भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अनुसंधान कार्यक्रमों ने सोयाबीन की प्राकृतिक खेती को लेकर नई संभावनाएं सामने रखी हैं। वैज्ञानिकों का ध्यान अब केवल पैदावार बढ़ाने पर नहीं, बल्कि कम लागत में टिकाऊ उत्पादन, मिट्टी की सेहत सुधारने और किसानों की शुद्ध आमदनी बढ़ाने पर भी है।
जुलाई 2026 में केंद्र सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सोयाबीन आधारित प्राकृतिक खेती प्रणालियों के पांच वर्षों के अध्ययन में उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। हालांकि प्राकृतिक खेती अपनाने से हर खेत में तुरंत अधिक पैदावार या मुनाफा मिलने की गारंटी नहीं है।
ICAR के मॉडल फार्म से क्या मिली नई जानकारी?
ICAR ने वर्ष 2020-21 से प्राकृतिक खेती पर एक व्यापक अनुसंधान कार्यक्रम शुरू किया। इसके अंतर्गत देश के 16 राज्यों में 20 सहयोगी केंद्रों के माध्यम से विभिन्न फसल प्रणालियों का अध्ययन किया जा रहा है।
इस शोध का उद्देश्य यह समझना है कि स्थानीय संसाधनों, जैविक प्रक्रियाओं और बेहतर फसल प्रबंधन की मदद से खेती को कितना किफायती और टिकाऊ बनाया जा सकता है। सरकार की 21 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार:
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मध्य प्रदेश के भोपाल और जबलपुर तथा छत्तीसगढ़ के रायपुर में सोयाबीन + मक्का, गेहूं + सरसों आधारित प्रणाली का अध्ययन किया गया।
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पांच वर्षों में प्राकृतिक खेती के अंतर्गत औसतन 3,346 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष की Soybean Equivalent System Productivity दर्ज की गई।
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यह उत्पादन स्तर एकीकृत फसल प्रबंधन और जैविक खेती की प्रणालियों के लगभग बराबर पाया गया।
ध्यान देने वाली बात यह है कि 3,346 किलोग्राम का आंकड़ा केवल सोयाबीन की प्रति हेक्टेयर पैदावार नहीं है। यह पूरे साल की फसल प्रणाली का सोयाबीन के बराबर आंका गया संयुक्त उत्पादन है।
प्राकृतिक खेती से सोयाबीन की उत्पादन लागत कैसे घट सकती है?
सोयाबीन की पारंपरिक खेती (Soybean Natural Farming) में उर्वरकों, खरपतवार नियंत्रण और फसल सुरक्षा पर काफी खर्च होता है। प्राकृतिक खेती में खेत पर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करके बाहर से खरीदे जाने वाले कुछ कृषि आदानों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जाता है।
ICAR के इंदौर स्थित राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने प्राकृतिक खेती के प्रयोगों में बीजामृत, घनजीवामृत, जीवामृत, ढैंचा की हरी खाद और मल्चिंग जैसी तकनीकों को शामिल किया है।
इन विधियों से मिट्टी में जैविक गतिविधियां बढ़ाने, नमी बनाए रखने और मिट्टी की संरचना में सुधार करने की संभावना रहती है। हालांकि इनका प्रभाव मिट्टी की मौजूदा उर्वरता, मौसम, पोषक तत्वों की उपलब्धता और प्रबंधन पर निर्भर करता है।
सोयाबीन की प्राकृतिक खेती में अपनाएं ये प्रमुख तकनीकें
1. बीज का सही उपचार (Seed Treatment)
प्राकृतिक खेती में बीजामृत का उपयोग एक पारंपरिक बीज उपचार विधि के रूप में किया जाता है। इसके साथ बीज की गुणवत्ता और स्थानीय रोगों के खतरे पर ध्यान देना जरूरी है। उपयुक्त जैविक उपचार के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सलाह लें।
2. जीवामृत और घनजीवामृत का उपयोग
इनका उपयोग प्राकृतिक खेती में मिट्टी की जैविक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाता है। इन्हें सभी आवश्यक पोषक तत्वों का पूर्ण विकल्प मानने के बजाय मिट्टी जांच और फसल की जरूरत के अनुसार उपयोग करना चाहिए।
3. मल्चिंग (Mulching)
खेत की सतह पर उपयुक्त फसल अवशेष बिछाने से पानी का वाष्पीकरण कम हो सकता है। इससे मिट्टी में नमी बनाए रखने और कुछ खरपतवारों की बढ़वार रोकने में सहायता मिलती है।
4. हरी खाद और फसल चक्र (Crop Rotation)
ढैंचा जैसी हरी खाद तथा उपयुक्त फसल चक्र से मिट्टी में जैविक पदार्थ और पोषण प्रबंधन में मदद मिल सकती है। एक ही खेत में लगातार सोयाबीन लगाने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल विविधीकरण लाभकारी हो सकता है।
क्या प्राकृतिक खेती से सोयाबीन की पैदावार भी बढ़ेगी?
