भारत में रबी सीजन की प्रमुख तिलहनी फसलों में सरसों की फसल (Mustard Farming) का विशेष स्थान है। सरसों से निकलने वाले तेल का इस्तेमाल देश के करोड़ों घरों में खाना बनाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा सरसों की खली का उपयोग पशु आहार और जैविक खाद के रूप में भी होता है। यही वजह है कि किसानों के लिए सरसों केवल एक फसल नहीं, बल्कि आमदनी का महत्वपूर्ण साधन भी है।
सरसों की खासियत यह है कि इसकी खेती अपेक्षाकृत कम पानी में की जा सकती है। सही समय पर बुवाई, उपयुक्त किस्म, खेत की तैयारी और समय पर कीट-रोग प्रबंधन किया जाए तो किसान अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार सरसों-रेपसीड की खेती भारत के कई राज्यों में की जाती है और राजस्थान इसका सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य रहा है। इसके अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों में भी इसका अच्छा उत्पादन होता है। (Desagri) आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सरसों की खेती कैसे करें, इसके लिए कैसी मिट्टी चाहिए, बुवाई कब करनी चाहिए और फसल में कीट दिखाई देने पर किसान को क्या करना चाहिए।
सरसों की खेती के लिए कैसी मिट्टी होनी चाहिए?
सरसों की खेती अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन अच्छी जल निकासी वाली दोमट और बलुई दोमट मिट्टी बेहतर मानी जाती है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा नहीं रहना चाहिए। भारी जलभराव वाली जमीन में पौधों की जड़ों और फसल के विकास पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए किसान खेत तैयार करते समय जल निकासी की व्यवस्था पर ध्यान दें।
सरसों बोने से पहले मिट्टी की जांच करवाना भी फायदेमंद है। इससे किसान को पता चलता है कि खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है। इसके आधार पर खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। बिना जांच के जरूरत से ज्यादा उर्वरक डालना लागत बढ़ा सकता है।
किन राज्यों में होती है सरसों की खेती?
सरसों मुख्य रूप से रबी सीजन की फसल है। भारत में इसका क्षेत्र काफी बड़ा है। सरकारी सामान्य अनुमानों में राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, झारखंड, असम और बिहार सहित कई राज्यों में रेपसीड-सरसों की खेती दर्ज की गई है। (Desagri)
सरसों की खेती करने वाले प्रमुख राज्यों में शामिल हैं:
- राजस्थान
- उत्तर प्रदेश
- हरियाणा
- मध्य प्रदेश
- पश्चिम बंगाल
- गुजरात
- पंजाब
- बिहार
- झारखंड
- असम
- उत्तराखंड
इनमें राजस्थान सरसों उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। पुराने आधिकारिक राज्यवार आंकड़ों में भी राजस्थान की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही है। (Desagri) हालांकि हर राज्य की जलवायु अलग होती है। इसलिए किसानों को अपने जिले के लिए अनुशंसित किस्म और बुवाई के समय की जानकारी स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से जरूर लेनी चाहिए।
सरसों की बुवाई का सही समय क्या है?
सरसों की अच्छी पैदावार में बुवाई का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। बहुत जल्दी या बहुत देर से बुवाई करने पर पौधों का विकास, फूल आने का समय और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। देर से बोई गई फसल में कुछ कीट और रोगों का खतरा भी बढ़ सकता है।
अलग-अलग राज्यों में सरसों की बुवाई का समय थोड़ा बदलता है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के राज्यवार कृषि कैलेंडर में कई प्रमुख क्षेत्रों में सरसों की बुवाई अक्टूबर से नवंबर के आसपास बताई गई है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में मुख्य सरसों की बुवाई अक्टूबर में, जबकि पंजाब में अक्टूबर के आखिरी हिस्से से नवंबर के आखिरी हिस्से तक दर्ज की गई है। (Desagri)
इसलिए सामान्य तौर पर उत्तर और मध्य भारत में किसान अक्टूबर से नवंबर के बीच सरसों की बुवाई करते हैं, लेकिन सही तारीख स्थानीय मौसम, किस्म, सिंचाई की सुविधा और क्षेत्र पर निर्भर करेगी।
किसानों को केवल तारीख देखकर बुवाई नहीं करनी चाहिए। खेत में पर्याप्त नमी और अनुकूल तापमान होना भी जरूरी है।
खेत की तैयारी कैसे करें?
