देश में मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम तेज कर दिए हैं। सरकार ने वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास की घोषणा की है, ताकि मत्स्य उत्पादन बढ़ाया जा सके, ग्रामीण आजीविका को सहारा मिले और इस क्षेत्र में आधुनिक ढांचा तैयार हो। इस दिशा में मत्स्य पालन विभाग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर कार्ययोजना तैयार कर ली है।
सरकार पहले ही प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत विभिन्न राज्यों में 23 जलाशयों के एकीकृत विकास को स्वीकृति दे चुकी है। इन परियोजनाओं की प्रगति पर विभाग नियमित रूप से नजर रख रहा है, ताकि समयबद्ध तरीके से काम आगे बढ़ सके। इससे उम्मीद की जा रही है कि देश में अंतर्देशीय मत्स्य पालन को नई मजबूती मिलेगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
मत्स्य क्षेत्र के समग्र विकास के लिए केंद्र सरकार ने पूरे देश में 34 मत्स्य क्लस्टर अधिसूचित किए हैं। इनमें सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं, साथ ही अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में टूना क्लस्टर को भी विशेष रूप से शामिल किया गया है। इन क्लस्टरों का उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र में मौजूद बुनियादी कमियों को दूर करना, विपणन नेटवर्क को बेहतर बनाना, जलीय कृषि अवसंरचना को उन्नत करना और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना है। सरकार इन क्लस्टरों की प्रगति की समय-समय पर समीक्षा भी कर रही है, ताकि इनके वास्तविक लाभ मछुआरों और उद्यमियों तक पहुंच सकें।
सरकार ने समुद्री मत्स्य संसाधनों के सतत उपयोग के लिए भी नई नीतिगत व्यवस्था लागू की है। विदेश मंत्रालय ने 4 नवंबर 2025 को भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र यानी EEZ में मत्स्य संसाधनों के सतत दोहन से संबंधित नियम अधिसूचित किए थे। इसके बाद 9 दिसंबर 2025 को भारतीय ध्वज वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों के लिए उच्च समुद्री क्षेत्रों में सतत मत्स्य दोहन संबंधी दिशा-निर्देश भी जारी किए गए। इन नियमों और दिशा-निर्देशों का उद्देश्य समुद्री मत्स्य संसाधनों के उपयोग को व्यवस्थित, पारदर्शी और आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी बनाना है।
नई व्यवस्था के तहत EEZ या उच्च समुद्र में पकड़ी गई और भारतीय बंदरगाहों पर उतारी गई मछली को भारतीय मूल का माना जाएगा। ऐसी मछली पर आयात शुल्क नहीं लगेगा। इसका सीधा लाभ मछुआरों और मत्स्य व्यवसाय से जुड़े लोगों को मिलने की संभावना है, क्योंकि इससे उनके उत्पाद पर लागत का दबाव कम होगा और लाभांश बढ़ सकेगा। यह फैसला विशेष रूप से उन भारतीय जहाजों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो समुद्री क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मत्स्य दोहन करते हैं।
सरकार ने मछली उतारने और निर्यात की प्रक्रिया को भी अधिक सुविधाजनक बनाने की दिशा में कदम उठाया है। नई गाइडलाइंस के अनुसार, मदर-चाइल्ड वेसल मॉडल के माध्यम से समुद्र के बीच में ही ट्रांसशिपमेंट की सुविधा दी जाएगी। इससे समुद्री संचालन अधिक कुशल बन सकेगा। साथ ही यदि भारतीय जहाजों द्वारा पकड़ी गई मछली विदेशी बंदरगाहों पर उतारी जाती है, तो उसे निर्यात माना जाएगा। इससे भारतीय समुद्री उत्पादों को वैश्विक बाजार में अधिक अवसर मिल सकते हैं।
निर्यात प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैश्विक मानकों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए MPEDA कैच सर्टिफिकेट और EIC हेल्थ सर्टिफिकेट को ReALCRaft पोर्टल से जोड़ा गया है। इससे ऑनलाइन प्रमाणन, पूरी ट्रेसबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप दस्तावेजीकरण संभव होगा। इसका लाभ यह होगा कि भारतीय समुद्री उत्पादों की विश्व बाजार में विश्वसनीयता और मूल्य दोनों बढ़ सकते हैं।
केंद्रीय बजट 2026-27 में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारतीय मछली पकड़ने वाले जहाजों द्वारा EEZ या उच्च समुद्र में पकड़ी गई मछली आयात शुल्क से मुक्त होगी। वहीं, यदि ऐसी मछली विदेशी बंदरगाहों पर उतारी जाती है, तो उसे वस्तुओं के निर्यात के रूप में माना जाएगा। यह प्रावधान भारतीय मत्स्य क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

