केंद्र सरकार ने फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और देश की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे गए डी.ओ. पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्यों को अपनी बोनस नीति इस तरह तैयार करनी चाहिए, जिससे दालों, तिलहनों और मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहन मिले। हालांकि, यह भी साफ किया गया है कि यह कोई निर्देश नहीं, बल्कि केवल एक सलाह है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप कृषि प्रणाली को संतुलित बनाना है।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब देश के कई हिस्सों में गेहूं और धान जैसी फसलों का अत्यधिक उत्पादन हो रहा है। खासकर उत्तरी भारत में इन फसलों पर अत्यधिक निर्भरता ने कृषि संतुलन को प्रभावित किया है। जब राज्य सरकारें इन फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के ऊपर अतिरिक्त बोनस देती हैं, तो किसान स्वाभाविक रूप से इन्हीं फसलों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। इसके परिणामस्वरूप दालों, तिलहनों और मोटे अनाज जैसी आवश्यक फसलों का रकबा कम होता जाता है।
इस असंतुलन का प्रभाव केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। धान और गेहूं की खेती में पानी और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग होता है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। दूसरी ओर, दालों और तिलहनों का कम उत्पादन देश को आयात पर निर्भर बनाता है, जो वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं और मूल्य उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है।
इसी संदर्भ में केंद्र सरकार ने राज्यों को यह सलाह दी है कि वे अपनी कृषि नीतियों और बोनस संरचना को इस प्रकार ढालें, जिससे फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिले। यह कदम न केवल पोषण सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि किसानों की आय को भी स्थिर और सुरक्षित बनाएगा। दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं, जबकि तिलहन और खाद्य तेल देश की दैनिक जरूरतों का अहम हिस्सा हैं। ऐसे में इनका घरेलू उत्पादन बढ़ाना रणनीतिक रूप से भी आवश्यक है।
सरकार पहले ही इस दिशा में कई योजनाएं लागू कर चुकी है। ‘दालों में आत्मनिर्भरता मिशन’, ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल-तिलहन मिशन’ और ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल-ऑयल पाम मिशन’ जैसी पहलें किसानों को इन फसलों की ओर आकर्षित कर रही हैं। इसके अलावा, दालों और तिलहनों के लिए एमएसपी में लगातार वृद्धि की जा रही है, ताकि किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके और वे इन फसलों की खेती के लिए प्रेरित हों।
आर्थिक समीक्षा 2025–26 के अनुसार, भारत की आयातित खाद्य तेल पर निर्भरता 2015–16 के 63.2 प्रतिशत से घटकर 2023–24 में 56.25 प्रतिशत हो गई है, जो सकारात्मक प्रगति का संकेत है। इसी अवधि में तिलहनों की खेती का रकबा 18 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है, उत्पादन में लगभग 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और उत्पादकता में करीब 31 प्रतिशत का सुधार दर्ज किया गया है।
किसानों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा कई अन्य योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। पीएम-किसान योजना के तहत करोड़ों किसानों को आर्थिक सहायता मिल रही है, जबकि मृदा स्वास्थ्य कार्ड और परीक्षण प्रयोगशालाएं वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दे रही हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा प्रदान कर रही है।
कुल मिलाकर, केंद्र सरकार का यह दृष्टिकोण एक संतुलित, टिकाऊ और आत्मनिर्भर कृषि प्रणाली विकसित करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है। यह राज्यों के साथ सहयोग और साझा जिम्मेदारी के आधार पर देश की खाद्य सुरक्षा, पोषण और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित करने का प्रयास है।

