देश में मत्स्य क्षेत्र को आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने शीत जल मत्स्य पालन (कोल्ड वॉटर फिशरीज) के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मत्स्य, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के मत्स्य पालन विभाग ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) और मत्स्य एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (एफआईडीएफ) के माध्यम से देशभर में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। विशेष रूप से हिमालयी और पर्वतीय राज्यों में शीत जल मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए 706 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।
मत्स्य, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि केंद्र सरकार का उद्देश्य मत्स्य उत्पादन बढ़ाने, आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देने, किसानों की आय में वृद्धि करने और मत्स्य क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है।
सरकार की प्रमुख योजना प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) देशभर में 20,050 करोड़ रुपये के कुल निवेश के साथ लागू की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य मछली उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना, गुणवत्ता सुधारना, आधुनिक तकनीकों को अपनाना, कटाई के बाद की बुनियादी सुविधाओं का विकास करना, मूल्य श्रृंखला को मजबूत बनाना, ट्रेसबिलिटी प्रणाली विकसित करना और मत्स्य क्षेत्र में समग्र प्रबंधन व्यवस्था को सुदृढ़ करना है। साथ ही शीत जल क्षेत्रों में रहने वाले मछुआरों और मत्स्य किसानों की विशेष आवश्यकताओं को भी इस योजना के माध्यम से पूरा किया जा रहा है।
मत्स्य क्षेत्र में आधारभूत ढांचे की कमी दूर करने के लिए केंद्र सरकार मत्स्य एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (Fisheries and Aquaculture Infrastructure Development Fund-FIDF) का भी संचालन कर रही है। वर्ष 2018-19 से संचालित इस कोष का कुल आकार 7,522.48 करोड़ रुपये है। इस निधि के माध्यम से मत्स्य उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और विपणन से जुड़ी आधुनिक अवसंरचना विकसित की जा रही है।
शीत जल मत्स्य पालन के विकास को विशेष प्राथमिकता देते हुए केंद्र सरकार ने हिमालयी और पर्वतीय राज्यों में विभिन्न परियोजनाओं के लिए 706 करोड़ रुपये की स्वीकृति प्रदान की है। इन परियोजनाओं में आधुनिक मत्स्य पालन इकाइयों की स्थापना, हैचरी, उत्पादन केंद्र, प्रसंस्करण सुविधाएं और अन्य आवश्यक अवसंरचना का विकास शामिल है। सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं से पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और स्थानीय किसानों की आय में वृद्धि होगी।
मत्स्य पालन विभाग ने 14 मार्च 2026 को शीत जल मत्स्य पालन के विकास के लिए मॉडल दिशानिर्देश भी जारी किए हैं। इन दिशानिर्देशों में आधुनिक रेसवे (Raceways), री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), हैचरी, फीड मिल, रोग नियंत्रण प्रणाली और बाजार से जुड़ाव विकसित करने के लिए विस्तृत तकनीकी मानक निर्धारित किए गए हैं। इनका उद्देश्य रेनबो ट्राउट, गोल्डन माहसीर और स्नो ट्राउट जैसी व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शीत जल मछली प्रजातियों के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा देना है।
सरकार ने शीत जल मत्स्य पालन को संगठित रूप से विकसित करने के लिए देश में चार विशेष क्लस्टरों की भी अधिसूचना जारी की है। इनमें जम्मू-कश्मीर का अनंतनाग, उत्तराखंड का पिथौरागढ़, लद्दाख का करगिल और हिमाचल प्रदेश का कुल्लू जिला शामिल हैं। इन क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और बाजार सुविधाओं के माध्यम से शीत जल मत्स्य पालन को प्रोत्साहित किया जाएगा।
केंद्र सरकार मत्स्य किसानों को नई तकनीकों से जोड़ने पर भी विशेष ध्यान दे रही है। दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों में कार्यरत मत्स्य किसानों को री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), बायोफ्लॉक तकनीक, केज कल्चर, आईओटी आधारित जल गुणवत्ता निगरानी प्रणाली, जीआईएस मैपिंग, स्वचालित फीडर और डिजिटल मार्केट प्लेटफॉर्म जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन तकनीकों के उपयोग से कम पानी में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और कम लागत पर मत्स्य पालन संभव हो सकेगा।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय शीत जल मत्स्य पालन अनुसंधान संस्थान (CICFR), भीमताल ने शीत जल मत्स्य पालन के लिए एक मॉडल RAS प्रणाली विकसित की है। इस तकनीक के माध्यम से वर्षभर रेनबो ट्राउट का तीव्र उत्पादन तथा गोल्डन माहसीर जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियों का नियंत्रित प्रजनन संभव हो गया है। इससे किसानों को मौसम पर कम निर्भर रहना पड़ेगा और उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
इसी प्रकार आईसीएआर-केंद्रीय मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान (CIFT), कोच्चि द्वारा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में मछली प्रसंस्करण तथा रेडी-टू-ईट (Ready-to-Eat) उत्पादों की सुविधाएं विकसित करने में तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन बढ़ेगा, किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा और मत्स्य उत्पादों की बाजार पहुंच भी विस्तारित होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि शीत जल मत्स्य पालन भारत के पर्वतीय राज्यों के लिए आय और रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है। आधुनिक तकनीकों, वैज्ञानिक प्रबंधन और बेहतर बाजार व्यवस्था के माध्यम से यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती प्रदान कर सकता है। विशेष रूप से रेनबो ट्राउट जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों का उत्पादन बढ़ने से निर्यात की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।
केंद्र सरकार की इन पहलों से न केवल हिमालयी क्षेत्रों में मत्स्य उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। आधुनिक अवसंरचना, वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल तकनीकों और बाजार से बेहतर जुड़ाव के माध्यम से भारत शीत जल मत्स्य पालन के क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

