भारत के उर्वरक उद्योग में ऊर्जा दक्षता को उत्पादन लागत, पर्यावरणीय स्थिरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता से जोड़ते हुए फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने बिहार के बरौनी में ऊर्जा संरक्षण पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया। 19 से 22 अगस्त 2026 तक आयोजित इस कार्यक्रम में देश की उर्वरक इकाइयों के वरिष्ठ अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों, प्रौद्योगिकी आपूर्तिकर्ताओं और उद्योग से जुड़े अन्य हितधारकों ने भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य उर्वरक संयंत्रों में ऊर्जा बचत की संभावनाओं को पहचानना, संयंत्र स्तर के अनुभव साझा करना और नई तकनीकों के माध्यम से ऊर्जा दक्षता को और बेहतर बनाने के उपायों पर चर्चा करना रहा।
कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने कहा कि उर्वरक उद्योग देश के सबसे अधिक ऊर्जा खपत वाले औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल है। विशेष रूप से अमोनिया और यूरिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस तथा अन्य ऊर्जा संसाधनों की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में ऊर्जा की बचत केवल उत्पादन लागत कम करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उर्वरक उद्योग की दीर्घकालिक स्थिरता, सरकार पर सब्सिडी के बोझ को कम करने और देश की ऊर्जा सुरक्षा से भी सीधे जुड़ी हुई है।
उर्वरक उद्योग ने ऊर्जा दक्षता में हासिल की बड़ी उपलब्धि
कार्यशाला को संबोधित करते हुए फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि उर्वरक क्षेत्र अत्यधिक ऊर्जा-गहन उद्योगों में शामिल है और अकेले यूरिया उत्पादन क्षेत्र की कुल ऊर्जा खपत में लगभग 95 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। उन्होंने बताया कि भारत अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरत का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जबकि उर्वरक उद्योग देश में प्राकृतिक गैस के प्रमुख उपभोक्ताओं में शामिल है।
डॉ. चौधरी ने कहा कि भारतीय उर्वरक उद्योग ने पिछले कई दशकों के दौरान ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि, वर्तमान स्तर पर दक्षता काफी ऊंची हो चुकी है, इसलिए अब अतिरिक्त सुधार हासिल करना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होगा। ऐसे में नई तकनीकों को अपनाने, पुराने संयंत्रों के आधुनिकीकरण, प्लांट रिवैम्प और उद्योग के भीतर ज्ञान एवं अनुभव साझा करने की आवश्यकता और बढ़ गई है।
FAI के अनुसार, वर्ष 1987-88 से 2025-26 के बीच अमोनिया और यूरिया संयंत्रों की औसत ऊर्जा खपत में उल्लेखनीय कमी आई है। अमोनिया संयंत्रों की भारित औसत ऊर्जा खपत 1987-88 में 12.48 Gcal प्रति टन थी, जो 2025-26 में घटकर 7.91 Gcal प्रति टन रह गई। इस तरह इसमें लगभग 36.6 प्रतिशत सुधार दर्ज किया गया।
इसी तरह यूरिया संयंत्रों में ऊर्जा खपत 1987-88 में 8.87 Gcal प्रति टन थी, जो 2025-26 में घटकर 5.47 Gcal प्रति टन रह गई। यानी इस अवधि में यूरिया उत्पादन की ऊर्जा दक्षता में लगभग 38.3 प्रतिशत सुधार हुआ है।
यह उपलब्धि बताती है कि भारतीय उर्वरक उद्योग ने तकनीकी सुधार, बेहतर संचालन और ऊर्जा प्रबंधन के जरिए पिछले चार दशकों में काफी प्रगति की है। हालांकि, आगे की राह में दक्षता को और बेहतर बनाने के लिए अधिक उन्नत तकनीकों और संयंत्रों के आधुनिकीकरण की जरूरत होगी।
ऊर्जा संरक्षण अब विकल्प नहीं, आवश्यकता
डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि ऊर्जा संरक्षण अब केवल एक वांछनीय लक्ष्य नहीं रह गया है, बल्कि उर्वरक उद्योग की स्थिरता और प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए यह अनिवार्य हो चुका है। उन्होंने कहा कि जब किसी उद्योग में दक्षता का स्तर पहले से ही काफी ऊंचा हो जाता है, तब प्रत्येक अतिरिक्त सुधार हासिल करना अधिक कठिन होता है। ऐसे माहौल में अलग-अलग संयंत्रों के अनुभवों को साझा करना और सफल तकनीकी उपायों को दूसरे संयंत्रों तक पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
