पंजाब में धान की कटाई का सीजन नजदीक आने के साथ ही किसानों और राज्य सरकार के बीच टकराव की स्थिति एक बार फिर बनती दिखाई दी है। किसान मजदूर मोर्चा (KMM) ने 13 सितंबर को ऐलान किया कि वह 16 सितंबर से पांच दिनों तक राज्य के विधानसभा अध्यक्ष और आम आदमी पार्टी सरकार के सात मंत्रियों के आवास के बाहर प्रदर्शन करेगा। किसान संगठन ने बिजली आपूर्ति और खाद की उपलब्धता को लेकर तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
किसान मजदूर मोर्चा ने भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के साथ मिलकर आंदोलन की रणनीति तैयार की है। संगठन के अनुसार, धान सीजन के दौरान किसानों को पर्याप्त कृषि बिजली और उर्वरक उपलब्ध कराने में सरकार की ओर से लापरवाही नहीं होनी चाहिए। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने किसानों की मांगों पर उचित प्रतिक्रिया नहीं दी तो आंदोलन को और तेज किया जा सकता है।
इन नेताओं के घरों के बाहर होगा प्रदर्शन
किसान संगठन के अनुसार, प्रदर्शन पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां के फरीदकोट स्थित आवास के अलावा सात कैबिनेट मंत्रियों के आवास के बाहर किए जाएंगे। इनमें जंडियाला में हरभजन सिंह ईटीओ, सुनाम में अमन अरोड़ा, भोआ में लाल चंद कटारुचक, होशियारपुर में रवजोत सिंह, मुक्तसर में गुरमीत सिंह खुड्डियां, जालंधर में मोहिंदर भगत और लुधियाना में हरदीप सिंह मुंडियां के आवास शामिल हैं।
KMM के संयोजक सरवन सिंह पंधेर ने कहा कि 16 सितंबर को होने वाली बैठक में आंदोलन के अगले चरण को लेकर फैसला किया जाएगा। उन्होंने संकेत दिया कि यदि सरकार ने किसानों की मांगों पर गंभीरता नहीं दिखाई तो आंदोलन को और अधिक व्यापक तथा तीव्र किया जा सकता है।
बिजली और खाद की उपलब्धता बनी मुख्य वजह
किसानों के मौजूदा आंदोलन के पीछे सबसे प्रमुख मुद्दों में कृषि बिजली की उपलब्धता और उर्वरक की आपूर्ति शामिल है। पंजाब में धान की खेती के दौरान सिंचाई के लिए बिजली किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। इस साल भी कृषि बिजली आपूर्ति को लेकर किसानों ने कई बार परेशानी जताई है।
किसानों का कहना रहा है कि बुवाई के महत्वपूर्ण समय में कई क्षेत्रों में उन्हें पर्याप्त बिजली नहीं मिली। कुछ स्थानों पर कृषि बिजली आपूर्ति घटकर प्रतिदिन लगभग ढाई से चार घंटे तक रह जाने की शिकायतें सामने आई थीं। बिजली की कमी के कारण किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए डीजल से चलने वाले पंपों का सहारा लेना पड़ा, जिससे उनकी लागत बढ़ गई।
धान की फसल के लिए सिंचाई की जरूरत अधिक होने के कारण बिजली की उपलब्धता का मुद्दा और संवेदनशील हो जाता है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि धान सीजन के दौरान बिजली आपूर्ति नियमित नहीं रही तो उत्पादन लागत पर सीधा असर पड़ेगा।
खाद की उपलब्धता पर भी किसानों की चिंता
पंजाब में उर्वरक की उपलब्धता भी लंबे समय से किसानों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने जून में बताया था कि पंजाब को उसकी आकलित जरूरत से अधिक यूरिया और डीएपी उपलब्ध कराया गया था।
मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब को 9.87 लाख मीट्रिक टन की जरूरत के मुकाबले 11.45 लाख मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध कराया गया था। इसी तरह डीएपी की 1.11 लाख मीट्रिक टन की आवश्यकता के मुकाबले 1.80 लाख मीट्रिक टन की आपूर्ति की गई थी।
हालांकि, किसान संगठनों और खाद विक्रेताओं ने कई क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर खाद की कमी और अचानक बढ़ी मांग की शिकायतें की हैं। कई जगहों पर किसान खाद लेने के लिए दुकानों पर लंबी कतारों में दिखाई दिए हैं। पंजाब कृषि विभाग की ओर से कुछ मामलों में यह भी कहा गया है कि सब्सिडी वाले यूरिया का औद्योगिक इस्तेमाल होने के कारण स्थानीय स्तर पर आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
किसान संगठनों का कहना है कि सरकारी आंकड़ों में पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद यदि किसानों को समय पर खाद नहीं मिलती है तो जमीनी स्तर की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग
किसान मजदूर मोर्चा का आंदोलन केवल बिजली और खाद तक सीमित नहीं है। संगठन ने कई पुरानी और व्यापक मांगों को भी आंदोलन में शामिल किया है। इनमें कई फसलों के लिए सरकारी खरीद की गारंटी और न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को प्रभावी रूप से लागू करने की मांग प्रमुख है।
