भारत के ताजे फलों के निर्यात क्षेत्र को बड़ी सफलता मिली है। पहली बार भारतीय आम सफलतापूर्वक समुद्री मार्ग से सिंगापुर पहुंचे हैं। इस उपलब्धि को भारतीय आमों के वैश्विक निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। समुद्री परिवहन के जरिए आमों को विदेश भेजने से न केवल लागत में भारी कमी आएगी, बल्कि किसानों और निर्यातकों के लिए नए अवसर भी खुलेंगे।
भारतीय आम अपनी मिठास, स्वाद और गुणवत्ता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। विशेष रूप से बांगनपल्ली और केसर जैसी किस्मों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी मांग है। अब नई तकनीक के जरिए इन आमों को कम लागत में विदेशों तक पहुंचाना संभव हो गया है।
ICAR-CISH और APEDA ने विकसित किया विशेष प्रोटोकॉल
इस सफलता के पीछे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अधीन केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (CISH), लखनऊ और एपीडा (APEDA) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
दोनों संस्थानों ने मिलकर आमों के समुद्री निर्यात के लिए एक वैज्ञानिक प्रोटोकॉल विकसित किया है। इस तकनीक का उद्देश्य लंबी दूरी की समुद्री यात्रा के दौरान फलों की गुणवत्ता बनाए रखना और खराब होने की संभावना को कम करना है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रोटोकॉल उत्पादन से लेकर पैकिंग और परिवहन तक पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित करता है, जिससे आम लंबे समय तक ताजे बने रहते हैं।
आंध्र प्रदेश से भेजे गए 4.3 टन बांगनपल्ली आम
इस परियोजना के तहत आंध्र प्रदेश से 4.3 टन बांगनपल्ली आमों की खेप रेफ्रिजरेटेड कंटेनर (रीफर कंटेनर) के माध्यम से सिंगापुर भेजी गई।
यह खेप लगभग 16 दिनों की समुद्री यात्रा पूरी करके सिंगापुर पहुंची। सबसे खास बात यह रही कि आम पूरी यात्रा के दौरान उत्कृष्ट गुणवत्ता में बने रहे और उनमें किसी प्रकार की बीमारी या खराबी नहीं पाई गई।
फल विशेषज्ञों ने बताया कि सिंगापुर पहुंचने पर आमों की गुणवत्ता हवाई मार्ग से भेजे जाने वाले आमों के बराबर पाई गई।
हवाई मार्ग की तुलना में लागत में भारी कमी
आम निर्यात में सबसे बड़ी चुनौती परिवहन लागत होती है। अब तक अधिकांश निर्यात हवाई मार्ग से किया जाता था, जिसकी लागत काफी अधिक होती है।
जानकारी के अनुसार हवाई मार्ग से आम भेजने पर परिवहन खर्च लगभग 150 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम तक आता है। वहीं समुद्री मार्ग से यह लागत घटकर केवल 13 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम रह जाती है।
इससे निर्यातकों की लागत में भारी कमी आएगी और विदेशी बाजारों में भारतीय आम अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध हो सकेंगे। इसका सीधा लाभ किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को मिलेगा।
30 दिन तक सुरक्षित रह सकते हैं आम
ICAR-CISH द्वारा विकसित तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता आमों की शेल्फ लाइफ बढ़ाना है।
संस्थान ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे आम समुद्री परिवहन की परिस्थितियों में भी लगभग 30 दिनों तक सुरक्षित रह सकते हैं। निर्यात की गई खेप में आमों ने 16 दिनों की यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की और उनकी गुणवत्ता पूरी तरह बरकरार रही।
फलों में कुल घुलनशील ठोस पदार्थ (TSS) का स्तर 20.1 डिग्री ब्रिक्स दर्ज किया गया, जो उत्कृष्ट गुणवत्ता का संकेत माना जाता है।
वैज्ञानिक निगरानी और उन्नत तकनीक का उपयोग
निर्यात से पहले आम के बागानों की वैज्ञानिक निगरानी की गई। ICAR-CISH के विशेषज्ञों ने फल बनने से लेकर तुड़ाई तक पूरे उत्पादन चक्र पर नजर रखी।
उत्पादन में अवशेष-मुक्त खेती तकनीकों और संस्थान द्वारा विकसित जैव नियंत्रण तकनीक “फ्यूसीकॉन्ट” का उपयोग किया गया। इसके अलावा फलों को हॉट वाटर ट्रीटमेंट (HWT) और CISH-Met Wash तकनीक से भी उपचारित किया गया।
इन प्रक्रियाओं से फलों की गुणवत्ता बनी रहती है, रोगों का खतरा कम होता है और लंबे समय तक ताजगी बरकरार रहती है।
नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों के खुलेंगे रास्ते
इस सफल समुद्री निर्यात के बाद भारतीय आमों के लिए कई नए वैश्विक बाजार खुलने की संभावना बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब सिंगापुर, मलेशिया, हांगकांग जैसे बाजारों में भारतीय आमों का निर्यात तेजी से बढ़ सकता है। वर्तमान में इन बाजारों में आम आयात का आकार लगभग 4 से 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर का है।
इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे बड़े बाजारों में भी निर्यात बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं, जहां आम का बाजार 20 से 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच आंका जाता है।
किसानों की आय बढ़ाने में मिलेगी मदद
समुद्री मार्ग से कम लागत पर निर्यात की सुविधा उपलब्ध होने से किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी। निर्यात बढ़ने से भारतीय आमों की अंतरराष्ट्रीय मांग मजबूत होगी और बागवानी क्षेत्र को नई गति मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक केवल आम तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य में अन्य फलों और बागवानी उत्पादों के निर्यात में भी उपयोगी साबित हो सकती है।
भारतीय आमों का सफल समुद्री निर्यात देश के कृषि और बागवानी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ICAR-CISH और APEDA द्वारा विकसित वैज्ञानिक तकनीक ने यह साबित कर दिया है कि कम लागत में भी उच्च गुणवत्ता वाले फल अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाए जा सकते हैं।
यह पहल किसानों की आय बढ़ाने, निर्यात प्रतिस्पर्धा मजबूत करने और भारत को वैश्विक फल निर्यात बाजार में नई पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।