सरसों के अच्छे अंकुरण के लिए खेत को समतल और भुरभुरा रखना उपयोगी होता है। पिछली फसल की कटाई के बाद खेत में मौजूद अनावश्यक अवशेष और खरपतवार का उचित प्रबंधन करें। खेत तैयार करते समय यह ध्यान रखें कि सिंचाई या बारिश का पानी एक जगह इकट्ठा न हो। जरूरत के अनुसार खेत में नालियां बनाई जा सकती हैं।
खाद और उर्वरक की मात्रा सभी खेतों के लिए एक जैसी नहीं होती। इसलिए मिट्टी जांच के आधार पर और अपने क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश के अनुसार पोषक तत्व देना बेहतर तरीका है।
सरसों की कौन सी किस्म लगाएं?
किस्म का चयन किसान के राज्य, बुवाई के समय और उपलब्ध सिंचाई पर निर्भर करता है। इसलिए हर क्षेत्र में एक ही किस्म को सबसे बेहतर नहीं माना जा सकता।ICAR ने पूसा डबल जीरो मस्टर्ड 31 को राजस्थान के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा कुछ अन्य क्षेत्रों के लिए अनुशंसित बताया है। इसकी औसत बीज उपज 23.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और तेल की मात्रा करीब 41 प्रतिशत बताई गई है। (Indian Council of Agricultural Research)
इसके अलावा ICAR-IIRMR की BPM-11 जैसी किस्म राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों सहित बड़े क्षेत्र के लिए अनुशंसित की गई है। (Indian Council of Agricultural Research) किसान प्रमाणित बीज को प्राथमिकता दें और अपने जिले के कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से उस क्षेत्र की अनुशंसित किस्म की जानकारी लें।
सरसों की फसल में कौन-कौन से कीट और रोग लग सकते हैं?
सरसों की फसल में समय-समय पर कई कीट और रोग दिखाई दे सकते हैं। ICAR के अनुसार प्रमुख समस्याओं में माहू यानी एफिड, आरा मक्खी और चितकबरा कीड़ा शामिल हैं। रोगों में आल्टरनेरिया ब्लाइट, सफेद रतुआ, मृदुरोमिल आसिता, चूर्णी रोग और तना गलन जैसी समस्याएं देखी जा सकती हैं। (Indian Council of Agricultural Research) इनमें माहू सरसों की फसल का जाना-पहचाना कीट है। ये छोटे कीट पौधे के कोमल हिस्सों और फूलों के आसपास समूह में दिखाई दे सकते हैं और फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए फूल आने के समय किसान खेत की नियमित निगरानी करें। केवल खेत के किनारे देखकर फैसला न करें, बल्कि अलग-अलग हिस्सों में जाकर पौधों की जांच करें।
सरसों में कीट लग जाए तो कौन सी दवा डालें?
