भारत की कृषि आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उत्पादन बढ़ाने और मिट्टी की सेहत बचाने के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। पिछले कई दशकों में किसानों ने अधिक उत्पादन हासिल करने के लिए रासायनिक उर्वरकों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया है। इससे खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि तो हुई, लेकिन मिट्टी की गुणवत्ता, जैविक कार्बन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलन लगातार बिगड़ता गया।
इसी पृष्ठभूमि में बिहार सहित कई राज्यों में शुरू किया गया ‘खेत बचाओ अभियान’ काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य किसानों को रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग, मिट्टी परीक्षण, जैविक एवं प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग तथा वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूक करना है। सवाल यह है कि क्या यह अभियान वास्तव में भारतीय कृषि के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है?
मिट्टी की बिगड़ती सेहत एक गंभीर चुनौती
भारत में हरित क्रांति के बाद से यूरिया आधारित उर्वरकों का उपयोग तेजी से बढ़ा। कई राज्यों में किसान नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए यूरिया का अत्यधिक प्रयोग करने लगे, जबकि फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि कई कृषि क्षेत्रों में मिट्टी का पोषण संतुलन बिगड़ गया। भूमि की उर्वरता घटने लगी और उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को हर साल अधिक मात्रा में उर्वरक डालना पड़ रहा है। कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि मिट्टी में जैविक कार्बन का स्तर लगातार कम हो रहा है, जिससे जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है।
ऐसे समय में ‘खेत बचाओ अभियान’ मिट्टी को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि एक जीवंत संसाधन मानने की सोच को बढ़ावा देता है।
संतुलित उर्वरक उपयोग क्यों जरूरी है?
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल यूरिया के सहारे फसल उत्पादन को लंबे समय तक बनाए रखना संभव नहीं है। फसलों को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के साथ-साथ जिंक, सल्फर, बोरॉन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है।
जब किसान संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाते हैं, तो फसल की वृद्धि बेहतर होती है, उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ती है और उत्पादन लागत भी नियंत्रित रहती है। इसके अलावा मिट्टी की संरचना और उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है।
यदि ‘खेत बचाओ अभियान’ किसानों को इस दिशा में सफलतापूर्वक जागरूक कर पाता है, तो इसका सीधा लाभ कृषि उत्पादन और किसानों की आय दोनों पर दिखाई दे सकता है।
मिट्टी परीक्षण को मिलेगा बढ़ावा
इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू मिट्टी परीक्षण को प्रोत्साहित करना है। आज भी देश के लाखों किसान बिना मिट्टी की जांच कराए अनुमान के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करते हैं।
मिट्टी परीक्षण के माध्यम से यह पता लगाया जा सकता है कि खेत में किस पोषक तत्व की कमी है और किसकी अधिकता। इससे किसान आवश्यकता के अनुसार उर्वरक उपयोग कर सकते हैं।
यदि अभियान के तहत गांव स्तर पर मिट्टी परीक्षण सुविधाओं का विस्तार किया जाता है और किसानों को नियमित सॉयल हेल्थ कार्ड की जानकारी दी जाती है, तो उर्वरकों की अनावश्यक खपत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उर्वरक सब्सिडी पर भी पड़ सकता है असर
भारत सरकार हर वर्ष उर्वरक सब्सिडी पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है। यूरिया की अत्यधिक खपत के कारण सब्सिडी का बोझ लगातार बढ़ता रहा है।
यदि किसान संतुलित उर्वरक उपयोग अपनाते हैं और पोषक तत्व आधारित खेती की ओर बढ़ते हैं, तो यूरिया की खपत में कमी आ सकती है। इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटेगा और उर्वरकों का अधिक वैज्ञानिक उपयोग सुनिश्चित होगा।
यह पहल केवल कृषि सुधार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
किसानों के सामने मौजूद चुनौतियां
हालांकि अभियान का उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन इसकी सफलता कई व्यावहारिक चुनौतियों पर निर्भर करेगी।
सबसे बड़ी चुनौती किसानों की आदतों में बदलाव लाना है। वर्षों से कई किसान एक ही प्रकार की उर्वरक उपयोग प्रणाली अपनाते आ रहे हैं। उन्हें नई तकनीकों और वैज्ञानिक सिफारिशों को अपनाने के लिए निरंतर प्रशिक्षण और भरोसेमंद सलाह की आवश्यकता होगी।
इसके अलावा जैविक खाद, सूक्ष्म पोषक तत्वों और विशेष उर्वरकों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी। यदि किसानों को आवश्यक उत्पाद समय पर नहीं मिलेंगे, तो अभियान का प्रभाव सीमित रह सकता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ेगा महत्व
आज जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़ और बढ़ते तापमान का असर सीधे खेती पर पड़ रहा है।
स्वस्थ मिट्टी जल संरक्षण में मदद करती है और फसलों को प्रतिकूल मौसम का सामना करने की बेहतर क्षमता प्रदान करती है। जिन खेतों में जैविक पदार्थ अधिक होता है, वहां मिट्टी नमी को लंबे समय तक बनाए रख सकती है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो ‘खेत बचाओ अभियान’ केवल मिट्टी संरक्षण का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने का भी एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
क्या पूरे देश में मिल सकता है लाभ?
यदि बिहार और अन्य राज्यों में यह अभियान सफल रहता है, तो इसे राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है।
भारत के कई कृषि प्रधान राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी मिट्टी की गुणवत्ता और पोषक तत्व असंतुलन गंभीर मुद्दा बनते जा रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में इस तरह के जागरूकता कार्यक्रम किसानों को टिकाऊ खेती की दिशा में प्रेरित कर सकते हैं।
हालांकि केवल अभियान चलाने से लक्ष्य हासिल नहीं होगा। इसके साथ मिट्टी परीक्षण सुविधाओं का विस्तार, कृषि विस्तार सेवाओं की मजबूती, डिजिटल सलाह, किसान प्रशिक्षण और गुणवत्तापूर्ण कृषि आदानों की उपलब्धता भी जरूरी होगी।
निष्कर्ष
‘खेत बचाओ अभियान’ भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, संतुलित और वैज्ञानिक बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। यदि इसे केवल जागरूकता कार्यक्रम तक सीमित न रखकर व्यवहारिक स्तर पर लागू किया जाए, तो यह मिट्टी की सेहत सुधारने, उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने, उत्पादन लागत घटाने और किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत की कृषि का भविष्य केवल अधिक उत्पादन में नहीं, बल्कि स्वस्थ मिट्टी और टिकाऊ खेती में छिपा है। ऐसे में ‘खेत बचाओ अभियान’ आने वाले वर्षों में कृषि सुधार की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है, बशर्ते इसे निरंतरता, संसाधन और किसानों की सक्रिय भागीदारी का समर्थन मिले।
