Monsoon Update: देश में मानसून का सीजन अपने आखिरी चरण की ओर बढ़ने के साथ ही सितंबर की बारिश को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अगस्त के बाद सितंबर में कई इलाकों में बारिश की गतिविधियों में कमी देखने को मिल सकती है। इसका असर खास तौर पर उन राज्यों पर पड़ सकता है, जहां खेती का बड़ा हिस्सा मानसूनी बारिश पर निर्भर है। हालांकि मानसून की स्थिति पूरे देश में एक जैसी नहीं रहती। कुछ क्षेत्रों में बारिश कम हो सकती है, जबकि कहीं-कहीं स्थानीय मौसमी सिस्टम के कारण तेज बारिश के दौर भी देखने को मिल सकते हैं।
सितंबर का महीना भारतीय मानसून के लिहाज से बेहद अहम होता है। इसी दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून धीरे-धीरे वापसी की तरफ बढ़ता है। ऐसे में बारिश का वितरण खेती, जलाशयों के स्तर और आने वाले रबी सीजन की तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
सितंबर में क्यों कम होने लगती है बारिश?
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून मुख्य रूप से जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है। जून में मानसून देश में प्रवेश करता है और जुलाई-अगस्त के दौरान आम तौर पर इसकी गतिविधियां व्यापक रहती हैं। सितंबर आते-आते मौसम का पैटर्न बदलने लगता है और उत्तर-पश्चिम भारत से मानसून की वापसी की परिस्थितियां बनने लगती हैं।
इस दौरान मानसूनी ट्रफ, कम दबाव वाले क्षेत्रों और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले मौसमी सिस्टम की स्थिति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि देश के किस हिस्से में कितनी बारिश होगी। इसलिए सितंबर में पूरे महीने लगातार कम बारिश होगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। मानसून के आखिरी चरण में भी कुछ राज्यों में कम समय के भीतर भारी बारिश हो सकती है।
उत्तर-पश्चिम भारत पर रह सकती है खास नजर
सितंबर में मानसून की वापसी आम तौर पर उत्तर-पश्चिम भारत से शुरू होने की दिशा में आगे बढ़ती है। ऐसे में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और आसपास के मैदानी इलाकों में बारिश की गतिविधियों में बदलाव सबसे पहले दिखाई दे सकता है।
राजस्थान में पश्चिमी हिस्सों में मानसून की सक्रियता धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है। पूर्वी राजस्थान में स्थिति अलग रह सकती है और वहां किसी सक्रिय मौसमी सिस्टम की मौजूदगी में बारिश के दौर जारी रह सकते हैं।
पंजाब और हरियाणा में भी सितंबर की बारिश किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। खरीफ फसलों के अंतिम चरण में मौसम में अचानक बदलाव का असर खेतों पर पड़ सकता है। बहुत कम बारिश और लंबे समय तक शुष्क मौसम सिंचाई की जरूरत बढ़ा सकता है, जबकि कटाई के करीब पहुंच चुकी फसलों के लिए अत्यधिक बारिश भी परेशानी पैदा कर सकती है।
उत्तर प्रदेश में भी बदल सकता है बारिश का पैटर्न
उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर रहता है। सितंबर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश की बारिश में बड़ा अंतर देखने को मिल सकता है।
