वैश्विक यूरिया बाजार में एक बार फिर कीमतों पर तेजी का दबाव बनता दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान से जुड़ी आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार में कारोबारियों की चिंता बढ़ी है। यूरिया के उत्पादन और आपूर्ति के लिए प्राकृतिक गैस तथा अन्य ऊर्जा स्रोतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में ऊर्जा और परिवहन से जुड़े जोखिम बढ़ने पर यूरिया की लागत और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
इसके साथ ही चीन की यूरिया निर्यात नीति में बदलाव को वैश्विक बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। चीन दुनिया के प्रमुख यूरिया उत्पादक देशों में शामिल है। इसलिए वहां से निर्यात में कमी या बढ़ोतरी का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर सीधे दिखाई दे सकता है। भारत समेत यूरिया के बड़े आयातक देशों की नजर चीन की नीति और वैश्विक आपूर्ति की स्थिति पर बनी हुई है।
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी आपूर्ति की चिंता
पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से केवल कच्चे तेल की कीमतों पर ही असर नहीं पड़ता, बल्कि प्राकृतिक गैस, समुद्री परिवहन और रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।
यूरिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होती है। गैस की कीमत बढ़ने पर यूरिया उत्पादन की लागत भी बढ़ जाती है। यदि किसी क्षेत्र में गैस आपूर्ति या संयंत्रों के संचालन पर असर पड़ता है तो वैश्विक बाजार में उपलब्ध यूरिया की मात्रा कम हो सकती है।
इसके अलावा पश्चिम एशिया से गुजरने वाले महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में किसी तरह की बाधा आने पर जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत और माल ढुलाई खर्च बढ़ सकता है। इसका असर अंततः उर्वरक की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ सकता है।
ईरान से जुड़ी अनिश्चितता का असर
ईरान भी वैश्विक ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्षेत्रीय तनाव के कारण ईरान से जुड़ी उर्वरक आपूर्ति पर बाजार की नजर बनी हुई है। यूरिया और अन्य नाइट्रोजन उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में किसी भी तरह की अनिश्चितता कारोबारियों को आगे की कीमतों को लेकर सतर्क कर देती है।
बाजार में जब आपूर्ति को लेकर आशंका बढ़ती है तो खरीदार अक्सर अपनी जरूरत पहले ही सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं। इससे तत्काल मांग बढ़ सकती है और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। यदि इसके साथ उत्पादन लागत भी बढ़ती है तो तेजी का असर और मजबूत हो सकता है।
हालांकि, वैश्विक यूरिया कीमतों पर केवल पश्चिम एशिया की स्थिति का असर नहीं पड़ता। उत्पादन, घरेलू मांग, निर्यात नीति, बंदरगाहों पर उपलब्धता और बड़े आयातक देशों की खरीद रणनीति भी कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
चीन की निर्यात नीति क्यों महत्वपूर्ण है?
वैश्विक यूरिया बाजार में चीन की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। चीन में यूरिया का बड़ा उत्पादन होता है, लेकिन वहां घरेलू कृषि मांग भी बड़ी है। इसलिए चीन सरकार समय-समय पर घरेलू उपलब्धता और किसानों की जरूरतों को देखते हुए यूरिया निर्यात को नियंत्रित करती रही है।
यदि चीन से यूरिया का निर्यात सीमित रहता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध माल कम हो सकता है। ऐसे में दूसरे उत्पादक देशों पर आपूर्ति का दबाव बढ़ सकता है और कीमतों में तेजी आ सकती है। इसके विपरीत यदि चीन निर्यात में ढील देता है और बड़ी मात्रा में यूरिया अंतरराष्ट्रीय बाजार में आता है तो कीमतों पर नरमी का दबाव बन सकता है।
यही वजह है कि इस समय वैश्विक बाजार में चीन की निर्यात नीति को लेकर विशेष निगरानी की जा रही है। चीन के किसी भी बड़े नीतिगत बदलाव का असर एशिया, दक्षिण एशिया और अन्य आयातक बाजारों में दिखाई दे सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यूरिया बाजार?
भारत दुनिया में यूरिया के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में किसानों को यूरिया अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है और सरकार इसके लिए बड़े स्तर पर सब्सिडी देती है। घरेलू उत्पादन के बावजूद भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी यूरिया खरीदना पड़ता है।
इस कारण वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारत के उर्वरक आयात बिल पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया महंगा होने पर सरकार को समान मात्रा में उर्वरक खरीदने के लिए अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
हालांकि किसानों पर इसका सीधा असर केवल अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने से नहीं पड़ता, क्योंकि भारत में यूरिया की खुदरा कीमत सरकार द्वारा नियंत्रित है। लेकिन आयात लागत बढ़ने पर सरकार की उर्वरक सब्सिडी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
किसानों के लिए यूरिया की कीमत पर क्या असर होगा?
