसा मॉडल विकसित कर सकता है।
संभावित सुधारों में शामिल हो सकते हैं—
- सीमित अवधि के लिए Regulatory Data Protection
- डेटा उपयोग हेतु उचित मुआवजा तंत्र
- कम जोखिम वाले जैविक उत्पादों के लिए तेज अनुमोदन प्रक्रिया
- नियामक पारदर्शिता में सुधार
- डिजिटल एवं समयबद्ध पंजीकरण प्रणाली
- CBI सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान
ऐसे सुधार भारत में कारोबार करने की सुगमता (Ease of Doing Business) को भी मजबूत करेंगे।
भारत को वैश्विक जैविक नवाचार केंद्र बनाने का अवसर
भारत के पास दुनिया की सबसे विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियां, समृद्ध जैव विविधता, बड़ी वैज्ञानिक प्रतिभा, तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम और विशाल घरेलू बाजार उपलब्ध है।
यदि इन प्राकृतिक और वैज्ञानिक क्षमताओं को नवाचार समर्थक नीतियों का सहयोग मिल जाए, तो भारत केवल जैविक उत्पादों का उपभोक्ता ही नहीं बल्कि वैश्विक अनुसंधान, विकास और निर्यात का प्रमुख केंद्र भी बन सकता है।
यह परिवर्तन देश की कृषि उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार करने, निर्यात प्रतिस्पर्धा मजबूत करने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
निष्कर्ष
भारत का कृषि जैविक उद्योग एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर तेजी से बढ़ती बाजार मांग और टिकाऊ खेती की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर अनुसंधान एवं नवाचार में निवेश करने वाली कंपनियों को सुरक्षित और भरोसेमंद नियामक वातावरण की जरूरत है।
KAKV का श्वेत पत्र स्पष्ट संकेत देता है कि Regulatory Data Protection (RDP) और Confidential Business Information (CBI) जैसे सुरक्षा उपाय केवल उद्योग के हित में नहीं, बल्कि किसानों, निवेशकों और देश की कृषि अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
यदि भारत समय रहते विज्ञान-आधारित, पारदर्शी और नवाचार-अनुकूल नियामक ढांचा विकसित करता है, तो देश न केवल जैविक कृषि उत्पादों के उत्पादन में बल्कि अनुसंधान, तकनीकी विकास और वैश्विक निर्यात में भी अग्रणी भूमिका निभा सकता है। आने वाले वर्षों में यही नीति भारत को टिकाऊ कृषि और जैविक नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

