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Drought Prone Areas Programme: जल संकट से जूझते किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण

Drought Prone Areas Programme: Drought-Prone Areas Programme: A new ray of hope for farmers grappling with the water crisis.

Fiza by Fiza
July 17, 2026
in योजना
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Drought Prone Areas Programme

Drought Prone Areas Programme

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Drought Prone Areas Programme: भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, लेकिन देश के अनेक हिस्से आज भी वर्षा पर आधारित खेती पर निर्भर हैं। जब समय पर बारिश नहीं होती या सामान्य से कम होती है, तो सबसे अधिक प्रभाव किसानों की आजीविका पर पड़ता है। खेत सूखने लगते हैं, फसलें नष्ट हो जाती हैं और पशुओं के लिए चारे का संकट खड़ा हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों से निपटने और किसानों को राहत पहुंचाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा कई योजनाएं और कार्यक्रम संचालित किए गए हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण पहल है – सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम।

सूखा केवल पानी की कमी का नाम नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक जीवन पर व्यापक प्रभाव डालता है। यही कारण है कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों के विकास और वहां के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस की गई। इसी सोच के साथ सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम की शुरुआत की गई, ताकि प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सके और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाया जा सके।

क्या है सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम?

सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम (Drought Prone Areas Programme – DPAP) भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया एक ऐसा कार्यक्रम है, जिसका मुख्य उद्देश्य उन क्षेत्रों का विकास करना है, जहां बार-बार सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। यह कार्यक्रम जल संरक्षण, भूमि विकास, वृक्षारोपण, चारागाह विकास और वैकल्पिक आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

इस कार्यक्रम का लक्ष्य केवल सूखे से राहत देना नहीं है, बल्कि ग्रामीण समुदाय को इस प्रकार सशक्त बनाना है कि वे भविष्य में आने वाली जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना कर सकें। इसके अंतर्गत जलग्रहण क्षेत्र विकास (Watershed Development) को विशेष महत्व दिया जाता है।

भारत में सूखे की समस्या कितनी गंभीर है?

भारत के लगभग 50 प्रतिशत कृषि क्षेत्र आज भी मानसून पर निर्भर हैं। यदि मानसून कमजोर पड़ता है, तो कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और गुजरात के कई हिस्से समय-समय पर सूखे से प्रभावित होते रहे हैं। सूखे के कारण होने वाली प्रमुख समस्याएं:

  • फसलों का नुकसान
  • भूजल स्तर में गिरावट
  • पशुओं के लिए चारे की कमी
  • किसानों की आय में कमी
  • ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन
  • खाद्य उत्पादन में गिरावट
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव

ऐसे में सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम किसानों के लिए सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है।

कार्यक्रम की शुरुआत और उद्देश्य

भारत सरकार ने वर्ष 1970 के दशक में इस कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य था कि सूखा प्रभावित जिलों में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण कर वहां की कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए।इस कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. जल संरक्षण को बढ़ावा देना।
  2. मिट्टी के कटाव को रोकना।
  3. भूजल स्तर को सुधारना।
  4. किसानों की आय बढ़ाना।
  5. पशुपालन और कृषि आधारित गतिविधियों को प्रोत्साहित करना।
  6. सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करना।
  7. पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र का विस्तार करना।
  8. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में टिकाऊ विकास को बढ़ावा देना।

सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम कैसे काम करता है?

यह कार्यक्रम मुख्य रूप से जलग्रहण क्षेत्र आधारित विकास मॉडल पर काम करता है। इसके तहत किसी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, जल उपलब्धता और कृषि पैटर्न का अध्ययन किया जाता है। इसके बाद निम्नलिखित गतिविधियां की जाती हैं:

1. जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण

  • तालाबों का निर्माण
  • चेक डैम
  • खेत तालाब
  • जलाशय
  • रिचार्ज कुएं

इन संरचनाओं के माध्यम से वर्षा जल को संग्रहित किया जाता है।

2. भूमि सुधार कार्य

  • समतलीकरण
  • मेड़बंदी
  • कंटूर बंडिंग
  • मिट्टी संरक्षण कार्य

3. वृक्षारोपण और वन विकास

सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पौधारोपण से मिट्टी की नमी बनी रहती है और पर्यावरण संतुलन को बढ़ावा मिलता है।

4. चारागाह विकास

पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए कार्यक्रम के तहत चारागाह विकसित किए जाते हैं, जिससे पशुओं के लिए चारा उपलब्ध हो सके।

5. किसानों को प्रशिक्षण

किसानों को कम पानी वाली फसलों, आधुनिक सिंचाई तकनीकों और जल प्रबंधन के बारे में प्रशिक्षण दिया जाता है।

किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कार्यक्रम?

किसानों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि उनकी आजीविका को सुरक्षित रखने का माध्यम है। इससे किसानों को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

जल की उपलब्धता में सुधार

जब गांव में जल संरक्षण के कार्य होते हैं, तो खेतों तक सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी पहुंचता है।

उत्पादन में वृद्धि

नमी संरक्षण के कारण फसलों की पैदावार बढ़ती है। इससे किसानों की आमदनी में भी सुधार होता है।

खेती की लागत में कमी

यदि भूजल स्तर बढ़ता है, तो किसानों को बार-बार गहरे बोरिंग कराने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

रोजगार के अवसर

जल संरक्षण और विकास कार्यों के दौरान स्थानीय स्तर पर रोजगार भी सृजित होता है।

जोखिम में कमी

कम वर्षा होने की स्थिति में भी किसान पूरी तरह संकट में नहीं आते।

जलवायु परिवर्तन और सूखा

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन चुका है। तापमान बढ़ने और वर्षा के पैटर्न में बदलाव के कारण सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं।विशेषज्ञों के अनुसार:

  •  बारिश कम समय में अधिक हो रही है।
  • लंबे समय तक शुष्क अवधि बनी रहती है।
  • भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है।
  • कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

ऐसे में सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

किन फसलों को अपनाकर किसान सूखे से बच सकते हैं?

