Goat Farming in Rainy Season: बरसात का मौसम खेती के साथ-साथ पशुपालन के लिए भी बेहद अहम होता है। बारिश से जहां हरे चारे की उपलब्धता बढ़ती है, वहीं लगातार नमी, कीचड़, गंदगी और दूषित पानी बकरियों की सेहत के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं। ऐसे में बकरी पालकों को बरसात के दिनों में सामान्य दिनों के मुकाबले अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। बाड़े की सफाई और जल निकासी से लेकर चारे, पीने के पानी, खुरों की देखभाल, टीकाकरण और परजीवी नियंत्रण तक कई छोटी-छोटी बातें बड़े नुकसान से बचा सकती हैं।
भारत में बकरी पालन छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय और रोजगार का महत्वपूर्ण साधन है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (ICAR-CIRG) का उद्देश्य भी बकरी के मांस, दूध और फाइबर की उत्पादकता को बेहतर बनाकर छोटे पशुपालकों की आजीविका मजबूत करना है। (Central Institute of Research and Growth)
बरसात के दौरान बकरी पालक यदि पहले से तैयारी कर लें और पशुओं के व्यवहार तथा स्वास्थ्य पर रोज नजर रखें तो कई समस्याओं को शुरुआती स्तर पर ही पहचाना जा सकता है। आइए आसान भाषा में जानते हैं कि बारिश के मौसम में बकरी पालन करते समय किन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए।
बारिश में सबसे बड़ी चुनौती है नमी और गंदगी
बरसात शुरू होते ही बकरी के बाड़े के आसपास पानी जमा होने की समस्या बढ़ जाती है। लगातार गीली जमीन और कीचड़ में रहने से बकरियों के खुर और त्वचा प्रभावित हो सकते हैं। गंदे वातावरण में बीमारी फैलाने वाले जीवों और परजीवियों के संपर्क का खतरा भी बढ़ता है।
इसलिए सबसे पहला काम बाड़े को सूखा रखना है। छत ऐसी होनी चाहिए कि बारिश का पानी अंदर न आए। फर्श पर पानी जमा नहीं होना चाहिए और बाड़े के आसपास पानी निकालने के लिए उचित नाली की व्यवस्था होनी चाहिए। जहां संभव हो, बकरियों के आराम करने की जगह जमीन से कुछ ऊंची रखी जा सकती है। गीला बिछावन समय पर हटाकर उसकी जगह साफ और सूखा बिछावन डालना चाहिए।
बाड़े में हवा का आना-जाना भी जरूरी
बारिश से बचाने के लिए कई पशुपालक बकरी के बाड़े को चारों तरफ से पूरी तरह बंद कर देते हैं। ऐसा करना सही नहीं है। बकरियों को बारिश और तेज हवा से सुरक्षा जरूर मिलनी चाहिए, लेकिन बाड़े में पर्याप्त वेंटिलेशन भी होना चाहिए।बहुत अधिक बंद और नम बाड़े में बदबू और नमी बढ़ सकती है। इसलिए शेड इस तरह तैयार करें कि बारिश का पानी अंदर न पहुंचे लेकिन ताजी हवा आती-जाती रहे। खासकर छोटे बच्चों, गर्भित बकरियों और कमजोर पशुओं के बैठने की जगह साफ, आरामदायक और सूखी रखनी चाहिए।
बरसात में हरा चारा खूब मिलता है, लेकिन सावधानी जरूरी
मानसून के दौरान खेतों और चरागाहों में हरी घास तेजी से बढ़ती है। पहली नजर में यह बकरी पालकों के लिए अच्छी बात है, लेकिन केवल हरा चारा उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। चारे की गुणवत्ता और संतुलित पोषण भी जरूरी है।
दक्षिण गुजरात के अधिक वर्षा वाले इलाके में बकरियों पर किए गए एक अध्ययन में मानसून के दौरान कई बकरियों की बॉडी कंडीशन कम पाई गई। इससे पता चलता है कि हरियाली दिखाई देने के बावजूद बरसात में पोषण और स्वास्थ्य प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है। (Indian Agricultural Research Journals)
बकरियों को सड़ा हुआ, फफूंद लगा या बदबूदार चारा बिल्कुल नहीं देना चाहिए। बहुत गीला चारा भी सीधे बड़ी मात्रा में खिलाने से बचें। चारा साफ जगह पर रखें और उसे बारिश के पानी तथा जमीन की नमी से बचाएं। दाना और सूखा चारा रखने वाली जगह भी सूखी होनी चाहिए। यदि दाने में फफूंद, असामान्य गंध या रंग में बदलाव दिखाई दे तो उसे पशुओं को न खिलाएं।
