भारत की खाद जरूरतों को पूरा करने में रूस की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। वर्ष 2026 के पहले छह महीनों यानी जनवरी से जून के दौरान रूस ने भारत को करीब 28 लाख टन उर्वरक की आपूर्ति की है। रूस की ओर से भारत को आगे भी उर्वरकों की आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा दिया गया है। वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों और उपलब्धता को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच रूस से बढ़ती आपूर्ति भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है और देश में हर साल करोड़ों टन उर्वरकों की जरूरत होती है। खासतौर पर यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य पोषक तत्व आधारित उर्वरकों की मांग खेती के मौसम के दौरान तेजी से बढ़ जाती है। घरेलू उत्पादन के बावजूद भारत को अपनी जरूरत का एक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करना पड़ता है। ऐसे में रूस जैसे बड़े उर्वरक उत्पादक देश से नियमित आपूर्ति भारत की खाद सुरक्षा को मजबूत करने में मदद कर सकती है।
छह महीने में करीब 28 लाख टन खाद भारत पहुंची
2026 के पहले छह महीनों में रूस से भारत को करीब 2.8 मिलियन टन यानी लगभग 28 लाख टन उर्वरक भेजा गया। यह मात्रा भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीफ और रबी दोनों फसलों के लिए पर्याप्त खाद उपलब्ध रखना सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।
कृषि क्षेत्र में यूरिया की मांग सबसे अधिक रहती है। इसके अलावा डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों का इस्तेमाल भी फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी एक स्रोत से आपूर्ति प्रभावित होने पर दूसरे देशों से आयात बढ़ाना जरूरी हो जाता है। रूस से होने वाली आपूर्ति इस लिहाज से भारत के लिए एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराती है।
रूस दुनिया के प्रमुख उर्वरक उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। वहां प्राकृतिक गैस और अन्य कच्चे माल की उपलब्धता के कारण नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के उत्पादन में उसे महत्वपूर्ण बढ़त हासिल है। इसी वजह से वैश्विक खाद बाजार में रूस की भूमिका काफी बड़ी है।
वैश्विक बाजार की चुनौतियों के बीच बढ़ी रूस की अहमियत
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक उर्वरक बाजार में कई तरह की चुनौतियां सामने आई हैं। ऊर्जा की कीमतों में बदलाव, विभिन्न देशों की निर्यात नीतियां, समुद्री परिवहन की लागत और भू-राजनीतिक परिस्थितियों का असर उर्वरकों की उपलब्धता तथा कीमतों पर पड़ा है।
भारत अपनी विशाल कृषि अर्थव्यवस्था के कारण वैश्विक खाद बाजार में प्रमुख खरीदार है। सरकार किसानों के लिए उर्वरकों को अपेक्षाकृत सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए बड़े स्तर पर सब्सिडी देती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर सरकार के खाद सब्सिडी खर्च पर भी पड़ सकता है।
ऐसे समय में रूस से बड़ी मात्रा में उर्वरक मिलना भारत के लिए आपूर्ति के लिहाज से राहत देने वाला कदम है। यदि भविष्य में भी रूस से नियमित और पर्याप्त मात्रा में खाद मिलती रहती है तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
रूस ने आगे भी आपूर्ति बढ़ाने का दिया भरोसा
रूस की ओर से भारत को आगे भी उर्वरकों की आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा दिया गया है। यह संकेत भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में खरीफ और रबी दोनों मौसमों के दौरान खाद की मांग काफी अधिक रहती है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को बुवाई के समय खाद की उपलब्धता में परेशानी न हो। कई राज्यों में फसल के मौसम के दौरान यूरिया और डीएपी की मांग अचानक बढ़ जाती है। यदि समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध नहीं होती है तो किसानों को लंबी कतारों और अतिरिक्त खर्च जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
रूस से अतिरिक्त आपूर्ति मिलने पर केंद्र सरकार राज्यों की जरूरत के अनुसार खाद की उपलब्धता बनाए रखने में अधिक सक्षम हो सकती है। हालांकि इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब आयातित उर्वरक समय पर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचे और वहां से राज्यों तथा जिलों में तेजी से वितरित किया जाए।
भारत के लिए खाद सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण?
