भारत में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता के बीच जैविक कृषि इनपुट उद्योग ने इनके इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से कम करने की मांग उठाई है। BioAgri Input Producers Association (BIPA) ने कहा है कि वैज्ञानिक तरीके से जैव उर्वरक, जैव उत्तेजक और जैव कीटनाशकों को कृषि व्यवस्था में शामिल किया जाए तो रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की खपत में 25 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। संगठन का अनुमान है कि इससे देश के सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ कम हो सकता है और हर साल करीब 40,000 करोड़ रुपये तक की संभावित बचत हो सकती है।
BIPA का कहना है कि इस पहल का फायदा केवल सरकारी खर्च कम करने तक सीमित नहीं रहेगा। रासायनिक इनपुट की खपत घटने से किसानों की उत्पादन लागत कम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने, आयात पर निर्भरता घटाने और भारतीय कृषि उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मदद मिल सकती है। संगठन ने इसके लिए जैविक इनपुट को रासायनिक उत्पादों का केवल विकल्प मानने के बजाय दोनों के वैज्ञानिक और संतुलित इस्तेमाल पर जोर दिया है।
जैविक और रासायनिक इनपुट का संतुलित इस्तेमाल जरूरी
BIPA के अध्यक्ष डॉ. ए. जॉन पीटर ने कहा कि भारत को मुख्य रूप से रासायनिक आधारित कृषि मॉडल से आगे बढ़कर एक एकीकृत कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा। इस व्यवस्था में जैविक और रासायनिक इनपुट का इस्तेमाल वैज्ञानिक जरूरत के अनुसार किया जाए।
उनके मुताबिक जैव उर्वरक, जैव उत्तेजक और जैव कीटनाशक कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रासायनिक खाद और कीटनाशकों को अचानक पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। इसके बजाय फसल, मिट्टी, मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर इनपुट का संतुलित इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
BIPA का मानना है कि रासायनिक इनपुट के उपयोग में चरणबद्ध कमी से किसानों और कृषि क्षेत्र को अचानक किसी बड़े बदलाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। वैज्ञानिक परीक्षण और उचित प्रशिक्षण के माध्यम से किसानों को जैविक उत्पादों के सही इस्तेमाल की जानकारी दी जा सकती है।
हर साल करीब 35 मिलियन टन यूरिया की खपत
भारत दुनिया में रासायनिक उर्वरकों के बड़े उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में हर साल लगभग 35 मिलियन टन यूरिया की खपत होती है। इसके अलावा DAP, पोटाश और दूसरे उर्वरकों की जरूरत भी बड़े पैमाने पर रहती है।
भारत कुछ महत्वपूर्ण उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है। DAP, पोटाश और अन्य उर्वरकों के कच्चे माल की वैश्विक कीमतों में बदलाव का सीधा असर घरेलू कृषि व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में BIPA का कहना है कि यदि जैविक इनपुट के वैज्ञानिक इस्तेमाल से रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कुछ हद तक कम की जा सके तो इससे आयात निर्भरता और विदेशी मुद्रा खर्च पर भी दबाव कम हो सकता है।
उर्वरक सब्सिडी का बोझ घटाने पर जोर
रासायनिक उर्वरकों पर किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार बड़ी मात्रा में सब्सिडी देती है। BIPA के अनुसार देश का वार्षिक उर्वरक सब्सिडी बिल 1.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
संगठन का तर्क है कि रासायनिक उर्वरकों की खपत में चरणबद्ध कमी आने पर लंबे समय में सब्सिडी पर होने वाले सरकारी खर्च को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, 25 प्रतिशत कमी का लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल जैविक उत्पादों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, खेत स्तर पर परीक्षण, किसानों का प्रशिक्षण और प्रभावी नियमन भी जरूरी होगा।
BIPA का अनुमान है कि रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के इस्तेमाल को कम करने की रणनीति से सरकार को सालाना करीब 40,000 करोड़ रुपये तक की संभावित बचत हो सकती है। यह आंकड़ा संगठन के अनुमान पर आधारित है और वास्तविक बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि जैविक इनपुट को किस स्तर पर अपनाया जाता है और रासायनिक उत्पादों की खपत में कितनी कमी आती है।