किसानों के लिए सबसे जरूरी सवाल यही है कि रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने से कहीं उत्पादन घट तो नहीं जाएगा?इसका जवाब खेत की स्थिति और खेती के तरीके पर निर्भर करता है। कर्नाटक में सोयाबीन की प्राकृतिक, जैविक और पारंपरिक खेती की तुलना करने वाले एक अध्ययन में प्राकृतिक खेती की लागत कम मिली, लेकिन पारंपरिक खेती से शुद्ध लाभ अधिक प्राप्त हुआ।
अध्ययन के अनुसार प्राकृतिक खेती की उत्पादन लागत पारंपरिक खेती से लगभग 13.1 प्रतिशत कम थी। इसके बावजूद पारंपरिक खेती का Benefit-Cost Ratio अधिक पाया गया। इससे स्पष्ट है कि सिर्फ खेती की लागत घटाना पर्याप्त नहीं है, उपज को बनाए रखना भी जरूरी है।
प्रति एकड़ कितना मुनाफा मिल सकता है?
प्राकृतिक खेती की आर्थिक संभावनाओं को एक उदाहरण से समझ सकते हैं।
| विवरण | सामान्य खेती | प्राकृतिक खेती |
|---|---|---|
| उत्पादन (क्विंटल/एकड़) | 8 | 7.5 |
| उदाहरण बिक्री मूल्य (₹/क्विंटल) | ₹4,500 | ₹4,500 |
| कुल आमदनी | ₹36,000 | ₹33,750 |
| अनुमानित लागत | ₹20,000 | ₹15,000 |
| शुद्ध लाभ | ₹16,000 | ₹18,750 |
इस काल्पनिक उदाहरण में प्राकृतिक खेती से किसान को ₹2,750 प्रति एकड़ अधिक लाभ होता है, जबकि उत्पादन थोड़ा कम है। यह किसी ICAR मॉडल फार्म का वास्तविक आर्थिक परिणाम नहीं है। वास्तविक मुनाफा उत्पादन, स्थानीय बाजार भाव, मजदूरी, जैविक आदानों की उपलब्धता और मौसम के अनुसार अलग होगा।
सोयाबीन किसानों के लिए 2026 में क्या है नया?
ICAR के राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने वर्ष 2026 में भी सोयाबीन की उत्पादकता, टिकाऊ खेती, मिट्टी की सेहत और बीज उपचार से जुड़े शोध पर जोर दिया है। 9 जून 2026 को संस्थान की समीक्षा के दौरान ICAR महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने सोयाबीन की उपज में अंतर, मिट्टी के सख्त होने की समस्या, कृषि मशीनीकरण और बीज उपचार की प्रभावशीलता का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने की आवश्यकता बताई थी।
इसके अलावा ICAR संस्थान की उपलब्धियों में सोयाबीन आधारित फसल प्रणालियों के लिए प्राकृतिक खेती की विधियों के मानकीकरण का उल्लेख है। इससे आने वाले समय में किसानों को क्षेत्र विशेष के अनुसार अधिक विश्वसनीय तकनीकी सलाह मिल सकती है।
प्राकृतिक खेती अपनाने से पहले किसानों को क्या करना चाहिए?
किसानों को एक साथ पूरी जमीन पर नई पद्धति अपनाने के बजाय पहले छोटे हिस्से में परीक्षण करना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक एकड़ जमीन के दो हिस्सों में अलग-अलग खेती की विधियों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
इस दौरान बीज, श्रम, सिंचाई, पोषण प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और पैदावार का पूरा रिकॉर्ड रखें। इससे पता चलेगा कि वास्तविक बचत कहां हो रही है।
प्राकृतिक खेती में भी पोषक तत्वों की कमी, खरपतवार, रोग और कीट बड़ी चुनौती बन सकते हैं। सोयाबीन की फसल में जलभराव से बचाव, समय पर निराई और उचित जल निकासी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से संपर्क करके मिट्टी जांच और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सलाह ले सकते हैं।
सोयाबीन किसानों के लिए कितनी फायदेमंद है प्राकृतिक खेती?
सोयाबीन उत्पादन में प्राकृतिक खेती किसानों को कम बाहरी निवेश, बेहतर संसाधन प्रबंधन और टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर दे सकती है।
ICAR के अनुसंधान से यह संकेत मिलता है कि उचित तकनीकों के साथ कुछ सोयाबीन आधारित प्राकृतिक फसल प्रणालियां अन्य खेती प्रणालियों के तुलनीय उत्पादन स्तर तक पहुंच सकती हैं। लेकिन किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है कि कम लागत के साथ संतोषजनक पैदावार भी मिले। इसलिए प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक सलाह, खेत की परिस्थितियों और वास्तविक लागत-लाभ के आकलन के आधार पर अपनाना बेहतर रहेगा।