उन्होंने कहा कि किसी एक संयंत्र में ऊर्जा बचत के लिए अपनाया गया सफल मॉडल दूसरे संयंत्रों के लिए भी उपयोगी हो सकता है। इसलिए उद्योग में तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता है।
FAI के महानिदेशक ने संगठन की विभिन्न गतिविधियों और क्षमता निर्माण से जुड़े प्रयासों में डॉ. सिबा प्रसाद मोहंती, को-चेयरमैन, FAI के निरंतर सहयोग की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि उद्योग के अधिकारियों और विशेषज्ञों के बीच लगातार संवाद से नई सीख और व्यावहारिक समाधान सामने आते हैं।
संयंत्र स्तर के अनुभव साझा करने पर जोर
कार्यक्रम में KRIBHCO Fertilizers Limited के प्रबंध निदेशक आर. के. चोपड़ा ने कहा कि देश के कई उर्वरक संयंत्रों में डिजाइन और तकनीक के स्तर पर समानताएं हैं। इसके कारण उन्हें संचालन के दौरान कई समान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि यदि संयंत्र अपने स्तर पर सामने आने वाली समस्याओं और उनके समाधान को एक-दूसरे के साथ साझा करें तो उद्योग सामूहिक रूप से अपनी दक्षता में सुधार कर सकता है। उन्होंने विशेष रूप से वेस्ट-हीट बॉयलर और कूलिंग टावर जैसी प्रणालियों से जुड़ी चुनौतियों का उल्लेख किया।
चोपड़ा ने कहा कि कई बार किसी एक संयंत्र में किसी तकनीकी समस्या का व्यावहारिक समाधान पहले ही विकसित किया जा चुका होता है, लेकिन दूसरे संयंत्रों तक उसकी जानकारी समय पर नहीं पहुंच पाती। इसलिए संयंत्र स्तर के अनुभवों को साझा करने की प्रक्रिया को मजबूत करने की जरूरत है।
ऊर्जा बचत से घट सकता है लागत और सब्सिडी का बोझ
कार्यक्रम में HURL के बिजनेस यूनिट हेड नितिन सक्सेना ने ऊर्जा खपत कम करने को उर्वरक उद्योग की लागत संरचना और सरकार के सब्सिडी बोझ से जोड़ते हुए कहा कि ऊर्जा दक्षता बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि ऊर्जा की खपत में कमी से उत्पादन लागत को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही यह सरकार पर पड़ने वाले सब्सिडी के बोझ को कम करने में भी योगदान दे सकती है। उन्होंने कहा कि HURL नए यूरिया प्रोजेक्ट्स और ग्रीन अमोनिया उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में नए संयंत्रों में ऊर्जा दक्षता के साथ-साथ प्लांट की विश्वसनीयता और नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर एकीकरण पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
सक्सेना के मुताबिक, नई परियोजनाओं से प्राप्त अनुभवों को उद्योग के दूसरे संस्थानों के साथ साझा करने से देश का पूरा उर्वरक क्षेत्र सामूहिक रूप से आगे बढ़ सकता है।
2025-28 के लिए कड़े ऊर्जा मानक
उर्वरक क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने यूरिया इकाइयों के लिए ऊर्जा खपत के मानकों को भी और कड़ा किया है। 1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2028 की अवधि के लिए यूरिया इकाइयों पर लागू ऊर्जा खपत मानकों ने संयंत्रों के लिए ऊर्जा दक्षता में सुधार की दिशा में दबाव और बढ़ाया है।
इसका सीधा अर्थ है कि उर्वरक कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ प्रति टन यूरिया उत्पादन में ऊर्जा की खपत को नियंत्रित करना होगा। ऐसे में पुरानी तकनीक वाले संयंत्रों के आधुनिकीकरण और नई तकनीकों को अपनाने की जरूरत आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
वेस्ट-हीट रिकवरी और नई तकनीक पर फोकस
बरौनी में आयोजित कार्यशाला में ऊर्जा संरक्षण के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की जा रही है। इसमें यूरिया, अमोनिया और कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर प्लांट्स में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के उपायों को प्रमुखता दी गई।
कार्यशाला के प्रमुख विषयों में प्लांट रेट्रोफिट, बेहतर कैटेलिस्ट, आधुनिक हीट-एक्सचेंजर डिजाइन, वेस्ट-हीट रिकवरी, स्टीम और बिजली की खपत का अनुकूलन तथा नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक उपयोग जैसे विषय शामिल हैं।
वेस्ट-हीट रिकवरी को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि औद्योगिक प्रक्रियाओं में उत्पन्न होने वाली गर्मी का एक हिस्सा उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी तरह बेहतर कैटेलिस्ट और हीट-एक्सचेंजर तकनीक से उत्पादन प्रक्रिया की दक्षता बढ़ाने तथा ऊर्जा खपत कम करने में मदद मिल सकती है।
