पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से जुड़ी अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता सामान्य बनी हुई है। सरकार की समय रहते अपनाई गई आयात विविधीकरण (Diversification), घरेलू उत्पादन बढ़ाने और प्रभावी लॉजिस्टिक प्रबंधन की रणनीति के कारण किसानों को उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई। यही कारण है कि खरीफ सीजन के मध्य तक देशभर में लगभग 17 मिलियन टन (MT) उर्वरकों की बिक्री हो चुकी है, जबकि पूरे खरीफ सीजन के लिए अनुमानित मांग लगभग 38 मिलियन टन है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्टॉक और उत्पादन क्षमता को देखते हुए आने वाले महीनों में भी किसानों को यूरिया, डीएपी (DAP), एनपीके (NPK) और पोटाश जैसे प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने में कोई बड़ी समस्या नहीं आएगी।
संकट के बीच भी मजबूत रही आपूर्ति व्यवस्था
पश्चिम एशिया में संघर्ष के दौरान सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका को लेकर थी। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक कच्चे माल की आपूर्ति का महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। इस मार्ग में व्यवधान आने से एलएनजी (LNG) और कई उर्वरक कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित हुई। भारत जैसे देश, जो उर्वरक उत्पादन के लिए आयातित प्राकृतिक गैस और कच्चे माल पर निर्भर हैं, उनके लिए यह चुनौती गंभीर हो सकती थी।
हालांकि सरकार ने समय रहते विभिन्न देशों से आयात के स्रोत बढ़ाए और घरेलू उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग किया। परिणामस्वरूप वर्तमान समय में देश के पास लगभग 14 मिलियन टन उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध है, जो आगामी महीनों की मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है।
खरीफ सीजन में तेजी से हुई बिक्री
खरीफ फसलों की बुआई के दौरान उर्वरकों की मांग सबसे अधिक रहती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस सीजन के मध्य तक किसानों को बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के माध्यम से लगभग 17 मिलियन टन उर्वरकों की बिक्री की जा चुकी है।
पिछले खरीफ सीजन (2025) में कुल 33.18 मिलियन टन उर्वरकों की बिक्री दर्ज की गई थी। इसमें—
- यूरिया – 19.3 MT
- डीएपी – 4.63 MT
- म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) – 1.09 MT
- एनपीके (NPK) – 8.14 MT
शामिल थे।
इस वर्ष भी बिक्री का रुझान दर्शाता है कि किसान सामान्य रूप से उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं और आपूर्ति प्रणाली सुचारु बनी हुई है।
यूरिया की उपलब्धता संतोषजनक
यूरिया भारत में सबसे अधिक उपयोग होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। चालू खरीफ सीजन में इसकी कुल मांग लगभग 19 मिलियन टन रहने का अनुमान लगाया गया है।
अब तक किसानों को 9.79 मिलियन टन यूरिया उपलब्ध कराया जा चुका है। वहीं सरकारी और कंपनियों के गोदामों में लगभग 6.87 मिलियन टन यूरिया का स्टॉक मौजूद है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उपलब्ध स्टॉक और आगामी उत्पादन को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े संकट की संभावना नहीं है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में मांग अधिक होने के कारण स्थानीय स्तर पर आपूर्ति प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा ताकि किसी जिले या राज्य में अस्थायी कमी की स्थिति न बने।
डीएपी का मजबूत स्टॉक किसानों के लिए राहत
डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की मांग खरीफ सीजन में विशेष रूप से धान, मक्का, सोयाबीन और अन्य फसलों के लिए अधिक रहती है।
इस वर्ष डीएपी की कुल अनुमानित मांग लगभग 6 मिलियन टन है।
अब तक लगभग 2.35 मिलियन टन डीएपी किसानों को उपलब्ध कराया जा चुका है, जबकि वर्तमान में 4.02 मिलियन टन डीएपी का स्टॉक उपलब्ध है।
यह आंकड़ा बताता है कि आने वाले महीनों में भी डीएपी की उपलब्धता संतोषजनक बनी रह सकती है, जिससे किसानों को बुवाई और फसल पोषण के दौरान कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
एनपीके उर्वरकों की भी पर्याप्त उपलब्धता
