देश में जल संरक्षण और वर्षा आधारित कृषि को अधिक वैज्ञानिक एवं प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (National Rainfed Area Authority – NRAA) ने विश्व बैंक समर्थित REWARD (Rejuvenating Watersheds for Agricultural Resilience through Innovative Development) कार्यक्रम के अंतर्गत “जलग्रहण योजना एवं निगरानी के लिए सैटेलाइट और ड्रोन आधारित सर्वे” विषय पर एक उच्चस्तरीय मंथन कार्यशाला का आयोजन जयपुर, राजस्थान में किया। कार्यशाला का उद्देश्य आधुनिक भू-स्थानिक (Geospatial) तकनीकों के माध्यम से जलग्रहण विकास योजनाओं को अधिक सटीक, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाना था।
यह कार्यशाला भूमि संसाधन विभाग (Department of Land Resources – DoLR) के ज्ञान साझेदार के रूप में NRAA द्वारा आयोजित की गई, जिसमें देशभर के विभिन्न राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, नीति निर्माता, उद्योग प्रतिनिधि तथा गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के विशेषज्ञों ने भाग लेकर अपने अनुभव और सुझाव साझा किए।
जलग्रहण विकास में तकनीक की बढ़ती भूमिका
कार्यशाला का शुभारंभ डॉ. सुसमा सुधिश्री, तकनीकी विशेषज्ञ (वाटरशेड डेवलपमेंट) एवं REWARD परियोजना प्रभारी, NRAA ने किया। उन्होंने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए जलग्रहण विकास कार्यक्रमों में आधुनिक तकनीकों का उपयोग समय की आवश्यकता बन गया है।
उन्होंने बताया कि सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन सर्वेक्षण जैसी तकनीकें न केवल जलग्रहण क्षेत्रों की सटीक मैपिंग करने में सक्षम हैं, बल्कि इनके माध्यम से भूमि उपयोग, जल संरचनाओं, मृदा संरक्षण कार्यों, वनस्पति आवरण तथा परियोजनाओं की प्रगति की वास्तविक समय में निगरानी भी संभव हो सकेगी।
राष्ट्रीय तकनीकी दिशा-निर्देशों में शामिल हों आधुनिक तकनीकें
कार्यशाला को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने कहा कि आगामी राष्ट्रीय तकनीकी दिशा-निर्देश (National Technical Guidelines – NTG) में स्पष्ट रूप से यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि जलग्रहण परियोजनाओं की योजना, क्रियान्वयन, निगरानी और मूल्यांकन के विभिन्न चरणों में सैटेलाइट आधारित सर्वेक्षण तथा ड्रोन तकनीक का उपयोग किस प्रकार और किन परिस्थितियों में किया जाए।
उन्होंने कहा कि भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की आवश्यकताएं अलग-अलग हैं। इसलिए ऐसी मानकीकृत कार्यप्रणाली विकसित करना आवश्यक है, जिससे सभी राज्यों में आधुनिक तकनीकों का प्रभावी और एकरूप उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
WDC-PMKSY 3.0 को मिलेगा तकनीकी आधार
विशेषज्ञों ने चर्चा के दौरान इस बात पर जोर दिया कि इस कार्यशाला से प्राप्त सुझावों को वाटरशेड डेवलपमेंट कंपोनेंट-प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (WDC-PMKSY 3.0) के लिए तैयार किए जा रहे राष्ट्रीय तकनीकी दिशा-निर्देशों में शामिल किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन और सैटेलाइट आधारित सर्वेक्षण के माध्यम से परियोजनाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा, समय की बचत होगी, लागत कम होगी तथा कार्यों की पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी। इसके साथ ही परियोजनाओं की वास्तविक प्रगति का आकलन पहले की तुलना में कहीं अधिक सटीक तरीके से किया जा सकेगा।
विभिन्न राज्यों और संस्थानों के विशेषज्ञों ने रखे सुझाव
कार्यशाला में राजस्थान सरकार के पंचायती राज विभाग के सचिव एवं आयुक्त डॉ. जोगा राम (आईएएस), आंध्र प्रदेश के वाटरशेड निदेशक वाई.वी.के. शन्मुख कुमार (IFS), राजस्थान की जलग्रहण विकास एवं मृदा संरक्षण निदेशक कल्पना अग्रवाल, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एमएनसीएफसी (MNCFC) के निदेशक डॉ. एस. बंद्योपाध्याय, महाराष्ट्र सरकार की मुख्य अभियंता एवं संयुक्त सचिव (मृदा एवं संरक्षण) सुशीला यादव सहित विभिन्न राज्यों, राष्ट्रीय संस्थानों, सरकारी विभागों, उद्योगों और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
प्रतिभागियों ने जलग्रहण विकास कार्यक्रमों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रिमोट सेंसिंग, जीआईएस मैपिंग, ड्रोन आधारित डेटा संग्रहण तथा डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम के उपयोग पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि भविष्य में इन तकनीकों का उपयोग केवल सर्वेक्षण तक सीमित न रहकर परियोजनाओं के मूल्यांकन, जल संसाधनों के प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी किया जाना चाहिए।
किसानों और जल संरक्षण को मिलेगा सीधा लाभ
विशेषज्ञों के अनुसार यदि जलग्रहण विकास योजनाओं में आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जाता है तो इससे वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, मृदा संरक्षण और कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार होगा। इससे विशेष रूप से वर्षा आधारित क्षेत्रों के किसानों को अधिक लाभ मिलेगा, क्योंकि बेहतर जल प्रबंधन के माध्यम से खेती की लागत घटेगी और उत्पादन क्षमता बढ़ेगी।
इसके अलावा परियोजनाओं की निगरानी डिजिटल माध्यम से होने के कारण कार्यों में पारदर्शिता बढ़ेगी और सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र किसानों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकेगा।
जलवायु परिवर्तन से निपटने में मिलेगी मजबूती
कार्यशाला में यह भी रेखांकित किया गया कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए भारत को ऐसी जलग्रहण विकास रणनीति अपनानी होगी, जो वैज्ञानिक आंकड़ों और आधुनिक तकनीकों पर आधारित हो। सैटेलाइट और ड्रोन आधारित सर्वेक्षण इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि REWARD कार्यक्रम के तहत विकसित होने वाली नई तकनीकी कार्यप्रणाली न केवल WDC-PMKSY 3.0 को मजबूत आधार प्रदान करेगी, बल्कि देशभर में जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ एवं जलवायु अनुकूल बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

