Maruti Suzuki: देश की प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड ने हरियाणा में स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। कंपनी खारखौदा स्थित अपनी उत्पादन इकाई में 10 टन प्रतिदिन क्षमता का बायोगैस प्लांट स्थापित करने जा रही है। यह प्लांट वित्त वर्ष 2026-27 में शुरू होने की उम्मीद है।
यह कदम न केवल ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि कृषि अवशेष, जैविक कचरे और स्वच्छ ऊर्जा के बेहतर उपयोग की दिशा में भी बड़ा संदेश देता है। हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्य में इस तरह की पहल किसानों, उद्योग और पर्यावरण के बीच एक मजबूत कड़ी बना सकती है।
खारखौदा प्लांट में बनेगी 10 टन प्रतिदिन बायोगैस
मारुति सुजुकी का नया बायोगैस प्लांट हरियाणा के खारखौदा में स्थापित किया जाएगा। इसकी क्षमता 10 टन प्रतिदिन यानी 10 TPD होगी। कंपनी के अनुसार, इस प्लांट से खारखौदा सुविधा की कुल गैस जरूरत का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा पूरा किया जा सकेगा।
उद्योगों में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करना आज समय की बड़ी जरूरत बन गया है। बायोगैस जैसे विकल्प उद्योगों को साफ ऊर्जा देने के साथ-साथ कार्बन फुटप्रिंट कम करने में भी मदद करते हैं।
कार्बन उत्सर्जन में आएगी बड़ी कमी
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसका पर्यावरणीय लाभ है। अनुमान है कि खारखौदा बायोगैस प्लांट से लगभग 9,490 टन कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलेगी। ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग जैसे बड़े उद्योगों में ऊर्जा खपत अधिक होती है, इसलिए इस तरह के ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स का असर काफी व्यापक हो सकता है।
कार्बन उत्सर्जन में कमी से न केवल कंपनी की उत्पादन प्रक्रिया अधिक टिकाऊ बनेगी, बल्कि भारत के नेट जीरो और हरित ऊर्जा लक्ष्यों को भी मजबूती मिलेगी। आज दुनियाभर में ऑटो कंपनियों पर उत्पादन प्रक्रिया को पर्यावरण के अनुकूल बनाने का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में मारुति सुजुकी की यह पहल उद्योग जगत के लिए एक सकारात्मक उदाहरण बन सकती है।
मानेसर प्लांट की क्षमता भी बढ़ाई गई
खारखौदा में नया प्लांट लगाने के साथ-साथ मारुति सुजुकी ने हरियाणा के मानेसर स्थित अपने मौजूदा बायोगैस प्लांट की क्षमता भी बढ़ाई है। पहले इस प्लांट की क्षमता 0.2 टन प्रतिदिन थी, जिसे बढ़ाकर 0.7 टन प्रतिदिन किया गया है।
मानेसर प्लांट में फूड वेस्ट, नेपियर घास और धान की पराली जैसे फीडस्टॉक का उपयोग किया जाता है। जरूरत पड़ने पर इसमें गोबर जैसे जैविक संसाधनों का भी उपयोग किया जा सकता है। यह मॉडल खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कृषि अवशेष और जैविक कचरे को ऊर्जा में बदलने की क्षमता रखता है।
कैसे काम करता है बायोगैस प्लांट?
बायोगैस प्लांट जैविक कचरे को ऊर्जा में बदलने की तकनीक पर आधारित होता है। इसमें कृषि अवशेष, फूड वेस्ट, गोबर, नेपियर घास या अन्य जैविक पदार्थों को ऑक्सीजन रहित वातावरण में सड़ाया जाता है। इस प्रक्रिया को एनारोबिक डाइजेशन कहा जाता है।
इस प्रक्रिया से मीथेन युक्त गैस बनती है, जिसे बायोगैस कहा जाता है। इस गैस का उपयोग खाना पकाने, हीटिंग, औद्योगिक प्रक्रियाओं और जरूरत के अनुसार अन्य ऊर्जा उपयोगों में किया जा सकता है। इसके अलावा प्रक्रिया के बाद बचा हुआ अवशेष फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर यानी जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
किसानों के लिए क्यों अहम है यह पहल?
