पश्चिम एशिया के देशों में जारी युद्ध का असर अब भारत की रसोई तक साफ नजर आने लगा है। खासकर खाद्य तेल बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। विदेशों से आने वाले पाम ऑयल और सोयाबीन ऑयल की सप्लाई लगभग ठप हो गई है, जिसके चलते देश में सरसों के तेल की मांग तेजी से बढ़ी है। इसका सीधा असर इसके दामों पर पड़ा है, जो लगातार ऊपर जा रहे हैं।
राजस्थान, जो देश में सरसों उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा देता है, इस समय इस बदलाव का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। अलवर, भरतपुर, झुंझुनू, सीकर, करौली और दौसा जैसे जिलों में इस बार सरसों की बंपर पैदावार हुई है। खासतौर पर अलवर, जहां सबसे ज्यादा तेल मिलें स्थित हैं, पूरे देश में सरसों के तेल की सप्लाई का प्रमुख हब बना हुआ है।
बाजार में बढ़ती मांग के चलते किसान अपनी फसल सीधे खेतों से मंडियों में बेचने पहुंच रहे हैं। इस समय सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6200 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन खुले बाजार में इसके भाव 6800 रुपये तक पहुंच चुके हैं। बेहतर कीमत मिलने से किसान काफी संतुष्ट नजर आ रहे हैं।
राजस्थान खाद्य पदार्थ संघ के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश चंद्र अग्रवाल (जलालपुरिया) के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण मलेशिया से आने वाला पाम ऑयल और अमेरिका से आयात होने वाला सोयाबीन रिफाइंड ऑयल प्रभावित हुआ है। भारत का खाद्य तेल उद्योग करीब 55 प्रतिशत आयात पर निर्भर है, ऐसे में आयात रुकने से घरेलू सरसों तेल की मांग में जबरदस्त उछाल आया है।
इस साल सरसों की गुणवत्ता भी काफी बेहतर बताई जा रही है। जहां सामान्य तौर पर सरसों से करीब 40 प्रतिशत तेल निकलता है, वहीं इस बार यह आंकड़ा 42-43 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यानी 100 किलो सरसों से करीब 43 किलो तेल निकल रहा है, जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिल रहा है।
कृषि उपज मंडियों में सरसों की आवक भी लगातार बनी हुई है। रोजाना 35 से 40 हजार कट्टे तक सरसों मंडियों में पहुंच रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय हालात सुधरते हैं और खाड़ी देशों से तेल का आयात फिर से शुरू होता है, तो सरसों के दामों में गिरावट आ सकती है।
फिलहाल स्थिति यह है कि पाम, सोयाबीन और सरसों तेल के दाम लगभग बराबर हो गए हैं, जिससे मिलावट की संभावना भी कम हो गई है। लेकिन यदि आयात लंबे समय तक बाधित रहता है, तो आने वाले समय में सरसों तेल की उपलब्धता कम हो सकती है और कीमतें और ज्यादा बढ़ सकती हैं।
कुल मिलाकर, जहां एक तरफ इस वैश्विक संकट ने आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ा दी है, वहीं दूसरी ओर किसानों के लिए यह अवसर बनकर सामने आया है। अब सबकी नजरें अंतरराष्ट्रीय हालात और सरकार की नीतियों पर टिकी हैं, जो आगे के बाजार रुख को तय करेंगी।

