Punjab Agricultural University ने कद्दूवर्गीय फसलों में तेजी से फैल रहे डाउनी मिल्ड्यू रोग को लेकर किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है। विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने कहा है कि पिछले कुछ सप्ताहों में मौसम की परिस्थितियां इस रोग के विकास के लिए अत्यंत अनुकूल बनी हुई हैं, जिसके कारण खरबूजा, तरबूज, लौकी तथा अन्य कद्दूवर्गीय फसलों में इसका प्रकोप बढ़ने की आशंका है। किसानों को समय रहते सावधानी बरतने और वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई है, ताकि फसल को भारी नुकसान से बचाया जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार डाउनी मिल्ड्यू एक गंभीर फफूंदजनित रोग है, जो मुख्य रूप से फसल की पत्तियों को प्रभावित करता है। रोग के शुरुआती लक्षणों में पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले धब्बे दिखाई देते हैं। सुबह के समय जब वातावरण में नमी अधिक होती है, तब पत्तियों की निचली सतह पर भूरे या धूसर रंग की फफूंद वृद्धि देखी जा सकती है। समय के साथ ये धब्बे भूरे होकर सूखने लगते हैं और पूरी पत्ती झुलसी हुई दिखाई देती है। रोग के अधिक फैलने पर पौधों की वृद्धि रुक जाती है और उत्पादन तथा गुणवत्ता दोनों प्रभावित होते हैं।
पीएयू के वैज्ञानिकों ने बताया कि राजपुरा, डेराबस्सी और संगरूर के आसपास के क्षेत्रों में इस रोग का हल्के से मध्यम स्तर तक प्रकोप देखा गया है। मौसम में लगातार बढ़ रही नमी, मध्यम तापमान और रुक-रुक कर हो रही बारिश इस रोग के प्रसार को बढ़ावा दे रही है। विशेषज्ञों के अनुसार 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा अधिक आर्द्रता डाउनी मिल्ड्यू रोग के विकास के लिए सबसे अनुकूल परिस्थितियां हैं। ऐसे मौसम में रोग तेजी से एक खेत से दूसरे खेत में फैल सकता है।
विश्वविद्यालय ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों में पानी भराव की स्थिति न बनने दें और बाढ़ सिंचाई से बचें। अधिक नमी रोग को फैलाने में सहायक होती है, इसलिए सिंचाई का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि खेतों में पुरानी और संक्रमित बेलों को नष्ट कर देना चाहिए, क्योंकि ये रोग के जीवाणुओं को जीवित रखती हैं और अगले मौसम में संक्रमण का स्रोत बन सकती हैं।
विशेषज्ञों ने किसानों को ओवरहेड स्प्रिंकलर सिंचाई से बचने की भी सलाह दी है। उनका कहना है कि यदि पत्तियां लंबे समय तक गीली रहती हैं, तो रोग तेजी से फैलता है। इसलिए सिंचाई दिन के समय करनी चाहिए ताकि रात होने से पहले पत्तियां सूख जाएं। इसके साथ ही पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने की भी सलाह दी गई है, जिससे खेत में वायु संचार बेहतर बना रहे और नमी कम हो सके। यह उपाय रोग नियंत्रण में काफी प्रभावी साबित हो सकता है।
पीएयू के वैज्ञानिकों ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा किए गए परीक्षणों में कुछ फफूंदनाशक दवाएं डाउनी मिल्ड्यू रोग के नियंत्रण में प्रभावी पाई गई हैं। किसानों को क्लोरोथैलोनिल (कवच) 400 ग्राम प्रति एकड़ तथा साइमोक्सानिल 8 प्रतिशत + मैनकोजेब 64 प्रतिशत डब्ल्यूपी (कुरजेट एम-8) 600 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इन दवाओं का समय पर उपयोग रोग के प्रसार को रोकने और फसल को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते मौसम और जलवायु परिस्थितियों के कारण फफूंदजनित रोगों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में किसानों को नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण करना चाहिए और शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही तुरंत नियंत्रण उपाय अपनाने चाहिए। यदि रोग को शुरुआती अवस्था में नियंत्रित कर लिया जाए, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।
पीएयू ने किसानों से अपील की है कि वे वैज्ञानिक सिफारिशों का पालन करें और किसी भी समस्या की स्थिति में कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करें। विश्वविद्यालय का मानना है कि जागरूकता, समय पर पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से डाउनी मिल्ड्यू जैसे रोगों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है तथा किसानों की उपज और आय को सुरक्षित रखा जा सकता है।