सूखा प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को कम पानी वाली फसलें अपनाने की सलाह दी जाती है।

इनमें प्रमुख हैं:

  • बाजरा
  • ज्वार
  • रागी
  • चना
  • अरहर
  • मूंग
  • उड़द
  • तिल
  • सरसों

इन फसलों को कम सिंचाई की आवश्यकता होती है और ये प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन दे सकती हैं।

आधुनिक तकनीक की भूमिका

आज तकनीक की मदद से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा रहे हैं।

ड्रिप सिंचाई

यह तकनीक पानी की बचत करते हुए पौधों की जड़ों तक सीधे पानी पहुंचाती है।

स्प्रिंकलर सिंचाई

कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई संभव बनाती है।

मौसम पूर्वानुमान

मौसम संबंधी जानकारी किसानों को सही समय पर निर्णय लेने में मदद करती है।

मोबाइल एप्स

कई कृषि एप्स किसानों को सिंचाई, मौसम और फसल प्रबंधन की जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

महिलाओं की भूमिका

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खेती और पशुपालन में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम में स्वयं सहायता समूहों को शामिल कर महिलाओं को भी आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा रहा है। महिलाएं निम्न गतिविधियों में भागीदारी कर रही हैं:

  • नर्सरी प्रबंधन
  • पौधारोपण
  • डेयरी गतिविधियां
  • खाद निर्माण
  • जल संरक्षण समितियों में भागीदारी

सामुदायिक भागीदारी का महत्व

किसी भी कार्यक्रम की सफलता तभी संभव है, जब उसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो। जब गांव के लोग स्वयं:

  • तालाबों की देखरेख करते हैं।
  • जल संरक्षण को बढ़ावा देते हैं।
  • वृक्षारोपण करते हैं।
  • पानी के उपयोग को नियंत्रित करते हैं।

तब कार्यक्रम के परिणाम लंबे समय तक दिखाई देते हैं।

कार्यक्रम के सामने चुनौतियां

हालांकि, सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम ने कई क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डाला है, लेकिन कुछ चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।

प्रमुख चुनौतियां

  • जागरूकता की कमी
  • परियोजनाओं में देरी
  • पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का अभाव
  • सामुदायिक भागीदारी की कमी
  • जल संरक्षण संरचनाओं का रखरखाव न होना
  • तकनीकी जानकारी का अभाव

इन चुनौतियों को दूर करने के लिए सरकार, कृषि संस्थानों और स्थानीय प्रशासन को मिलकर कार्य करना होगा।

सफल उदाहरण

देश के कई राज्यों में इस कार्यक्रम के अंतर्गत उल्लेखनीय कार्य किए गए हैं।

महाराष्ट्र

यहां जल संरक्षण परियोजनाओं के कारण कई गांवों में भूजल स्तर में सुधार देखा गया।

राजस्थान

चेक डैम और तालाब निर्माण से किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हुआ।

कर्नाटक

वाटरशेड परियोजनाओं ने कृषि उत्पादन और पशुपालन दोनों को मजबूत किया।

मध्य प्रदेश

ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा मिला।

भविष्य की संभावनाएं

आने वाले वर्षों में जल संकट और अधिक गंभीर हो सकता है। ऐसे में सरकार को निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना होगा:

  • प्रत्येक गांव में जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण।
  • माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा।
  • किसानों को नियमित प्रशिक्षण।
  • जल उपयोग के लिए सामुदायिक नीति।
  • जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रचार।
  • ग्रामीण युवाओं को कृषि उद्यमिता से जोड़ना।

यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकता है।

निष्कर्ष

भारत में सूखा एक प्राकृतिक चुनौती है, लेकिन सही योजना और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसने लाखों किसानों को नई उम्मीद दी है।

यह कार्यक्रम केवल पानी बचाने का अभियान नहीं है, बल्कि किसानों की आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास का एक व्यापक मॉडल है। आज आवश्यकता इस बात की है कि अधिक से अधिक किसान इस कार्यक्रम से जुड़ें, जल संरक्षण को अपनी आदत बनाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों को सुरक्षित रखें।

जब खेतों में पानी होगा, तभी किसानों के चेहरे पर मुस्कान होगी। और जब किसान समृद्ध होंगे, तभी देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी। इसलिए, सूखा प्रभावित क्षेत्र कार्यक्रम को केवल सरकारी पहल नहीं, बल्कि जन आंदोलन के रूप में अपनाने की आवश्यकता है।

Tags: Agriculture SchemeClimate ChangeDPAPDrought Prone Areas ProgrammeFarmers WelfareGovernment Schemes IndiaHindi Agriculture NewsIndian AgricultureIrrigation ManagementRainwater HarvestingRural DevelopmentSoil ConservationSustainable FarmingWater ConservationWatershed Development
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