अगर बंगाल की खाड़ी से बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ते हैं तो पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इसके उलट मजबूत मौसमी सिस्टम नहीं बनने की स्थिति में कई जिलों में बारिश के बीच लंबा अंतर दिखाई दे सकता है।
किसानों के लिए यह समय धान, मक्का, दलहन और दूसरी खरीफ फसलों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसलिए केवल कुल बारिश ही नहीं, बल्कि बारिश कब और कितने अंतराल पर होती है, यह भी फसल के लिए मायने रखता है।
बिहार और झारखंड में मानसूनी सिस्टम पर निर्भर रहेगा मौसम
बिहार और झारखंड में सितंबर के दौरान बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसमी प्रणालियों का प्रभाव अहम रहता है। कोई सक्रिय लो-प्रेशर सिस्टम बनने पर इन राज्यों में कुछ दिनों के लिए अच्छी बारिश हो सकती है।
इसके विपरीत यदि ऐसे सिस्टम कम बनते हैं या उनका रास्ता बदल जाता है, तो बारिश की गतिविधियों में कमी आ सकती है। बिहार में धान की खेती के कारण सितंबर की बारिश विशेष महत्व रखती है। वहीं झारखंड के कई कृषि क्षेत्रों में भी पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए मानसूनी बारिश जरूरी होती है।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी रहेगी नजर
मध्य भारत मानसून के दौरान बनने वाले कम दबाव के क्षेत्रों के प्रमुख रास्तों में शामिल रहता है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसलिए सितंबर की बारिश का स्वरूप बंगाल की खाड़ी में बनने वाले सिस्टम से काफी प्रभावित हो सकता है।
अगर सितंबर में लगातार मौसमी सिस्टम बनते हैं, तो मध्य भारत में मानसून की सक्रियता लंबे समय तक बनी रह सकती है। लेकिन सिस्टम की संख्या कम रहने या उनके कमजोर पड़ने की स्थिति में बारिश का अंतर बढ़ सकता है।
मध्य प्रदेश में सोयाबीन सहित कई खरीफ फसलें इस समय महत्वपूर्ण अवस्था में होती हैं। बहुत अधिक बारिश से खेतों में जलभराव की समस्या हो सकती है, जबकि लंबे शुष्क अंतराल से मिट्टी की नमी प्रभावित हो सकती है।
महाराष्ट्र में क्षेत्र के हिसाब से अलग रह सकता है असर
महाराष्ट्र में मानसून का व्यवहार एक जैसा नहीं रहता। कोंकण और पश्चिमी घाट में मानसून की बारिश सामान्य तौर पर अधिक होती है, जबकि मराठवाड़ा और विदर्भ में वर्षा का वितरण काफी अलग हो सकता है। सितंबर में बारिश कमजोर होने की स्थिति में मराठवाड़ा जैसे अपेक्षाकृत वर्षा-संवेदनशील क्षेत्रों पर अधिक ध्यान रहेगा। वहीं बंगाल की खाड़ी से कोई मजबूत सिस्टम मध्य भारत की तरफ बढ़ता है तो विदर्भ और आसपास के इलाकों में बारिश दोबारा तेज हो सकती है। इसलिए महाराष्ट्र के लिए पूरे राज्य को एक ही श्रेणी में रखकर बारिश का अनुमान लगाना मुश्किल है।
गुजरात में भी मानसून की वापसी का दिख सकता है असर
गुजरात में अगस्त और सितंबर की बारिश जलाशयों और कृषि के लिए महत्वपूर्ण होती है। सितंबर के दौरान मानसून के कमजोर होने के साथ राज्य के कुछ हिस्सों में बारिश कम हो सकती है।
हालांकि अरब सागर या मध्य भारत से जुड़े मौसमी सिस्टम सक्रिय होने पर गुजरात में सितंबर के दौरान भी भारी बारिश के दौर देखने को मिल सकते हैं। यही वजह है कि मानसून की वापसी का मतलब अचानक पूरे राज्य में बारिश बंद हो जाना नहीं होता।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है सितंबर?