मिट्टी की सेहत सुधारने पर भी जोर
लगातार और असंतुलित रासायनिक इनपुट के इस्तेमाल को लेकर मिट्टी की गुणवत्ता पर भी चर्चा बढ़ रही है। BIPA ने सरकार, उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और अकादमिक क्षेत्र से मिलकर ऐसा राष्ट्रीय कार्यक्रम तैयार करने की मांग की है, जिससे मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन और जैविक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके।
संगठन का मानना है कि स्वस्थ मिट्टी टिकाऊ कृषि की आधारशिला है। मिट्टी में जैविक गतिविधि और कार्बन की स्थिति बेहतर होने से लंबे समय में फसल उत्पादन क्षमता को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इसके लिए किसानों को मिट्टी परीक्षण, संतुलित पोषण प्रबंधन, जैविक पदार्थों के इस्तेमाल और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी देना जरूरी होगा।
कीटनाशक अवशेष से निर्यात पर चुनौती
BIPA ने कृषि उत्पादों में कीटनाशक अवशेषों के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बताया है। संगठन के महासचिव डॉ. वेंकटेश देवनुर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियम लगातार सख्त हो रहे हैं। विभिन्न देशों में Maximum Residue Limit यानी MRL के मानकों का पालन निर्यात के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
यदि भारतीय कृषि उत्पादों में निर्धारित सीमा से अधिक कीटनाशक अवशेष पाए जाते हैं तो निर्यात को नुकसान पहुंच सकता है। कुछ मामलों में कृषि उत्पादों की खेप को विदेशी बाजारों में अस्वीकार भी किया जा सकता है। ऐसे में भारत के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता पर ध्यान देना भी जरूरी है।
BIPA के अनुसार Integrated Pest Management यानी एकीकृत कीट प्रबंधन और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित जैविक फसल सुरक्षा उत्पाद इस दिशा में मददगार हो सकते हैं। इससे कीट नियंत्रण के लिए रासायनिक कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है और निर्यात योग्य कृषि उत्पाद तैयार करने में मदद मिल सकती है।
अक्टूबर में होगा BIOAGRI 2026 सम्मेलन
BIPA की यह पहल 7 और 8 अक्टूबर को हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी में आयोजित होने वाले BIOAGRI 2026 सम्मेलन में प्रमुख मुद्दों में शामिल होगी। इस वर्ष सम्मेलन की थीम ‘Biological Intelligence & Smart Agriculture’ रखी गई है।
सम्मेलन में कृषि इनपुट उद्योग, शोध संस्थानों, स्टार्टअप, विश्वविद्यालयों और सरकारी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के शामिल होने की उम्मीद है। आयोजन में 250 से अधिक प्रतिनिधि, 35 से ज्यादा वक्ता और करीब 50 प्रदर्शकों के हिस्सा लेने की संभावना है।
सम्मेलन का उद्देश्य जैविक कृषि इनपुट से जुड़े शोध, नवाचार और व्यावहारिक इस्तेमाल पर चर्चा को आगे बढ़ाना है। साथ ही किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों को पहुंचाने और जैविक उत्पादों के जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार करने पर भी विचार किया जाएगा।
राष्ट्रीय नीति की तैयारी की दिशा में पहल
BIOAGRI 2026 के बाद BIPA ‘Integrating Biologicals into the Framework of Chemical Fertilisers and Pesticides’ विषय पर एक White Paper जारी करने की योजना बना रहा है। इसमें जैविक इनपुट को मौजूदा रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक व्यवस्था के साथ जोड़ने के लिए वैज्ञानिक प्रोटोकॉल, अनुसंधान, नवाचार, नियमन और जिम्मेदार इस्तेमाल जैसे मुद्दों को शामिल किया जाएगा।
संगठन इसके आधार पर Biological Input Integration के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार करने की दिशा में सरकार और संबंधित पक्षों के साथ चर्चा शुरू करना चाहता है।
कुल मिलाकर BIPA की मांग भारत की कृषि व्यवस्था में अचानक रासायनिक इनपुट को हटाने की नहीं, बल्कि जैविक और रासायनिक उत्पादों के वैज्ञानिक एवं संतुलित इस्तेमाल की है। यदि इस दिशा में शोध, परीक्षण, नियमन और किसान प्रशिक्षण को साथ लेकर आगे बढ़ा जाता है तो इससे कृषि लागत, मिट्टी की सेहत, आयात निर्भरता और कृषि निर्यात जैसे कई क्षेत्रों पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