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश में धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, कपास, दलहन और तिलहन सहित कई फसलों के उत्पादन में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। किसानों को समय पर संतुलित मात्रा में खाद उपलब्ध नहीं होने पर फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
यूरिया का इस्तेमाल मुख्य रूप से नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए किया जाता है। वहीं डीएपी से फसलों को नाइट्रोजन और फास्फोरस मिलता है। एनपीके उर्वरक फसल की जरूरत के अनुसार कई प्रमुख पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। इसलिए केवल एक प्रकार के उर्वरक की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। सरकार को अलग-अलग श्रेणी के उर्वरकों की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है।
रूस से बढ़ती आपूर्ति इस व्यापक खाद सुरक्षा रणनीति का एक हिस्सा बन सकती है। इससे भारत को वैश्विक बाजार में उपलब्ध विभिन्न स्रोतों से खाद खरीदने की क्षमता मजबूत करने में मदद मिलेगी।
किसानों के लिए क्या हो सकता है असर?
रूस से उर्वरकों की पर्याप्त आपूर्ति का सबसे बड़ा संभावित लाभ किसानों को हो सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद की उपलब्धता बनी रहती है और भारत को समय पर आयात मिलता है तो घरेलू बाजार में अचानक कमी की स्थिति बनने की संभावना कम हो सकती है।
पर्याप्त स्टॉक रहने से सरकार के लिए राज्यों को उनकी जरूरत के अनुसार खाद उपलब्ध कराना आसान होता है। इससे किसानों को बुवाई के समय खाद के लिए परेशान होने से बचाया जा सकता है।
हालांकि किसानों के लिए केवल आपूर्ति बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। खाद की कीमत, वितरण व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आयातित उर्वरक वास्तविक किसानों तक पहुंचे और वितरण श्रृंखला में अनियमितता या कालाबाजारी की स्थिति न बने।
आयात के साथ घरेलू उत्पादन बढ़ाने की जरूरत
रूस से 28 लाख टन उर्वरक की आपूर्ति भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन लंबे समय में देश को घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। भारत पिछले कुछ वर्षों में यूरिया के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में कई कदम उठा चुका है। इसके बावजूद कुछ उर्वरकों और कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
सरकार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि घरेलू उत्पादन, दीर्घकालिक आयात समझौतों और विभिन्न देशों से आपूर्ति के बीच संतुलन बनाया जाए। इससे वैश्विक बाजार में किसी एक देश की नीति बदलने या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत के पास वैकल्पिक स्रोत मौजूद रहेंगे।
रूस से बढ़ती उर्वरक आपूर्ति इसी व्यापक रणनीति के तहत भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। यदि दोनों देशों के बीच खाद क्षेत्र में सहयोग आगे भी मजबूत होता है तो भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिर आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
आगे की दिशा
2026 के पहले छह महीनों में रूस से करीब 28 लाख टन उर्वरक की आपूर्ति यह बताती है कि दोनों देशों के बीच खाद कारोबार का महत्व बढ़ रहा है। रूस का आगे आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा भारत के लिए सकारात्मक संकेत है।
आने वाले महीनों में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह होगी कि वैश्विक बाजार की कीमतों और आपूर्ति में होने वाले बदलावों के बीच किसानों के लिए खाद की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। इसके लिए आयात स्रोतों में विविधता, घरेलू उत्पादन में वृद्धि, बेहतर लॉजिस्टिक्स और मजबूत वितरण व्यवस्था पर एक साथ काम करना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर रूस से मिली 28 लाख टन उर्वरक की आपूर्ति भारत की खाद सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। यदि भविष्य में रूस से आपूर्ति और बढ़ती है तथा समय पर भारत पहुंचती है, तो इससे देश के उर्वरक भंडार को मजबूत करने और किसानों की जरूरत के समय खाद उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। हालांकि भारत को आयात के साथ-साथ घरेलू उत्पादन और संतुलित उर्वरक इस्तेमाल को भी प्राथमिकता देनी होगी, ताकि आने वाले वर्षों में वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं का कृषि क्षेत्र पर कम से कम असर पड़े।

