भारत ने किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों तथा आपूर्ति में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए लंबी अवधि की रणनीति पर काम तेज कर दिया है। केंद्र सरकार के अनुसार, भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए दीर्घकालिक समझौतों के जरिए 86 लाख टन से अधिक उर्वरक की आपूर्ति सुरक्षित की है। इसके साथ ही घरेलू स्तर पर फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों यानी पीएंडके खाद के उत्पादन को भी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।
सरकार की इस रणनीति का उद्देश्य केवल तत्काल खाद की जरूरत पूरी करना नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में उर्वरकों की उपलब्धता को अधिक स्थिर बनाना भी है। वैश्विक बाजार में यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य उर्वरकों की कीमतें कई अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं। प्राकृतिक गैस की कीमत, कच्चे माल की उपलब्धता, समुद्री मालभाड़ा, युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव तथा प्रमुख उत्पादक देशों की निर्यात नीतियां खाद के बाजार पर सीधा असर डालती हैं।
लंबी अवधि के समझौतों से आपूर्ति सुरक्षित
केंद्र सरकार की ओर से बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से भारत ने 86 लाख टन से अधिक उर्वरक की आपूर्ति सुरक्षित की है। इस तरह के समझौते भारत को वैश्विक बाजार में अचानक होने वाले बदलावों से कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करते हैं।
दरअसल, जब किसी देश में उर्वरक की मांग अचानक बढ़ती है या किसी बड़े उत्पादक देश की ओर से निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में जिन देशों के पास पहले से आपूर्ति समझौते होते हैं, उन्हें बाजार में उपलब्ध माल के लिए तत्काल प्रतिस्पर्धा कम करनी पड़ती है।
भारत जैसे बड़े कृषि प्रधान देश के लिए यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में हर साल बड़ी मात्रा में यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों की जरूरत होती है। घरेलू उत्पादन के बावजूद कुछ उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए भारत को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
घरेलू पीएंडके उत्पादन बढ़ाने पर जोर
सरकार ने आयात पर निर्भरता कम करने के साथ घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दिया है। विशेष रूप से फॉस्फेटिक और पोटाशिक यानी पीएंडके उर्वरकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरक किसानों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें नाइट्रोजन के साथ फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं। इन उर्वरकों की मांग रबी और खरीफ दोनों सीजन में अलग-अलग फसलों के हिसाब से बनी रहती है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी आने की स्थिति में घरेलू उत्पादन किसानों और सरकार दोनों के लिए राहत का माध्यम बन सकता है।
वैश्विक बाजार में बढ़ी अनिश्चितता
पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार में कई बार बड़े उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा कीमतों में बदलाव और चीन की निर्यात नीति जैसे मुद्दों ने वैश्विक खाद बाजार को प्रभावित किया है।
उर्वरक उत्पादन में प्राकृतिक गैस और अन्य ऊर्जा संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए ऊर्जा कीमतों में तेजी का असर उत्पादन लागत पर पड़ता है। दूसरी ओर, समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधा आने पर परिवहन और बीमा लागत बढ़ सकती है।
ऐसे माहौल में भारत के लिए पहले से उर्वरक सुरक्षित करना महत्वपूर्ण हो जाता है। लंबी अवधि के समझौते इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिससे सरकार को भविष्य की मांग के लिए आपूर्ति की बेहतर योजना बनाने में मदद मिलती है।
किसानों पर सीधे असर को कम करने की कोशिश
अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमत बढ़ने का असर भारत में हमेशा उसी अनुपात में किसानों पर नहीं पड़ता। खासकर यूरिया के मामले में सरकार किसानों को नियंत्रित कीमत पर खाद उपलब्ध कराती है। अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने पर सरकार को आयात और सब्सिडी के मोर्चे पर अधिक दबाव झेलना पड़ सकता है।
