विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में पशुधन क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए डॉ. एम.एल. जाट, सचिव (डेयर) एवं महानिदेशक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कहा कि यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण आजीविका और पोषण सुरक्षा का मजबूत आधार बन चुका है। वह गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पशुपालन मेले में किसानों, पशु चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और उद्योग से जुड़े हितधारकों को संबोधित कर रहे थे।
अपने संबोधन में डॉ. जाट ने बताया कि भारत का पशुधन क्षेत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में लगभग ₹17.5 लाख करोड़ का योगदान देता है, जो इसकी व्यापक क्षमता और महत्व को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि डेयरी क्षेत्र इस पूरे तंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है, जो न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि देश में पोषण और स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में भी पशुधन क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़ते हुए एकीकृत और विविधीकृत कृषि प्रणाली को अपनाना होगा, जिसमें फसल उत्पादन और पशुधन गतिविधियों का बेहतर समन्वय हो। इससे न केवल किसानों की आय में स्थिरता आएगी, बल्कि जोखिम भी कम होगा।
नवाचार और गुणवत्ता पर बल देते हुए डॉ. जाट ने कहा कि अब समय आ गया है कि उत्पादन की मात्रा के बजाय उसकी गुणवत्ता पर अधिक ध्यान दिया जाए। उन्होंने पशुधन उत्पादकता और आनुवंशिक सुधार के लिए भ्रूण स्थानांतरण (Embryo Transfer) जैसी उन्नत प्रजनन तकनीकों को अपनाने की वकालत की। उनके अनुसार, इन आधुनिक तकनीकों के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली नस्लों का तेजी से विकास संभव है, जिससे दूध और अन्य पशु उत्पादों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृद्धि होगी।
इसके साथ ही उन्होंने पशु चिकित्सा सेवाओं के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पशु अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक बनाकर उन्हें मानव स्वास्थ्य सेवाओं के समान स्तर तक विकसित किया जाना चाहिए, ताकि समय पर और प्रभावी उपचार सुनिश्चित किया जा सके। इससे पशुओं की उत्पादकता बढ़ेगी और किसानों को होने वाले नुकसान में कमी आएगी।
मेले में उपस्थित प्रगतिशील किसानों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए डॉ. जाट ने बताया कि कुछ किसानों ने प्रतिदिन 91 किलोग्राम तक दूध उत्पादन का रिकॉर्ड स्थापित किया है। उन्होंने इसे नवाचार, वैज्ञानिक पद्धतियों और बेहतर प्रबंधन का परिणाम बताते हुए कहा कि यदि इन तकनीकों को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो पशुधन क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि संभव है।
उन्होंने “एक देश, एक लक्ष्य” की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि किसानों, वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक है। विशेष रूप से उन्होंने पंजाब के किसानों की सराहना करते हुए कहा कि उनकी प्रगतिशील सोच और नई तकनीकों को अपनाने की क्षमता देश के अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत है।
जलवायु परिवर्तन को एक गंभीर चुनौती बताते हुए डॉ. जाट ने कहा कि पशुधन क्षेत्र को क्लाइमेट-रेजिलिएंट तकनीकों के माध्यम से अधिक सशक्त बनाने की जरूरत है। इसके साथ ही उन्होंने उद्यमिता आधारित पशुधन मॉडल को बढ़ावा देने की बात कही, जिससे युवा इस क्षेत्र में नए अवसर तलाश सकें और इसे एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में विकसित कर सकें।
अंत में उन्होंने आश्वासन दिया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद देशभर में कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों को निरंतर समर्थन देता रहेगा। इससे पशुधन क्षेत्र में नवाचार, अनुसंधान और तकनीकी विकास को गति मिलेगी और दीर्घकालिक सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा।

