भारत की कृषि व्यवस्था इस समय एक दिलचस्प बदलाव के दौर से गुजर रही है। एक तरफ दुनिया भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन संकट और बढ़ती उत्पादन लागत जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय किसान खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने के नए रास्ते तलाश रहे हैं। खरीफ 2026 सीजन के शुरुआती आंकड़े इस बदलाव की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। इस वर्ष देशभर में किसानों द्वारा जैविक खाद की खरीद में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है, जिसने कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खरीफ सीजन में किसानों ने 11.17 लाख टन जैविक खाद खरीदी है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह मात्रा केवल 3.20 लाख टन थी। इसका अर्थ है कि जैविक खाद की मांग में लगभग साढ़े तीन गुना वृद्धि हुई है। कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकार इसे केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय खेती की बदलती सोच का संकेत मान रहे हैं।
पिछले कई दशकों से भारतीय खेती रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भर रही है। हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में रासायनिक उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही, लेकिन समय के साथ इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे। मिट्टी की उर्वरा शक्ति में गिरावट, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, जैविक कार्बन का लगातार कम होना और उत्पादन लागत में वृद्धि जैसी समस्याओं ने किसानों को नई दिशा में सोचने के लिए मजबूर किया।
यही कारण है कि अब बड़ी संख्या में किसान जैविक खाद और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की ओर बढ़ रहे हैं। खेतों में केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय किसान गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, फार्म यार्ड मैन्योर (FYM), फोर्टिफाइड ऑर्गेनिक मैन्योर (FOM), लिक्विड फोर्टिफाइड ऑर्गेनिक मैन्योर (LFOM) और फॉस्फेट रिच ऑर्गेनिक मैन्योर (PROM) जैसे विकल्पों का उपयोग बढ़ा रहे हैं।
राज्यों के आंकड़े इस बदलाव को और स्पष्ट करते हैं। पंजाब, जिसे लंबे समय तक रासायनिक उर्वरकों के सर्वाधिक उपयोग वाले राज्यों में गिना जाता रहा है, इस बार जैविक खाद की खरीद में सबसे आगे रहा। राज्य में लगभग 2.83 लाख टन जैविक खाद खरीदी गई। इसके बाद उत्तर प्रदेश का स्थान रहा, जहां किसानों ने 2.71 लाख टन जैविक खाद खरीदी। हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी जैविक खाद की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे पहला कारण मिट्टी के स्वास्थ्य को लेकर किसानों में बढ़ती जागरूकता है। पिछले कुछ वर्षों में कृषि विज्ञान केंद्रों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से किसानों को मिट्टी परीक्षण और संतुलित पोषण प्रबंधन के महत्व के बारे में लगातार जानकारी दी गई है। इससे किसानों को यह समझ में आने लगा है कि केवल अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक डालने से उत्पादन बढ़ाना संभव नहीं है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता है। वर्तमान समय में पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव ने वैश्विक उर्वरक बाजार को प्रभावित किया है। भारत अपनी उर्वरक आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी प्रकार का तनाव सीधे तौर पर भारतीय कृषि को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में उर्वरकों की कोई कमी नहीं है और खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा खरीफ 2026 के लिए उर्वरकों की कुल आवश्यकता का पुनर्मूल्यांकन किया गया है। संशोधित अनुमान के अनुसार, इस सीजन में लगभग 383.9 लाख टन उर्वरकों की आवश्यकता रहेगी।
दिलचस्प बात यह है कि प्रारंभिक अनुमान 390.5 लाख टन का था। लेकिन मानसून की स्थिति और संभावित वर्षा पैटर्न को ध्यान में रखते हुए इसमें संशोधन किया गया। यूरिया की अनुमानित खपत को 194 लाख टन से घटाकर 190.3 लाख टन किया गया है। इसी प्रकार डीएपी की आवश्यकता भी 59.1 लाख टन से घटाकर 56.2 लाख टन आंकी गई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में देश में 197.56 लाख टन उर्वरकों का भंडार उपलब्ध है। यह कुल अनुमानित आवश्यकता का लगभग 51 प्रतिशत है। सामान्य परिस्थितियों में इस समय तक इतना बड़ा स्टॉक उपलब्ध नहीं होता। आमतौर पर खरीफ सीजन की शुरुआत में कुल आवश्यकता का लगभग एक-तिहाई भंडार ही उपलब्ध रहता है।
इसके बावजूद देश के कुछ हिस्सों से किसानों द्वारा उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। कई स्थानों पर किसानों ने डीएपी और यूरिया की सीमित उपलब्धता की बात कही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद वितरण व्यवस्था और स्थानीय मांग के कारण क्षेत्रीय स्तर पर अस्थायी कमी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
ऐसे माहौल में जैविक खाद की बढ़ती मांग भारतीय कृषि के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। यदि किसान अपने पोषक तत्व प्रबंधन में जैविक स्रोतों का हिस्सा बढ़ाते हैं, तो रासायनिक उर्वरकों पर दबाव कम किया जा सकता है। इससे न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधरेगी बल्कि आयात पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
जैविक खाद का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह केवल पौधों को पोषक तत्व ही नहीं देती, बल्कि मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक संरचना को भी बेहतर बनाती है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि होती है और फसलें प्रतिकूल परिस्थितियों का बेहतर सामना कर पाती हैं।
आने वाले वर्षों में यदि यही रुझान जारी रहता है तो भारतीय कृषि एक महत्वपूर्ण परिवर्तन की ओर बढ़ सकती है। यह परिवर्तन केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि मिट्टी की सेहत, पर्यावरण संरक्षण, किसानों की आय और कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता से भी जुड़ा होगा।
खरीफ 2026 के शुरुआती आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि भारतीय किसान अब केवल अधिक उत्पादन के बारे में नहीं सोच रहा, बल्कि वह खेती को टिकाऊ और भविष्य के लिए सुरक्षित बनाने की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा है। यही सोच आने वाले समय में भारतीय कृषि की नई पहचान बन सकती है।

