खरीफ सीजन 2026 की बुवाई को लेकर केंद्र सरकार ने ताजा आंकड़े जारी किए हैं। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार 26 जून 2026 तक देश में 182.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई पूरी हो चुकी है। हालांकि यह पिछले वर्ष की समान अवधि के 236.46 लाख हेक्टेयर की तुलना में 53.74 लाख हेक्टेयर कम है। शुरुआती चरण में मानसून की धीमी प्रगति और कई राज्यों में देर से हुई बारिश को इस गिरावट का प्रमुख कारण माना जा रहा है।
हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ बुवाई का प्रमुख समय अभी जारी है। यदि जुलाई में अच्छी और नियमित वर्षा होती है तो बुवाई के रकबे में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है और मौजूदा अंतर काफी हद तक कम हो सकता है।
धान की बुवाई में 8.65 लाख हेक्टेयर की कमी
देश की सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल धान की बुवाई इस वर्ष अपेक्षाकृत धीमी रही है। 26 जून 2026 तक 25.75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 34.41 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान लगाया गया था। यानी इस बार 8.65 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में धान की बुवाई दर्ज की गई।
विशेषज्ञों के अनुसार धान की खेती मानसून पर सबसे अधिक निर्भर होती है। कई राज्यों में देर से मानसून पहुंचने और पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण किसानों ने अभी बुवाई शुरू नहीं की है।
दलहन फसलों का रकबा भी घटा
दलहन फसलों की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में पीछे चल रही है। इस वर्ष अब तक 14.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दलहन की बुवाई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 21.46 लाख हेक्टेयर था। यानी कुल 6.53 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई।
दलहन की प्रमुख फसलों में अरहर सबसे अधिक प्रभावित रही। अरहर का रकबा 8.45 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.56 लाख हेक्टेयर रह गया। वहीं उड़द की बुवाई में 1.44 लाख हेक्टेयर तथा मूंग की बुवाई में 0.26 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई।
हालांकि कुल्थी और मोठ जैसी कुछ फसलों में मामूली बढ़ोतरी देखने को मिली है, लेकिन इसका कुल बुवाई क्षेत्र पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा।
श्री अन्न और मोटे अनाज की बुवाई भी रही धीमी
सरकार द्वारा श्री अन्न (मिलेट्स) को बढ़ावा दिए जाने के बावजूद इस वर्ष शुरुआती चरण में इन फसलों की बुवाई भी पिछले वर्ष से कम रही।
26 जून तक 31.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मोटे अनाज एवं श्री अन्न की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 36.07 लाख हेक्टेयर था। यानी 4.23 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई।
हालांकि ज्वार की खेती में 0.68 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज हुई है, लेकिन बाजरा, मक्का, रागी और छोटे मिलेट्स की बुवाई में कमी देखने को मिली।
सबसे अधिक गिरावट मक्का की बुवाई में दर्ज की गई, जहां पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 2.90 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुवाई हुई है।
तिलहन फसलों में सबसे बड़ी गिरावट
खरीफ 2026 की शुरुआत में सबसे अधिक असर तिलहन फसलों पर दिखाई दिया है।
26 जून तक केवल 16.99 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में तिलहन की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 36.41 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हो चुकी थी। यानी 19.42 लाख हेक्टेयर की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
सोयाबीन सबसे अधिक प्रभावित
देश की प्रमुख तिलहन फसल सोयाबीन की बुवाई में सबसे अधिक कमी देखने को मिली। इस वर्ष केवल 6.92 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन बोई गई, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 19.97 लाख हेक्टेयर था। यानी 13.05 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में सोयाबीन की बुवाई हुई।
मूंगफली का रकबा भी घटा
मूंगफली की बुवाई भी 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर 8.87 लाख हेक्टेयर रह गई। यानी 6.42 लाख हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि सूरजमुखी की खेती में 0.29 लाख हेक्टेयर की वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि अरंडी और नाइजर जैसी फसलों में मामूली बढ़ोतरी देखी गई।
कपास की बुवाई में भी बड़ी कमी
देश की प्रमुख नकदी फसल कपास की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में काफी पीछे चल रही है।
26 जून 2026 तक 29.66 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 45.36 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास बोई जा चुकी थी।
इस प्रकार कपास के रकबे में 15.70 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में मानसून की अनिश्चितता के कारण किसानों ने अभी बुवाई टाल रखी है।
गन्ना और जूट की खेती में बढ़ोतरी
जहां अधिकांश खरीफ फसलों का रकबा कम हुआ है, वहीं गन्ना और जूट एवं मेस्टा की खेती में सकारात्मक रुझान देखने को मिला।
गन्ने की बुवाई 57.31 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है, जो पिछले वर्ष के 56.64 लाख हेक्टेयर से 0.67 लाख हेक्टेयर अधिक है।
इसी प्रकार जूट एवं मेस्टा की बुवाई 6.25 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में 0.12 लाख हेक्टेयर अधिक है।
क्यों घटी खरीफ बुवाई?
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष खरीफ फसलों की शुरुआती बुवाई कम रहने के पीछे कई प्रमुख कारण हैं—
- कई राज्यों में मानसून की देरी से शुरुआत।
- जून के पहले पखवाड़े में कम वर्षा।
- मिट्टी में पर्याप्त नमी की कमी।
- किसानों द्वारा बेहतर वर्षा का इंतजार।
- कुछ क्षेत्रों में तापमान अधिक रहने से बुवाई प्रभावित होना।
हालांकि जुलाई खरीफ बुवाई का सबसे महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। यदि अगले कुछ सप्ताह में अच्छी वर्षा होती है तो बुवाई का रकबा तेजी से बढ़ सकता है।
किसानों के लिए क्या है सलाह?
कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विभाग द्वारा जारी मौसम आधारित सलाह का पालन करें। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा हो चुकी है वहां समय पर बुवाई पूरी करें, जबकि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उपयुक्त वैकल्पिक फसलें और कम अवधि वाली किस्मों का चयन करें।
साथ ही खेतों में नमी संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग और बीज उपचार जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
आगे कैसी रहेगी स्थिति?
भारतीय कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। मौसम विभाग द्वारा जुलाई में सामान्य से अच्छी वर्षा की संभावना जताई गई है। यदि अनुमान सही साबित होता है तो धान, सोयाबीन, कपास, दलहन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई में तेजी आने की उम्मीद है।
कृषि मंत्रालय भी लगातार राज्यों के साथ समन्वय बनाकर बीज, उर्वरक और अन्य कृषि आदानों की उपलब्धता सुनिश्चित कर रहा है ताकि किसानों को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
खरीफ फसल बुवाई 2026 के शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि 26 जून तक देश में कुल 182.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 53.74 लाख हेक्टेयर कम है। सबसे अधिक गिरावट सोयाबीन, कपास, तिलहन और धान की बुवाई में दर्ज की गई है, जबकि गन्ना और जूट की खेती में हल्की बढ़ोतरी देखने को मिली है।
हालांकि कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन अभी शुरुआती दौर में है। यदि जुलाई में मानसून सामान्य रहता है और पर्याप्त वर्षा होती है, तो बुवाई के आंकड़ों में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह खरीफ सीजन 2026 की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