कीट दिखाई देते ही किसी भी कीटनाशक का अंधाधुंध इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पहले यह पहचानना जरूरी है कि फसल में कौन सा कीट या रोग लगा है और उसका प्रकोप कितना है। ICAR भी सरसों में समन्वित कीट प्रबंधन यानी IPM को महत्वपूर्ण मानता है। (Indian Council of Agricultural Research) किसान संक्रमित हिस्सों की निगरानी करें, खेत को अनावश्यक खरपतवार से मुक्त रखें और लाभकारी कीटों को बेवजह नुकसान पहुंचाने से बचें। यदि रासायनिक नियंत्रण जरूरी हो, तो अपने जिले के कृषि अधिकारी, कृषि विज्ञान केंद्र या अधिकृत कृषि विशेषज्ञ से कीट की पहचान करवाकर सरसों के लिए पंजीकृत कीटनाशक ही इस्तेमाल करें। उत्पाद के आधिकारिक लेबल पर दी गई मात्रा, सुरक्षा अवधि और सावधानियों का पालन करना जरूरी है। अलग-अलग कीटों और उत्पादों की मात्रा अलग होती है, इसलिए बिना फसल और कीट की सही पहचान के किसी दवा की निश्चित मात्रा अपनाना उचित नहीं है।
सिंचाई करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
सरसों को बहुत अधिक पानी देने की जरूरत नहीं होती, लेकिन महत्वपूर्ण अवस्थाओं पर मिट्टी में पर्याप्त नमी रहने से उत्पादन को फायदा मिल सकता है। सिंचाई की जरूरत मिट्टी, मौसम और पहले से उपलब्ध नमी पर निर्भर करती है। इसलिए केवल निश्चित दिनों के अंतर पर पानी देने की बजाय खेत की नमी देखकर फैसला करें।
सर्दियों में पाले की आशंका होने पर भी सावधानी जरूरी है। ICAR के एक किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम में पाले की संभावना के दौरान फसल को नुकसान से बचाने के लिए हल्की सिंचाई की सलाह दी गई थी। (Indian Council of Agricultural Research)
खरपतवार पर भी रखें नजर
सरसों के शुरुआती विकास के दौरान खरपतवार फसल के साथ पानी, पोषक तत्व और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। इससे पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
खरपतवार को शुरुआती अवस्था में नियंत्रित करना ज्यादा आसान होता है। छोटे खेतों में निराई-गुड़ाई एक विकल्प हो सकती है। बड़े क्षेत्र में किसान स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से अपने खेत में मौजूद खरपतवार की पहचान के आधार पर उचित प्रबंधन की सलाह लें।
सरसों की फसल पर किसानों को सब्सिडी मिलती है क्या?
केंद्र सरकार ने तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन (NMEO-Oilseeds) को मंजूरी दी है। यह मिशन 2024-25 से 2030-31 तक लागू किया जाना है और इसके लिए 10,103 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय रखा गया है। सरसों यानी रेपसीड-मस्टर्ड भी इस मिशन में शामिल प्रमुख तिलहनी फसलों में से एक है। (Prime Minister of India)
इस मिशन के तहत उच्च उपज और अधिक तेल वाली किस्मों को बढ़ावा देने, गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने, किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण देने और मौसम तथा कीट प्रबंधन से जुड़ी सलाह उपलब्ध कराने पर जोर है। देश में 600 से अधिक वैल्यू चेन क्लस्टर विकसित करने का भी प्रावधान है। (Prime Minister of India)
लेकिन यहां किसानों को एक बात समझनी जरूरी है। हर किसान को पूरे देश में एक समान निश्चित नकद सब्सिडी मिले, ऐसा जरूरी नहीं है। सहायता का स्वरूप राज्य, जिले, योजना के घटक और उस वर्ष के लक्ष्य के अनुसार अलग हो सकता है।
इसलिए सरसों की खेती शुरू करने से पहले किसान अपने जिले के कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या राज्य के कृषि पोर्टल पर पता करें कि वर्तमान सीजन में बीज, प्रदर्शन, कृषि यंत्र या अन्य तिलहन कार्यक्रम के तहत कौन सी सहायता उपलब्ध है।
सरसों किसानों के लिए MSP का भी है महत्व