वैश्विक बाजार में तेजी का मतलब यह जरूरी नहीं है कि भारत में किसानों के लिए यूरिया की कीमत तुरंत बढ़ जाएगी। भारत में यूरिया की अधिकतम खुदरा कीमत सरकारी नीति के तहत नियंत्रित रहती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का पहला प्रभाव सरकार और उर्वरक कंपनियों की खरीद लागत तथा सब्सिडी व्यवस्था पर पड़ता है।
किसानों के लिए अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के दौरान देश में यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे। यदि आयात महंगा होने के साथ-साथ आपूर्ति में भी बाधा आती है तो कुछ क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर मांग और आपूर्ति का अंतर बढ़ सकता है।
इसीलिए केंद्र और राज्य सरकारों के लिए केवल कीमत पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा। राज्यों में स्टॉक, रेक की उपलब्धता, परिवहन और वितरण व्यवस्था की लगातार निगरानी भी जरूरी होगी।
नाइट्रोजन उर्वरकों पर बढ़ सकता है दबाव
यूरिया की कीमतों में तेजी का असर व्यापक नाइट्रोजन उर्वरक बाजार पर भी पड़ सकता है। यूरिया के अलावा अमोनिया और अन्य नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की लागत भी प्राकृतिक गैस और ऊर्जा कीमतों से जुड़ी होती है।
यदि ऊर्जा लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो उर्वरक निर्माताओं की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इससे वैश्विक स्तर पर नाइट्रोजन उर्वरकों के दाम प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी ओर, यदि किसी समय कृषि मांग कमजोर रहती है और उत्पादन पर्याप्त होता है तो कीमतों में तेजी सीमित भी हो सकती है। इसलिए बाजार की दिशा तय करने में मांग और आपूर्ति दोनों महत्वपूर्ण रहेंगे।
आयातक देशों की खरीद रणनीति भी अहम
वैश्विक यूरिया बाजार में बड़े आयातक देशों की खरीद गतिविधियां भी कीमतों को प्रभावित करती हैं। जब कोई बड़ा देश बड़ी मात्रा में यूरिया खरीदने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतरता है तो उपलब्ध माल पर दबाव बढ़ जाता है।
भारत की ओर से यूरिया की खरीद, ब्राजील और अन्य कृषि उत्पादक देशों की मांग तथा एशियाई बाजारों की गतिविधियों पर भी कारोबारियों की नजर रहती है। यदि कई बड़े खरीदार एक साथ खरीद बढ़ाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी तेज हो सकती है।
इसके उलट यदि खरीदार खरीद टालते हैं या पर्याप्त घरेलू स्टॉक मौजूद रहता है तो बाजार में कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
आगे कैसी रह सकती है बाजार की दिशा?
फिलहाल वैश्विक यूरिया बाजार में कई ऐसे कारक मौजूद हैं जो कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा सकते हैं। पश्चिम एशिया का तनाव, ईरान से जुड़ी आपूर्ति अनिश्चितता, ऊर्जा कीमतें, समुद्री परिवहन लागत और चीन की निर्यात नीति आने वाले समय में बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक रहेंगे।
यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और उर्वरक आपूर्ति या ऊर्जा बाजार प्रभावित होते हैं, तो यूरिया की कीमतों पर तेजी का दबाव और बढ़ सकता है। वहीं, यदि आपूर्ति व्यवस्था सामान्य रहती है और चीन से निर्यात में पर्याप्त उपलब्धता आती है तो कीमतों में तेजी सीमित हो सकती है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वैश्विक बाजार की अस्थिरता के बावजूद घरेलू स्तर पर यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे। सरकार के सामने एक तरफ किसानों को नियंत्रित कीमत पर खाद उपलब्ध कराने की चुनौती होगी, तो दूसरी तरफ बढ़ती आयात लागत और सब्सिडी खर्च को संतुलित करना होगा।
कुल मिलाकर, वैश्विक यूरिया बाजार इस समय कई अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बीच खड़ा है। पश्चिम एशिया की स्थिति और चीन की निर्यात नीति आने वाले दिनों में बाजार के लिए दो प्रमुख संकेतक बन सकते हैं। इनके साथ ऊर्जा कीमतों और बड़े आयातक देशों की खरीद गतिविधियों पर नजर रखना भी जरूरी होगा। किसानों के लिए इसका सबसे बड़ा मतलब यही है कि आने वाले कृषि सीजन में यूरिया की उपलब्धता, समय पर वितरण और घरेलू स्टॉक की स्थिति महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