संतुलित पोषण के लिए एनपीके उर्वरकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। सरकार भी लंबे समय से संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा दे रही है ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे।
इस खरीफ सीजन में अब तक 4 मिलियन टन से अधिक एनपीके उर्वरकों की बिक्री हो चुकी है, जबकि कंपनियों के पास 4.51 मिलियन टन का स्टॉक उपलब्ध है।
यह स्थिति बताती है कि किसानों की मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त मात्रा में एनपीके उपलब्ध है और आपूर्ति श्रृंखला सामान्य बनी हुई है।
एलएनजी आपूर्ति प्रभावित होने से उत्पादन पर पड़ा असर
पश्चिम एशिया संकट के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से एलएनजी आपूर्ति प्रभावित हुई।
भारत में गैस आधारित यूरिया संयंत्रों के लिए एलएनजी प्रमुख कच्चा माल है। इसकी कमी के कारण मार्च और अप्रैल के पहले पखवाड़े में कुछ यूरिया संयंत्रों का उत्पादन प्रभावित हुआ।
हालांकि सरकार ने शीघ्र निर्णय लेते हुए स्पॉट मार्केट से एलएनजी खरीद की अनुमति दी। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में आई नरमी का भी लाभ मिला। परिणामस्वरूप अधिकांश संयंत्रों का उत्पादन अब सामान्य स्तर पर लौट आया है।
आयात स्रोतों में विविधता बनी सबसे बड़ी ताकत
सरकार ने संकट के दौरान केवल पारंपरिक देशों पर निर्भर रहने के बजाय कई नए देशों से उर्वरकों और कच्चे माल की खरीद बढ़ाई। इससे आपूर्ति बाधित नहीं हुई और वैश्विक कीमतों में तेजी के बावजूद किसानों को सब्सिडी वाली दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराए जा सके।
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सरकार ने वैश्विक बाजार में कीमतों में वृद्धि के बावजूद आयात स्रोतों का सफलतापूर्वक विविधीकरण किया, जिससे किसानों तक समय पर उर्वरक पहुंचाना संभव हो सका।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भी भारत को उर्वरक सुरक्षा के लिए इसी प्रकार बहु-स्रोत आयात नीति अपनानी होगी।
आयात पर अब भी बनी हुई है निर्भरता
भारत उर्वरकों की मांग का बड़ा हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा करता है, लेकिन कुछ प्रमुख उर्वरकों और कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता अभी भी काफी अधिक है।
वित्त वर्ष 2025-26 में देश की कुल उर्वरक खपत 70 मिलियन टन से अधिक रही, जबकि लगभग 28 मिलियन टन उर्वरकों का आयात किया गया।
इसी प्रकार पिछले वित्त वर्ष में लगभग 10 मिलियन टन यूरिया आयात किया गया था। इसके अलावा घरेलू यूरिया उत्पादन में प्रयुक्त एलएनजी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आयातित था।
यह स्थिति दर्शाती है कि भारत को दीर्घकाल में आत्मनिर्भर बनने के लिए घरेलू गैस उत्पादन, हरित अमोनिया, हरित हाइड्रोजन तथा नए यूरिया संयंत्रों पर निवेश बढ़ाने की आवश्यकता होगी।
सब्सिडी का बढ़ता बोझ सरकार के लिए चुनौती
वैश्विक बाजार में उर्वरकों और कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर सरकार के सब्सिडी बिल पर पड़ा है।
वित्त वर्ष 2025-26 में उर्वरक सब्सिडी बढ़कर लगभग ₹2.17 लाख करोड़ पहुंच गई, जबकि संशोधित अनुमान ₹1.86 लाख करोड़ था।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो वित्त वर्ष 2026-27 में वास्तविक सब्सिडी व्यय और अधिक हो सकता है।
सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि किसानों को सब्सिडी वाली दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराते हुए राजकोषीय बोझ को भी नियंत्रित रखा जाए।
आगे की राह
पश्चिम एशिया संकट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत जैसे बड़े कृषि देश के लिए उर्वरक सुरक्षा केवल आयात पर निर्भर रहकर सुनिश्चित नहीं की जा सकती। घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना, हरित अमोनिया एवं हरित हाइड्रोजन आधारित उर्वरक परियोजनाओं को गति देना, आयात स्रोतों में विविधता लाना तथा संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना भविष्य की प्रमुख रणनीतियां होंगी।
फिलहाल खरीफ सीजन के मध्य तक उपलब्ध आंकड़े संकेत देते हैं कि सरकार और उर्वरक कंपनियों की संयुक्त रणनीति सफल रही है। पर्याप्त स्टॉक, सामान्य उत्पादन और प्रभावी वितरण व्यवस्था के कारण किसानों को उर्वरकों की उपलब्धता बनी हुई है। यदि यही स्थिति आगामी महीनों में भी जारी रहती है, तो खरीफ फसलों के पोषण और उत्पादन पर पश्चिम एशिया संकट का असर सीमित रहने की संभावना है।