तिलहन किसानों को केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं बल्कि फसल के उचित भाव पर भी ध्यान देना चाहिए। केंद्र सरकार ने NMEO-Oilseeds की घोषणा में तिलहन किसानों को लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराने के लिए MSP और PM-AASHA के तहत मूल्य समर्थन व्यवस्था का भी उल्लेख किया है। (Prime Minister of India)
हालांकि MSP घोषित होने का मतलब यह नहीं है कि किसान की हर मात्रा अपने आप MSP पर बिक जाएगी। खरीद व्यवस्था, पंजीकरण, खरीद केंद्र और राज्य की प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है। इसलिए फसल बेचने से पहले स्थानीय मंडी और सरकारी खरीद संबंधी सूचना जरूर देखें।
अच्छी पैदावार के लिए इन बातों का रखें ध्यान
सरसों की सफल खेती केवल बीज बो देने से नहीं होती। किसान को पूरे फसल चक्र में खेत की निगरानी करनी चाहिए।
समय पर बुवाई करें, अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित और प्रमाणित बीज चुनें, मिट्टी की जांच के आधार पर पोषण प्रबंधन करें और खेत में जलभराव न होने दें। फसल में माहू या दूसरे कीट दिखाई देने पर पहले सही पहचान करें और उसके बाद ही नियंत्रण का फैसला लें।
सरसों में मधुमक्खियों और दूसरे परागण करने वाले कीटों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए फूल आने के दौरान अनावश्यक कीटनाशक छिड़काव से बचना बेहतर है। असम के लिए ICAR की कृषि सलाह में सरसों के खेतों में मधुमक्खी पालन को उत्पादन बढ़ाने वाले उपायों में शामिल किया गया है। (Indian Council of Agricultural Research)
निष्कर्ष
सरसों भारत की महत्वपूर्ण रबी तिलहनी फसल है और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात सहित कई राज्यों में बड़े स्तर पर इसकी खेती होती है। सामान्य तौर पर अक्टूबर-नवंबर इसकी बुवाई का महत्वपूर्ण समय होता है, हालांकि राज्य और किस्म के अनुसार इसमें अंतर हो सकता है। अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट जमीन, समय पर बुवाई, क्षेत्र के अनुसार सही किस्म, संतुलित पोषण और नियमित कीट निगरानी बेहतर उत्पादन की बुनियाद हैं।
केंद्र सरकार का NMEO-Oilseeds मिशन भी सरसों सहित तिलहन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने पर केंद्रित है। इसलिए किसानों को खेती शुरू करने से पहले अपने राज्य और जिले में उपलब्ध सरकारी सहायता की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान किसी दूसरे क्षेत्र की सलाह को सीधे अपने खेत में लागू करने के बजाय स्थानीय मौसम, मिट्टी और कृषि विभाग की सिफारिश को प्राथमिकता दें। इससे खेती की लागत और जोखिम दोनों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है।
FAQ: सरसों की खेती से जुड़े सवाल
सवाल: सरसों की बुवाई कब करनी चाहिए?
जवाब: उत्तर और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में अक्टूबर से नवंबर के बीच सरसों की बुवाई की जाती है। सही समय राज्य, किस्म और स्थानीय मौसम के अनुसार तय करें।
सवाल: सरसों के लिए कौन सी मिट्टी अच्छी है?
जवाब: अच्छी जल निकासी वाली दोमट और बलुई दोमट मिट्टी सरसों की खेती के लिए उपयोगी मानी जाती है।
सवाल: भारत में सबसे ज्यादा सरसों कहां होती है?
जवाब: राजस्थान देश के सबसे महत्वपूर्ण सरसों उत्पादक राज्यों में पहले स्थान पर रहा है। इसके अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। (Desagri)
सवाल: सरसों का प्रमुख कीट कौन सा है?
जवाब: माहू यानी एफिड सरसों का प्रमुख कीट है। इसके अलावा आरा मक्खी और चितकबरा कीड़ा भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। (Indian Council of Agricultural Research)
सवाल: क्या सरसों की खेती पर सरकारी सहायता मिलती है?
जवाब: केंद्र सरकार का NMEO-Oilseeds मिशन सरसों सहित प्रमुख तिलहन फसलों को कवर करता है। उपलब्ध सहायता राज्य और योजना के घटक के अनुसार बदल सकती है, इसलिए किसान स्थानीय कृषि विभाग से वर्तमान लाभ की पुष्टि करें। (Prime Minister of India)