डीएपी और अन्य पीएंडके उर्वरकों के मामले में भी सरकार की सब्सिडी व्यवस्था किसानों के लिए कीमतों को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के दौरान सरकार के सामने दोहरी चुनौती होती है। एक तरफ किसानों को उचित कीमत पर खाद उपलब्ध करानी होती है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती आयात लागत और सब्सिडी के वित्तीय बोझ को भी संभालना पड़ता है।
खरीद रणनीति में विविधता जरूरी
भारत की उर्वरक सुरक्षा केवल एक या दो देशों से आयात पर निर्भर नहीं रह सकती। इसके लिए अलग-अलग देशों से आपूर्ति स्रोत विकसित करना महत्वपूर्ण है। लंबी अवधि के समझौते इस दिशा में मदद करते हैं।
अगर किसी एक देश से आपूर्ति प्रभावित होती है, तो दूसरे स्रोतों से खाद की व्यवस्था की जा सकती है। इससे अचानक पैदा होने वाली कमी और कीमतों में तेज उछाल के जोखिम को कम किया जा सकता है।
भारत के लिए रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया और पोटाश जैसे कच्चे माल की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने के लिए इन संसाधनों की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी है।
यूरिया के साथ डीएपी और एनपीके पर भी नजर
भारत में यूरिया की मांग सबसे अधिक रहने के कारण इसकी आपूर्ति सरकार की प्राथमिकता में रहती है। लेकिन किसानों के लिए केवल नाइट्रोजन की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। संतुलित पोषण के लिए फॉस्फोरस और पोटाश की भी आवश्यकता होती है।
इसी वजह से डीएपी, एनपीके और एमओपी जैसे उर्वरकों की उपलब्धता पर भी सरकार को लगातार नजर रखनी पड़ती है। यदि किसी एक खाद की कमी होती है तो किसान दूसरी खादों का इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं, जिससे पूरे बाजार में मांग का संतुलन बदल सकता है।
घरेलू पीएंडके उत्पादन बढ़ाने की पहल इसी व्यापक खाद सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है।
किसानों के लिए क्या मायने रखता है?
सरकार की ओर से 86 लाख टन से अधिक उर्वरक लंबी अवधि के समझौतों के जरिए सुरक्षित किए जाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आने वाले समय में आपूर्ति को अधिक व्यवस्थित रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि किसानों के लिए केवल देश में खाद की कुल उपलब्धता महत्वपूर्ण नहीं है। उनके लिए यह भी जरूरी है कि खाद उनके जिले और स्थानीय बाजार तक समय पर पहुंचे। कई बार राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद परिवहन, भंडारण या वितरण की समस्या के कारण कुछ क्षेत्रों में अस्थायी कमी महसूस हो सकती है।
इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों के सामने स्टॉक की उपलब्धता के साथ-साथ उसकी समय पर आवाजाही सुनिश्चित करने की भी चुनौती रहती है।
आगे घरेलू उत्पादन बढ़ाना बड़ी प्राथमिकता
भारत लंबे समय में उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नए संयंत्रों को प्रोत्साहित करने, मौजूदा इकाइयों की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने और कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है।
हालांकि पूरी तरह आत्मनिर्भरता हासिल करना आसान नहीं है। कुछ प्रमुख खनिज और कच्चे माल भारत में सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। ऐसे में घरेलू उत्पादन और रणनीतिक आयात के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।
सरकार की मौजूदा रणनीति को इसी संतुलन के रूप में देखा जा सकता है। एक तरफ लंबी अवधि के अंतरराष्ट्रीय समझौतों के जरिए खाद की आपूर्ति सुरक्षित की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू पीएंडके उत्पादन बढ़ाया जा रहा है।
खाद सुरक्षा को लेकर लंबी तैयारी
कुल मिलाकर, 86 लाख टन से अधिक उर्वरक की दीर्घकालिक आपूर्ति सुरक्षित करना भारत की खाद सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ने के बीच पहले से खरीद समझौते करने से भारत को अचानक होने वाले आपूर्ति संकट और कीमतों में तेज उछाल से निपटने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ घरेलू पीएंडके उत्पादन बढ़ाने की कोशिश आयात निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में भारत के लिए चुनौती यह होगी कि अंतरराष्ट्रीय खरीद, घरेलू उत्पादन, भंडारण, परिवहन और राज्यों तक वितरण के बीच बेहतर तालमेल कायम किया जाए।
किसानों के लिए इसका अंतिम लाभ तभी सुनिश्चित होगा जब पर्याप्त मात्रा में उर्वरक सही समय पर, सही जगह और उचित कीमत पर उपलब्ध हो। इसलिए खाद सुरक्षा की यह रणनीति केवल आयात और उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उर्वरक वितरण तंत्र को मजबूत करने से जुड़ी हुई है।