संतुलित आहार पर दें ध्यान
बकरी को सिर्फ पेट भरने के लिए चारा देना पर्याप्त नहीं है। उसकी उम्र, वजन, गर्भावस्था, दूध उत्पादन और स्वास्थ्य के अनुसार पोषण की जरूरत अलग हो सकती है। हरा चारा, उपयुक्त सूखा चारा और जरूरत के अनुसार संतुलित दाना देना चाहिए। खनिज मिश्रण आदि की जरूरत के बारे में स्थानीय पशु चिकित्सक या पशु पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।
ICAR-CIRG से जुड़े 2025 के एक अध्ययन में सालभर चारा उपलब्ध कराने के लिए अनाज और दलहनी चारा फसलों को मिलाकर उगाने की व्यवस्था का अध्ययन किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि योजनाबद्ध तरीके से चारा उत्पादन करने से बकरी पालक सालभर पोषण की व्यवस्था बेहतर बना सकते हैं। (Indian Agricultural Research Journals)
पीने का पानी हमेशा साफ रखें
बरसात में साफ पानी की उपलब्धता दिखने में आसान लगती है, लेकिन यही मौसम पानी को दूषित भी कर सकता है। बकरियों को गड्ढों, नालियों या जमा बारिश का पानी पीने न दें। पीने के लिए साफ और ताजा पानी उपलब्ध कराएं। पानी के बर्तन नियमित रूप से साफ करें। यदि बर्तन में मिट्टी, चारा या गंदगी गिर गई है तो पानी बदल दें।
बाड़े के आसपास ऐसी जगहों को भी ठीक करना जरूरी है जहां कई दिनों तक पानी जमा रहता हो। जल निकासी जितनी अच्छी होगी, पशुओं के आसपास का वातावरण उतना ही साफ और सूखा रहेगा।
बरसात में परजीवियों पर रखें नजर
बारिश और नमी के मौसम में आंतरिक तथा बाहरी परजीवियों की समस्या पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। यही कारण है कि बकरी पालन में नियमित स्वास्थ्य निगरानी और वैज्ञानिक परजीवी नियंत्रण महत्वपूर्ण माना जाता है।
ICAR-CIRG की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट में संस्थान के पशुओं के लिए टीकाकरण के साथ डीवॉर्मिंग और डिपिंग जैसी निवारक स्वास्थ्य गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है। (Central Institute of Research and Growth)
हालांकि, पशुपालकों को अपनी तरफ से बार-बार कोई भी कृमिनाशक दवा नहीं देनी चाहिए। कौन-सी दवा, कितनी मात्रा में और कब देनी है, यह पशु चिकित्सक की सलाह तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तय होना चाहिए।
जरूरत से अधिक या गलत तरीके से दवा देने से फायदा कम हो सकता है। इसलिए बेहतर तरीका यह है कि पशुओं की जांच और स्थानीय पशु चिकित्सक की सलाह के आधार पर परजीवी नियंत्रण किया जाए।
खुरों की नियमित जांच करें
बरसात के मौसम में बकरियों के पैर लगातार गीली मिट्टी और कीचड़ के संपर्क में आ सकते हैं। इसलिए खुरों को रोज देखना अच्छी आदत है। यदि कोई बकरी लंगड़ाकर चल रही हो, पैर जमीन पर रखने से बच रही हो या खुर के आसपास सूजन, घाव या असामान्य बदलाव दिखाई दे तो उसे नजरअंदाज न करें। ऐसे पशु को सूखी और साफ जगह पर रखें और पशु चिकित्सक से जांच कराएं। समय पर ध्यान देने से छोटी समस्या को गंभीर बनने से रोका जा सकता है।
टीकाकरण को हल्के में न लें
संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण बकरी पालन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ICAR-CIRG के वार्षिक बकरी स्वास्थ्य कैलेंडर में PPR, फुट एंड माउथ डिजीज (FMD), गोट पॉक्स, एंटरोटॉक्सिमिया (ET) और हेमरेजिक सेप्टीसीमिया (HS) जैसी बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण की जानकारी दी गई है। (Central Institute of Research and Growth)
लेकिन टीके का सही समय पशु की उम्र, पहले लगाए गए टीके, उत्पाद और स्थानीय पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए किसान अपने क्षेत्र के पशु चिकित्सक से टीकाकरण कैलेंडर बनवाएं। टीकाकरण की तारीख लिखकर रखना भी फायदेमंद है। इससे यह याद रहता है कि किस बकरी को कौन-सा टीका कब लगाया गया था और अगली खुराक कब देनी है।