किसानों की मांग है कि बासमती, मक्का, मूंग, सरसों और आलू जैसी फसलों की भी सरकारी खरीद सुनिश्चित की जाए। फिलहाल गेहूं और धान की तरह इन सभी फसलों के लिए व्यापक सरकारी खरीद व्यवस्था नहीं है। किसान संगठनों का तर्क है कि यदि इन फसलों के लिए भी खरीद की गारंटी मिले तो किसानों को बाजार में कीमतों में भारी गिरावट का सामना नहीं करना पड़ेगा।
किसान संगठन एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग लंबे समय से करते रहे हैं। उनका कहना है कि एमएसपी तय करने की व्यवस्था में उत्पादन लागत को ध्यान में रखते हुए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप कीमत सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कर्ज माफी और आत्महत्या प्रभावित परिवारों के लिए सहायता
KMM ने किसानों और खेत मजदूरों की कर्जमाफी की भी मांग उठाई है। संगठन चाहता है कि किसानों और कृषि मजदूरों पर मौजूद कर्ज को पूरी तरह माफ किया जाए।
इसके अलावा आत्महत्या करने वाले किसानों और खेत मजदूरों के परिवारों को मुआवजा तथा सरकारी नौकरी देने की मांग भी की गई है। किसान संगठनों का कहना है कि आर्थिक संकट और कर्ज के कारण प्रभावित परिवारों को लंबे समय तक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे परिवारों को सरकारी स्तर पर पर्याप्त सहायता मिलनी चाहिए।
लैंड पूलिंग नीति और भूमि अधिग्रहण का विरोध
किसान संगठन पंजाब की लैंड पूलिंग नीति को वापस लेने की मांग भी कर रहा है। इसके अलावा भारतमाला हाईवे परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध किया जा रहा है।
KMM का आरोप है कि कई स्थानों पर किसानों की जमीन का अधिग्रहण पर्याप्त मुआवजे के बिना किया गया है। संगठन ने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया की समीक्षा और उचित मुआवजे की मांग की है।
इसके साथ ही संगठन ने पाकिस्तान के साथ व्यापार के लिए वाघा सीमा मार्ग को फिर से खोलने की मांग भी उठाई है। किसान संगठनों का मानना है कि सीमावर्ती व्यापार बढ़ने से पंजाब के किसानों और कारोबारियों को नए बाजार मिल सकते हैं।
पहले भी सीमा पर हुआ था किसान आंदोलन
पंजाब में किसानों का यह आंदोलन ऐसे समय में शुरू हो रहा है जब इसी साल किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच कई मुद्दों को लेकर टकराव देखने को मिला है। संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य किसान संगठनों से जुड़े किसानों ने पहले दिल्ली की ओर कूच करने की कोशिश की थी।
इन किसान समूहों ने प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर भी चिंता जताई थी। किसान संगठनों को आशंका थी कि समझौते के कारण सस्ते डेयरी उत्पाद, खाद्य तेल और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के आयात का रास्ता खुल सकता है, जिससे भारतीय किसानों पर दबाव बढ़ेगा।
सरकार की ओर से कहा गया है कि डेयरी, चावल, गेहूं और पोल्ट्री जैसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों को समझौते में संरक्षण दिया गया है। सरकार का यह भी कहना है कि भारत की 90 से 95 प्रतिशत कृषि टैरिफ लाइनों को सुरक्षित रखा गया है। इसके बावजूद किसान संगठन अपनी मांगों पर कायम हैं।
सरकार से बातचीत की मांग
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार की ओर से किसानों के साथ बातचीत का रास्ता अपनाया गया है। हालांकि KMM का कहना है कि बिजली और खाद जैसे मुद्दों के समाधान के लिए केवल राज्य सरकार के साथ बातचीत पर्याप्त नहीं है। संगठन चाहता है कि संबंधित विभागों और केंद्र सरकार के स्तर पर भी इन मुद्दों को गंभीरता से उठाया जाए।
धान की कटाई का सीजन शुरू होने से पहले किसानों का यह आंदोलन सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। पंजाब देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में शामिल है और यहां धान की खरीद, बिजली, खाद तथा मंडी व्यवस्था से जुड़े मुद्दे हर साल महत्वपूर्ण बन जाते हैं।
अब 16 सितंबर से शुरू होने वाले पांच दिवसीय प्रदर्शन पर किसानों और सरकार दोनों की नजर रहेगी। यदि सरकार किसानों की मांगों पर ठोस कदम उठाती है तो टकराव को टाला जा सकता है। वहीं, मांगों पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में KMM के आंदोलन को और तेज करने की संभावना बनी हुई है।

