֍:बकरी पालन से क्या होते हैं लाभ§ֆ:बकरी पालन मुख्य रूप से मांस, दूध और ऊन के लिए किया जा सकता है. बकरी पालन झारखंड राज्य के लिए मुख्य रूप से मांस उत्पादन के लिए एक अच्छा व्यवसाय हो सकता है. इस क्षेत्र में पाई जाने वाली बकरियां छोटी उम्र में ही परिपक्व हो जाती हैं और दो साल में कम से कम 3 बार बच्चे दे देती हैं. बता दें कि इसके एक थन में 2-3 बच्चे देती हैं. बकरियों से मांस, दूध, खाल और ऊन के अलावा उनके मलमूत्र से भूमि की उर्वरता बढ़ती है. बकरियाँ आमतौर पर चरागाहों पर निर्भर रहती हैं. वे झाड़ियों, जंगली घास और पेड़ों की पत्तियों को खाकर हमारे लिए मांस और दूध जैसे पौष्टिक भोजन का उत्पादन करती हैं.§֍:कौनसी हैं प्रमुख विदेशी नस्लें§ֆ:• अल्पाइन नस्ल – यह स्विटजरलैंड की नस्ल है. यह मुख्य रूप से दूध उत्पादन के लिए उपयुक्त है. इस नस्ल की बकरियाँ अपने घरेलू क्षेत्रों में औसतन 3-4 किलो दूध प्रतिदिन देती हैं.
• एंग्लोनुवियन नस्ल – यह आमतौर पर यूरोप के विभिन्न देशों में पाया जाता है. यह मांस और दूध दोनों के लिए उपयुक्त है. इसकी दूध उत्पादन क्षमता 2-3 किलोग्राम प्रतिदिन है.
• सानान नस्ल – यह स्विटजरलैंड की बकरी है. इसकी दूध उत्पादन क्षमता अन्य सभी नस्लों से अधिक है. यह अपने गृह क्षेत्रों में औसतन 3-4 किलोग्राम दूध प्रतिदिन देती है.
• टोगेनबर्ग नस्ल – टोगेनबर्ग भी स्विटजरलैंड की बकरी है. इसके नर और मादा के सींग नहीं होते. यह औसतन 3 किलोग्राम प्रतिदिन दूध देती है.
§भारत के लगभग सभी राज्यों में पशुपालन व्यवसाय सालों से चलता आ रहा है. ग्रामीण इलाकों में लोग अपनी अजीविका के लिए खेती के साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं ताकि वो ज्यादा पैसे कमा सकें. ऐसा ही व्यवसाय बकरी पालन का भी है. रिपोर्ट क मुताबिक हमारे देश में बकरियों की कुल संख्या करीब 12 करोड़ है. दुनिया की कुल बकरियों की आबादी का 20 फीसदी हिस्सा सिर्फ भारत में पाया जाता है. जो कि बहुत बड़ी संख्या है. बकरी एक बहुउद्देश्यीय, सरल, किसी भी वातावरण में आसानी से ढल जाने वाला छोटा जानवर है जो अपनी रहन-सहन और खान-पान की आदतों के कारण हर किसी का पसंदीदा जानवर है. देश-विदेश के बाजार में बकरियों की भारी मांग है. बकरी के दूध, मांस और छाल का इस्तेमाल पूरी दुनिया में किया जाता है. इसी कारण ज्यादातर बकरी पालन करते है.