ग्रीन अमोनिया से नई संभावनाएं
उर्वरक उद्योग में भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए ग्रीन अमोनिया भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बनकर सामने आया है। पारंपरिक अमोनिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस की बड़ी भूमिका होती है। ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा आधारित तकनीकों और ग्रीन अमोनिया की दिशा में बढ़ते प्रयास उद्योग के ऊर्जा संक्रमण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, ग्रीन अमोनिया के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां भी हैं। इसलिए उद्योग के मौजूदा संयंत्रों की दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ भविष्य की स्वच्छ तकनीकों में निवेश करना भी जरूरी होगा।
ज्ञान साझा करना बनेगा उद्योग की ताकत
FAI की इस कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि ऊर्जा दक्षता में अगला बड़ा सुधार केवल नई मशीनरी खरीदने से नहीं, बल्कि तकनीक, अनुभव और ज्ञान के साझा उपयोग से भी हासिल किया जा सकता है।
देश के अलग-अलग उर्वरक संयंत्रों की उत्पादन क्षमता, तकनीक और संचालन परिस्थितियों में अंतर हो सकता है, लेकिन ऊर्जा बचत से जुड़ी कई चुनौतियां समान हैं। यदि इन चुनौतियों के समाधान और सफल प्रयोगों को व्यवस्थित तरीके से साझा किया जाए तो कंपनियां समय और लागत दोनों बचा सकती हैं।
FAI के चीफ टेक्निकल मनीष गोस्वामी ने भी कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारी और सुझाव दिए। कार्यशाला में शामिल विशेषज्ञों और उद्योग प्रतिनिधियों ने ऊर्जा संरक्षण को केवल एक तकनीकी विषय न मानकर इसे उद्योग की समग्र प्रतिस्पर्धात्मकता से जोड़ने पर जोर दिया।
आगे की राह में तकनीकी उन्नयन जरूरी
भारतीय कृषि के लिए उर्वरक उद्योग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। किसानों को समय पर और पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए देश में मजबूत और लागत-कुशल उर्वरक उत्पादन क्षमता आवश्यक है। ऐसे में ऊर्जा की कीमतों, प्राकृतिक गैस की उपलब्धता और आयात निर्भरता जैसे कारकों का सीधा प्रभाव उर्वरक उत्पादन की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
भारत द्वारा प्राकृतिक गैस की आधे से अधिक जरूरत आयात किए जाने के कारण ऊर्जा दक्षता का महत्व और बढ़ जाता है। यदि प्रति टन उर्वरक उत्पादन में ऊर्जा की खपत कम की जाती है तो इससे उद्योग की लागत संरचना में सुधार के साथ-साथ ऊर्जा संसाधनों के अधिक कुशल इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा।
FAI की बरौनी कार्यशाला इसी दिशा में उद्योग को एक साझा मंच उपलब्ध करा रही है, जहां कंपनियां अपनी तकनीकी उपलब्धियों, चुनौतियों और समाधान पर चर्चा कर रही हैं। इससे न केवल मौजूदा संयंत्रों की दक्षता बढ़ाने में मदद मिल सकती है, बल्कि भविष्य में स्थापित होने वाले नए संयंत्रों को भी अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने की दिशा मिल सकती है।
कुल मिलाकर, बरौनी में आयोजित FAI का ऊर्जा संरक्षण कार्यक्रम यह स्पष्ट करता है कि भारतीय उर्वरक उद्योग ने पिछले चार दशकों में ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन भविष्य की चुनौतियां इससे भी अधिक तकनीकी और आर्थिक होंगी। अमोनिया और यूरिया संयंत्रों में ऊर्जा खपत में क्रमशः 36.6 प्रतिशत और 38.3 प्रतिशत सुधार के बावजूद अब अगला चरण अधिक कठिन है।
ऐसे में तकनीकी उन्नयन, प्लांट रिवैम्प, वेस्ट-हीट रिकवरी, बेहतर कैटेलिस्ट, ऊर्जा प्रबंधन, नवीकरणीय ऊर्जा और उद्योग के बीच ज्ञान साझा करने को उर्वरक क्षेत्र की भविष्य की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा। ऊर्जा दक्षता में प्रत्येक सुधार न केवल कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाएगा, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता और किसानों के लिए उर्वरकों की दीर्घकालिक उपलब्धता को मजबूत करने में भी योगदान देगा।