बीमार बकरी को तुरंत अलग करें
बरसात में यदि किसी बकरी में बीमारी के संकेत दिखाई दें तो उसे बाकी झुंड से अलग रखना समझदारी है। इससे संक्रमण फैलने की आशंका कम करने में मदद मिल सकती है और बीमार पशु पर बेहतर निगरानी रखी जा सकती है।
भूख अचानक कम होना, लगातार दस्त, सुस्ती, बुखार जैसा महसूस होना, नाक या आंख से असामान्य स्राव, सांस लेने में परेशानी, लगातार खांसी या अचानक लंगड़ापन जैसे संकेत दिखाई दें तो पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
ICAR-CIRG की 2024 की रिपोर्ट में संस्थान के पशुओं में दर्ज स्वास्थ्य समस्याओं में दस्त सबसे अधिक बताए गए, जबकि बुखार/भूख न लगना, घाव, लंगड़ापन, कमजोरी और निमोनिया जैसी समस्याएं भी दर्ज हुईं। (Central Institute of Research and Growth)
नए खरीदे पशु को सीधे झुंड में न मिलाएं
बरसात में यदि नई बकरी खरीदी गई है तो उसे तुरंत पुराने झुंड में मिलाने के बजाय कुछ समय अलग रखकर उसके स्वास्थ्य की निगरानी करना बेहतर है। पशु चिकित्सक से जांच कराकर टीकाकरण और परजीवी नियंत्रण का रिकॉर्ड भी पता करें। नई बकरी के बीमार होने की स्थिति में उसे सीधे झुंड में मिलाने से दूसरे पशुओं तक संक्रमण पहुंचने का खतरा हो सकता है। इसी तरह बीमार पशु के इस्तेमाल किए गए बर्तन और उपकरण साफ रखें।
छोटे बच्चों पर रखें ज्यादा नजर
बकरी के छोटे बच्चे मौसम के बदलाव और संक्रमण के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं। बारिश के दौरान बच्चों के रहने की जगह बिल्कुल सूखी रखने की कोशिश करें। उन्हें ठंडी हवा और बारिश में भीगने से बचाएं। मां का दूध ठीक से मिल रहा है या नहीं, बच्चा सक्रिय है या नहीं और सामान्य रूप से खा-पी रहा है या नहीं, इन बातों को रोज देखना चाहिए। यदि बच्चा कमजोर दिखाई दे, दूध न पी रहा हो, दस्त हो जाए या बहुत सुस्त हो जाए तो घरेलू इलाज के भरोसे ज्यादा देर न करें। पशु चिकित्सक से सलाह लेना बेहतर है।
चराने के समय भी बरतें सावधानी
बारिश के दौरान बकरियों को बहुत गीली या जलभराव वाली जगहों पर चराने से बचाना चाहिए। भारी बारिश या खराब मौसम में उन्हें सुरक्षित शेड में रखना बेहतर है। चरागाह का चुनाव करते समय देखें कि वहां गंदा पानी जमा न हो और आसपास ऐसा कचरा या सामग्री न हो जिसे खाने से पशु बीमार पड़ सकता है। लंबे समय तक बंद रहने के बाद अचानक बहुत अधिक चराई कराने के बजाय पशुओं की स्थिति और मौसम को ध्यान में रखकर प्रबंधन करना चाहिए।
मक्खी, मच्छर और बाहरी परजीवियों से बचाव
गंदगी और जमा पानी की वजह से बरसात में मक्खियों तथा दूसरे कीटों की संख्या बढ़ सकती है। बाड़े में गोबर और गीला बिछावन लंबे समय तक पड़ा रहने से समस्या और बढ़ती है। इसलिए गोबर नियमित रूप से हटाएं, गीला बिछावन बदलें और पानी जमा न होने दें। पशुओं की त्वचा और बालों की भी नियमित जांच करें। यदि त्वचा पर खुजली, बाल झड़ना, घाव या बाहरी परजीवी दिखाई दें तो पशु चिकित्सक की सलाह लें। बिना विशेषज्ञ की सलाह के तेज रसायनों या दवाओं का इस्तेमाल करने से बचें।
गर्भित और दूध देने वाली बकरियों की अलग जरूरत
गर्भित और दूध देने वाली बकरियों के पोषण तथा स्वास्थ्य पर अतिरिक्त ध्यान देना जरूरी है। उन्हें पर्याप्त साफ पानी, संतुलित भोजन और आरामदायक सूखी जगह मिलनी चाहिए। बहुत फिसलन वाली जमीन गर्भित पशुओं के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए फर्श साफ और ऐसा रखें जहां पशु आसानी से खड़े होकर चल सकें। गर्भावस्था के अंतिम चरण में पशु की भूख, चलने-फिरने की स्थिति और व्यवहार में बदलाव पर विशेष नजर रखें। किसी असामान्य स्थिति में पशु चिकित्सक से सलाह लें।