हरियाणा में धान, गेहूं और अन्य फसलों की खेती बड़े स्तर पर होती है। हर साल फसल कटाई के बाद पराली और कृषि अवशेषों का प्रबंधन किसानों और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। कई क्षेत्रों में पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी की सेहत पर भी असर पड़ता है।
अगर उद्योग कृषि अवशेषों को ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग करना शुरू करते हैं, तो किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय का रास्ता बन सकता है। बायोगैस प्लांट्स को नियमित रूप से फीडस्टॉक की जरूरत होती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर पराली, नेपियर घास, गोबर और अन्य जैविक सामग्री की मांग बढ़ सकती है।
यह मॉडल किसानों को फसल अवशेष बेचने, गोबर प्रबंधन करने और जैविक खाद की उपलब्धता बढ़ाने में मदद कर सकता है। इससे गांवों में वेस्ट मैनेजमेंट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ मिल सकता है।
पराली प्रबंधन में मिल सकता है समाधान
हरियाणा और पंजाब में पराली प्रबंधन लंबे समय से एक गंभीर मुद्दा रहा है। सरकारें किसानों को मशीनरी, जागरूकता और प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से पराली न जलाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। लेकिन जब तक पराली का आर्थिक उपयोग नहीं बढ़ेगा, तब तक इसका स्थायी समाधान मुश्किल रहेगा।
बायोगैस प्लांट इस दिशा में व्यावहारिक समाधान बन सकते हैं। यदि बड़े उद्योग अपने आसपास के क्षेत्रों से कृषि अवशेष खरीदें, तो किसानों को पराली जलाने के बजाय उसे बेचने का विकल्प मिलेगा। इससे प्रदूषण घटेगा, किसानों को आय मिलेगी और उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त होगी।
जैविक खाद का भी होगा उत्पादन
बायोगैस उत्पादन के बाद बचने वाला पदार्थ बेकार नहीं होता। इसे जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है। फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर मिट्टी की संरचना सुधारने, जैविक कार्बन बढ़ाने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।
मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में बनने वाली इस तरह की खाद का उपयोग आंतरिक हॉर्टिकल्चर में किया जा सकता है या कृषि इकोसिस्टम को वापस सप्लाई किया जा सकता है। यदि यह मॉडल बड़े स्तर पर लागू होता है, तो किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाली जैविक खाद उपलब्ध हो सकती है।
उद्योगों में स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती जरूरत
भारत में उद्योग तेजी से हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं। सोलर पावर, बायोगैस, ग्रीन हाइड्रोजन और वेस्ट टू एनर्जी जैसे विकल्प अब केवल पर्यावरणीय पहल नहीं रह गए हैं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक जरूरत बन चुके हैं।
बढ़ती ऊर्जा लागत, जलवायु परिवर्तन और ESG मानकों के कारण कंपनियां अपनी उत्पादन प्रक्रिया को टिकाऊ बनाने पर ध्यान दे रही हैं। मारुति सुजुकी की यह पहल बताती है कि ऑटोमोबाइल सेक्टर भी स्वच्छ ऊर्जा समाधान को उत्पादन व्यवस्था का हिस्सा बना रहा है।
हरियाणा के लिए क्यों खास है यह प्रोजेक्ट?
हरियाणा देश के प्रमुख औद्योगिक और कृषि राज्यों में शामिल है। यहां ऑटोमोबाइल, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और डेयरी क्षेत्र का मजबूत आधार है। ऐसे में बायोगैस जैसे प्रोजेक्ट राज्य की अर्थव्यवस्था में कई स्तरों पर योगदान दे सकते हैं।
एक तरफ उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा मिल सकती है, दूसरी तरफ किसानों और डेयरी संचालकों को जैविक अपशिष्ट का बेहतर उपयोग करने का मौका मिल सकता है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर रोजगार, सप्लाई चेन और ग्रीन टेक्नोलॉजी से जुड़े नए अवसर भी बन सकते हैं।
मारुति सुजुकी की ग्रीन रणनीति
मारुति सुजुकी पिछले कुछ वर्षों से अपनी उत्पादन इकाइयों में नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ तकनीकों पर ध्यान दे रही है। कंपनी सोलर ऊर्जा, बायोगैस और ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में निवेश कर रही है।
मानेसर में पायलट बायोगैस प्लांट शुरू करने के बाद अब खारखौदा में 10 TPD क्षमता वाला बड़ा प्लांट स्थापित करना कंपनी की ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग रणनीति का विस्तार माना जा रहा है। इससे साफ है कि कंपनी केवल वाहन उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया को भी अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाना चाहती है।
भारत के नेट जीरो लक्ष्य को मिलेगा सहयोग
भारत ने भविष्य में कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कई लक्ष्य तय किए हैं। ऐसे में निजी कंपनियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार की योजनाएं तभी अधिक प्रभावी हो सकती हैं, जब उद्योग भी अपने स्तर पर ग्रीन एनर्जी को अपनाएं।
मारुति सुजुकी का यह प्रोजेक्ट दिखाता है कि बड़े उद्योग कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए व्यावहारिक कदम उठा रहे हैं। बायोगैस प्लांट जैसे मॉडल भारत के वेस्ट टू एनर्जी मिशन को भी मजबूती देते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकता है नया अवसर
यदि बायोगैस प्लांट्स का विस्तार औद्योगिक क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्रों तक होता है, तो इससे गांवों में नई सप्लाई चेन बन सकती है। किसान, डेयरी फार्मर, पंचायतें और स्थानीय उद्यमी जैविक कचरे की आपूर्ति से आय अर्जित कर सकते हैं।
नेपियर घास जैसी ऊर्जा फसलें किसानों के लिए अतिरिक्त आय का विकल्प बन सकती हैं। साथ ही गोबर और कृषि अवशेषों का उपयोग होने से गांवों में स्वच्छता और कचरा प्रबंधन बेहतर हो सकता है।
निष्कर्ष
हरियाणा के खारखौदा में मारुति सुजुकी का 10 टन प्रतिदिन क्षमता वाला बायोगैस प्लांट केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं है, बल्कि यह स्वच्छ ऊर्जा, पराली प्रबंधन, कार्बन उत्सर्जन में कमी और कृषि अवशेषों के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इस पहल से कंपनी की ऊर्जा जरूरत का हिस्सा पूरा होगा, हजारों टन कार्बन उत्सर्जन कम होगा और स्थानीय स्तर पर जैविक संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। अगर इस मॉडल को बड़े पैमाने पर अपनाया गया, तो यह किसानों, उद्योगों और पर्यावरण तीनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

