Punjab Agricultural University के परिधान एवं वस्त्र विज्ञान विभाग द्वारा 4 मई 2026 को राष्ट्रीय वस्त्र दिवस बड़े उत्साह, गरिमा और सांस्कृतिक विविधता के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भारत की समृद्ध और विविध वस्त्र विरासत को विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक वस्त्र शैलियों और हस्तशिल्प को खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया, जिसने भारतीय संस्कृति की कलात्मकता और शिल्प कौशल की अनूठी झलक दर्शाई।
इस समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने की। कार्यक्रम में अनुसंधान निदेशक डॉ. ए. एस. ढट्ट, प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. एम. एस. भुल्लर, डीन पोस्ट ग्रेजुएट स्टडीज डॉ. वी. एस. हांस तथा कॉलेज ऑफ कम्युनिटी साइंस की डीन डॉ. किरण बैंस भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। इसके अलावा विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के फैकल्टी सदस्य और परिधान एवं वस्त्र विज्ञान विभाग के सेवानिवृत्त शिक्षक भी कार्यक्रम में शामिल हुए। उनकी उपस्थिति ने समारोह को और अधिक गरिमामय बना दिया।
कार्यक्रम का सबसे आकर्षक पहलू छात्रों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक एवं पारंपरिक परिधानों का प्रदर्शन रहा। विभाग के विद्यार्थियों ने भारत के विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए पारंपरिक वेशभूषा धारण की और पूरे आत्मविश्वास के साथ संबंधित राज्यों की वस्त्र परंपराओं, बुनाई तकनीकों तथा हस्तशिल्प की विशेषताओं के बारे में जानकारी साझा की। छात्रों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भारतीय वस्त्र कला के इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और क्षेत्रीय विविधता से रूबरू कराया।
विद्यार्थियों ने पंजाब की फुलकारी, गुजरात की बांधनी, राजस्थान की लहरिया, कश्मीर की पश्मीना, तमिलनाडु की कांजीवरम साड़ी, पश्चिम बंगाल की बालूचरी और उत्तर-पूर्वी राज्यों के पारंपरिक वस्त्रों सहित कई प्रसिद्ध वस्त्र परंपराओं का परिचय दिया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि भारतीय वस्त्र केवल पहनावे का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे देश की सांस्कृतिक पहचान और इतिहास को भी दर्शाते हैं।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस दौर में पारंपरिक वस्त्र कला और हस्तशिल्प को संरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय हस्तकरघा और पारंपरिक कपड़ा उद्योग लाखों लोगों की आजीविका से जुड़े हुए हैं और देश की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए नई पीढ़ी को इन कलाओं से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
समारोह का एक महत्वपूर्ण आकर्षण विभाग के ‘हेरिटेज रूम’ का उद्घाटन रहा। यह नवस्थापित हेरिटेज रूम विद्यार्थियों के लिए डिजाइन सेंटर के रूप में कार्य करेगा। यहां छात्र पारंपरिक वस्त्रों, डिजाइनों और शिल्प कलाओं से प्रेरणा लेकर नए और नवाचारपूर्ण डिजाइन विकसित कर सकेंगे। विभाग का मानना है कि यह केंद्र विद्यार्थियों की रचनात्मकता को बढ़ावा देने के साथ-साथ भारतीय विरासत आधारित डिजाइनिंग को नई दिशा प्रदान करेगा।
कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षकों और विशेषज्ञों ने छात्रों की रचनात्मकता और प्रस्तुति कौशल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ उन्हें भारतीय वस्त्र उद्योग की व्यापक संभावनाओं से भी परिचित कराते हैं। ऐसे कार्यक्रम युवा पीढ़ी में भारतीय कला और शिल्प के प्रति सम्मान और जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विभागाध्यक्ष डॉ. हरमिंदर कौर सैनी ने अपने संबोधन में कहा कि वस्त्र केवल हमारी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते, बल्कि वे हमारी पहचान, संस्कृति और परंपराओं का भी प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय वस्त्र दिवस जैसे आयोजन भारतीय वस्त्र विरासत को सम्मान देने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने विभाग के शिक्षकों और विद्यार्थियों को इस आयोजन को सफल बनाने के लिए बधाई दी और उनके समर्पण की सराहना की।
कार्यक्रम का समापन देश की समृद्ध वस्त्र विरासत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के संकल्प के साथ हुआ। पूरे आयोजन ने उपस्थित लोगों को भारतीय वस्त्र कला की विविधता और सौंदर्य के प्रति नई समझ और सम्मान से भर दिया। समारोह ने यह संदेश दिया कि भारतीय पारंपरिक वस्त्र केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की रचनात्मक और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण आधार हैं।