सितंबर खरीफ फसलों के लिए बेहद संवेदनशील समय होता है। धान, सोयाबीन, मक्का, कपास, दालों और दूसरी फसलों की स्थिति पर इस महीने के मौसम का सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
बारिश सामान्य से कम होने पर सिंचाई पर निर्भरता बढ़ सकती है। मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं रहने से कुछ फसलों के उत्पादन पर दबाव बन सकता है। दूसरी तरफ लगातार भारी बारिश या जलभराव से फसलों को नुकसान होने और रोगों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए किसानों के लिए राष्ट्रीय स्तर के मानसून आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण अपने जिले और आसपास के क्षेत्र का अल्पावधि मौसम पूर्वानुमान होता है।
जलाशयों और भूजल के लिए भी अहम
मानसून की बारिश केवल खेतों तक सीमित नहीं है। देश के बड़े जलाशयों, नदियों और भूजल स्तर के लिए जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश बेहद महत्वपूर्ण होती है।
यदि किसी क्षेत्र में मानसून के शुरुआती महीनों में अच्छी बारिश हुई है, तो सितंबर में कुछ कमी का असर अपेक्षाकृत सीमित रह सकता है। लेकिन जहां पहले से बारिश की कमी है, वहां सितंबर में कमजोर मानसून चिंता बढ़ा सकता है।
जलाशयों में उपलब्ध पानी का संबंध आगे चलकर सिंचाई, पेयजल और कई जगह बिजली उत्पादन से भी जुड़ा होता है। इस कारण मानसून के अंतिम महीने की बारिश पर सरकारी एजेंसियों और कृषि क्षेत्र की लगातार नजर रहती है।
क्या सितंबर में बिल्कुल नहीं होगी बारिश?
नहीं। सितंबर में मानसून कमजोर होने या औसत बारिश कम होने का अर्थ यह नहीं है कि बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। मानसून के अंतिम चरण में भी बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले सिस्टम कुछ क्षेत्रों में तेज से बहुत तेज बारिश करा सकते हैं।
कई बार ऐसा भी होता है कि महीने की कुल बारिश सामान्य से कम रहती है, लेकिन कुछ दिनों के दौरान किसी विशेष क्षेत्र में बहुत अधिक बारिश दर्ज हो जाती है। इसलिए मासिक औसत और किसी शहर या जिले में होने वाली वास्तविक बारिश अलग-अलग तस्वीर पेश कर सकते हैं।
मानसून की वापसी पर टिकी रहेंगी निगाहें
सितंबर में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी की शुरुआत शामिल रहती है। वापसी की वास्तविक तारीखें और गति उस समय की वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं।
उत्तर-पश्चिम भारत में शुष्क मौसम का स्थापित होना, हवा की दिशा में बदलाव और वातावरण में नमी कम होना जैसी परिस्थितियां मानसून की वापसी से जुड़ी होती हैं। इसके बाद मानसून धीरे-धीरे देश के दूसरे हिस्सों से भी पीछे हटता है।
यही वजह है कि सितंबर का मौसम तेजी से बदल सकता है। किसी सप्ताह मानसून कमजोर दिखाई दे सकता है और अगले ही सप्ताह नया सिस्टम बनने से कई राज्यों में बारिश लौट सकती है।
इन राज्यों पर रहेगी सबसे ज्यादा नजर
सितंबर के दौरान राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में बारिश के वितरण पर विशेष नजर रहेगी। हालांकि किस राज्य में वास्तविक रूप से सामान्य से कितनी कम या ज्यादा बारिश होगी, यह ताजा मौसमी परिस्थितियों और आधिकारिक पूर्वानुमान से ही स्पष्ट होगा।
मानसून के अंतिम चरण में किसानों और आम लोगों के लिए स्थानीय मौसम चेतावनी को प्राथमिकता देना बेहतर रहेगा। खास तौर पर भारी बारिश, बिजली गिरने, तेज हवा या बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों में जिला स्तर की चेतावनियां अधिक उपयोगी होती हैं।
आगे कैसा रहेगा मौसम?
सितंबर का मानसून कई कारकों से प्रभावित होता है। समुद्री सतह के तापमान से लेकर बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के क्षेत्रों की संख्या और मानसूनी ट्रफ की स्थिति तक, कई मौसमी परिस्थितियां बारिश का रुख बदल सकती हैं।ऐसे में सितंबर में बारिश कमजोर पड़ने की संभावना वाले क्षेत्रों के साथ उन इलाकों पर भी नजर रखना जरूरी होगा जहां अचानक सक्रिय सिस्टम भारी बारिश करा सकता है।
कुल मिलाकर सितंबर में मानसून की सक्रियता में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल सकता है। उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून की वापसी की परिस्थितियां बनने के साथ बारिश कम होने लग सकती है, जबकि मध्य, पूर्वी और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में मौसमी सिस्टम बारिश जारी रख सकते हैं।