दवा देने में मनमानी न करें
बकरी पालकों के बीच एक आम गलती यह है कि बीमारी का लक्षण दिखते ही पुरानी दवा या किसी दूसरे पशु को दी गई दवा इस्तेमाल कर ली जाती है। इससे बचना चाहिए। दस्त, खांसी या बुखार जैसे दिखने वाले लक्षणों के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। सही कारण जाने बिना दवा देने से बीमारी छिप सकती है या इलाज में देरी हो सकती है। एंटीबायोटिक, कृमिनाशक या दूसरी पशु दवाओं का उपयोग पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार करना बेहतर है।
रोज पांच मिनट का निरीक्षण बचा सकता है बड़ा नुकसान
बकरी पालन में रोज कुछ मिनट झुंड को ध्यान से देखना बेहद उपयोगी है। सुबह और शाम देखें कि सभी बकरियां सामान्य रूप से खा रही हैं या नहीं। कोई पशु झुंड से अलग तो नहीं बैठा है। किसी को दस्त, खांसी, लंगड़ापन या कमजोरी तो नहीं है। बकरियों के बाड़े, पानी, चारे और गोबर की स्थिति देखकर भी कई समस्याओं का शुरुआती संकेत मिल सकता है।पशुओं का रिकॉर्ड बनाना भी फायदेमंद है। इसमें जन्म की तारीख, टीकाकरण, बीमारी, उपचार, प्रजनन और बच्चों के जन्म जैसी जानकारी लिखी जा सकती है।
बरसात आने से पहले कर लें ये तैयारी
मानसून की तैयारी बारिश शुरू होने के बाद नहीं बल्कि पहले ही कर लेनी चाहिए। बाड़े की छत की मरम्मत करा लें। नालियां साफ कर दें। चारा रखने के लिए सूखी जगह तैयार करें। पीने के पानी की व्यवस्था जांच लें और पशुओं के टीकाकरण रिकॉर्ड की समीक्षा पशु चिकित्सक के साथ कर लें। बाड़े में जरूरत से ज्यादा पशु रखने से भी बचें। पर्याप्त जगह मिलने से सफाई और स्वास्थ्य निगरानी आसान होती है।
ICAR-CIRG बकरी उत्पादन, स्वास्थ्य और प्रबंधन पर शोध, प्रशिक्षण और तकनीक हस्तांतरण का काम करता है तथा किसानों के लिए बकरी पालन से संबंधित साहित्य भी उपलब्ध कराता है। संस्थान की वेबसाइट पर निवारक स्वास्थ्य कैलेंडर सहित विभिन्न प्रकाशनों की जानकारी उपलब्ध है। (Central Institute of Research and Growth)
बरसात में बकरी पालकों के लिए 10 जरूरी बातें
- बकरी का बाड़ा हमेशा साफ और जितना संभव हो सूखा रखें।
- छत से पानी टपकने और फर्श पर जलभराव की समस्या तुरंत ठीक करें।
- सड़ा, फफूंद लगा या बदबूदार चारा न खिलाएं।
- बकरियों को साफ और ताजा पीने का पानी दें।
- खुर और त्वचा की नियमित जांच करें।
- टीकाकरण का रिकॉर्ड रखें और पशु चिकित्सक से तय कार्यक्रम का पालन करें।
- परजीवी नियंत्रण के लिए मनमाने ढंग से दवा देने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लें।
- बीमार पशु को बाकी झुंड से अलग रखें।
- छोटे बच्चों, गर्भित और दूध देने वाली बकरियों पर विशेष नजर रखें।
- भूख में कमी, दस्त, खांसी, कमजोरी, सांस की परेशानी या लंगड़ापन दिखे तो समय पर पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
सावधानी ही बचाव का सबसे आसान तरीका
बकरी पालन में बरसात का मौसम केवल खतरे का समय नहीं है। इस दौरान हरे चारे की उपलब्धता बढ़ सकती है और सही प्रबंधन के साथ पशुपालक इसका लाभ उठा सकते हैं। परेशानी तब बढ़ती है जब बाड़े में नमी और गंदगी बनी रहती है, पानी दूषित होता है, चारा खराब हो जाता है या पशुओं के स्वास्थ्य संकेतों को नजरअंदाज किया जाता है।
इसलिए मानसून में बकरी पालन का सबसे आसान मंत्र है: सूखा और साफ बाड़ा, स्वच्छ पानी, सुरक्षित व संतुलित चारा, नियमित स्वास्थ्य निगरानी और समय पर पशु चिकित्सकीय सलाह। वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन करने और बीमारी की रोकथाम पर ध्यान देने से पशुओं की सेहत बेहतर रखने के साथ अनावश्यक आर्थिक नुकसान के जोखिम को भी कम किया जा सकता है।
