पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत के कृषि क्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है। सप्लाई चेन में आई रुकावटों के चलते देश में फर्टिलाइजर और यूरिया के सालाना घरेलू उत्पादन पर 10 से 15 प्रतिशत तक का असर पड़ने की आशंका जताई गई है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब देश में खेती का बड़ा हिस्सा उर्वरकों पर निर्भर है।
क्रिसिल रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे माल की आपूर्ति में बाधा और आयातित फर्टिलाइजर की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन परिस्थितियों में फर्टिलाइजर कंपनियों को अधिक कार्यशील पूंजी की जरूरत होगी, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।
सबसे बड़ी चिंता सरकार के बढ़ते सब्सिडी बोझ को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार, फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल में 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है। यह बढ़ोतरी सरकार के वित्तीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है, खासकर तब जब पहले से ही कई क्षेत्रों में खर्च बढ़ रहा है।
हालांकि, कुछ राहत की उम्मीद भी जताई गई है। बड़ी फर्टिलाइजर कंपनियों के पास पर्याप्त लिक्विडिटी है, जिससे वे इस अस्थिरता का सामना करने में सक्षम हो सकती हैं। इसके अलावा, सरकार समय-समय पर सब्सिडी और नीतिगत समर्थन देकर इस सेक्टर को स्थिर बनाए रखने की कोशिश करती रही है, जो आगे भी सहारा बन सकता है।
भारत में फर्टिलाइजर खपत का बड़ा हिस्सा यूरिया का है, जिसकी हिस्सेदारी करीब 45 प्रतिशत है। वहीं, कांप्लेक्स फर्टिलाइजर जैसे डाईअमोनियम फास्फेट (DAP), नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम का हिस्सा लगभग एक-तिहाई है। इसके अलावा सिंगल सुपर फास्फेट (SSP) और म्यूरिएट ऑफ पोटाश (MOP) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
फर्टिलाइजर सेक्टर की एक बड़ी कमजोरी इसकी आयात पर निर्भरता है। देश में करीब 20 प्रतिशत यूरिया और एक-तिहाई कांप्लेक्स फर्टिलाइजर, खासकर डीएपी, आयात किए जाते हैं। ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर भारत की आपूर्ति और कीमतों पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है, तो आने वाले महीनों में किसानों के लिए उर्वरकों की उपलब्धता और कीमत दोनों ही बड़ी चुनौती बन सकती हैं। ऐसे में सरकार और उद्योग दोनों के लिए यह जरूरी होगा कि वे समय रहते वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत और रणनीतियां तैयार करें, ताकि खेती पर इसका असर कम से कम हो सके।

