देश में किसानों द्वारा नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (NPK) उर्वरकों के उपयोग पर अधिक ध्यान दिया जाता है, लेकिन जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की अनदेखी अब कृषि उत्पादन के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि कई राज्यों की मिट्टी में जिंक और बोरॉन की कमी लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा असर फसलों की वृद्धि, गुणवत्ता और कुल उत्पादन पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य में उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों को भी नुकसान हो सकता है।
भारत की कृषि व्यवस्था लंबे समय तक मुख्य रूप से NPK आधारित उर्वरक उपयोग पर केंद्रित रही है। इससे जहां फसलों को प्रमुख पोषक तत्व तो मिलते रहे, वहीं कई क्षेत्रों में सूक्ष्म पोषक तत्वों जिंक और बोरॉन का संतुलन बिगड़ गया। आज स्थिति यह है कि देश के अनेक हिस्सों में मिट्टी परीक्षण के दौरान जिंक और बोरॉन की कमी सामान्य रूप से देखने को मिल रही है।
क्यों जरूरी हैं जिंक और बोरॉन?
जिंक और बोरॉन भले ही पौधों को बहुत कम मात्रा में चाहिए होते हैं, लेकिन इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
जिंक पौधों में एंजाइमों की सक्रियता, क्लोरोफिल निर्माण, प्रोटीन संश्लेषण और नई कोशिकाओं के विकास में मदद करता है। इसकी कमी होने पर पौधों की वृद्धि धीमी पड़ जाती है, पत्तियां छोटी रह जाती हैं और कई बार उनका रंग हल्का पीला दिखाई देने लगता है।
दूसरी ओर, बोरॉन फूल बनने, परागण, फल बनने, कोशिका विभाजन और शर्करा के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी होने पर फूल और फल झड़ सकते हैं, दानों का विकास प्रभावित होता है और उपज में कमी आने लगती है।
किन फसलों पर सबसे अधिक असर?
विशेषज्ञों के अनुसार जिंक और बोरॉन की कमी का प्रभाव लगभग सभी फसलों पर पड़ सकता है, लेकिन कुछ फसलें इससे अधिक प्रभावित होती हैं।
धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, कपास, सरसों, सोयाबीन, दालें, मूंगफली, आलू, प्याज, टमाटर और कई बागवानी फसलों में इन सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलन अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
फलों और सब्जियों में बोरॉन की कमी से गुणवत्ता प्रभावित होती है, जबकि जिंक की कमी पौधों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता दोनों को कम कर सकती है।
क्यों बढ़ रही है कमी?
कृषि विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण बताते हैं।
सबसे बड़ा कारण है लगातार एक जैसी खेती और अधिक उत्पादन लेने की कोशिश। हर वर्ष फसलें मिट्टी से सूक्ष्म पोषक तत्वों को निकालती रहती हैं, लेकिन किसान अक्सर उनकी भरपाई नहीं करते।
इसके अलावा—
- केवल NPK उर्वरकों का अधिक उपयोग।
- जैविक खाद का घटता प्रयोग।
- मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी।
- उच्च उत्पादक किस्मों द्वारा अधिक पोषक तत्वों का उपयोग।
- असंतुलित उर्वरक प्रबंधन।
- मिट्टी परीक्षण के बिना उर्वरक डालना।
ये सभी कारण मिलकर जिंक और बोरॉन की कमी को बढ़ा रहे हैं।
उत्पादन पर क्या पड़ता है असर?
जब पौधों को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं मिलते, तब केवल उपज ही नहीं घटती बल्कि गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
कई बार किसान अधिक यूरिया डालकर समस्या को दूर करने की कोशिश करते हैं, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी केवल नाइट्रोजन से पूरी नहीं हो सकती।
विशेषज्ञों के अनुसार जिंक और बोरॉन की कमी के कारण—
- पौधों की वृद्धि रुक जाती है।
- जड़ विकास कमजोर होता है।
- फूल और फल कम बनते हैं।
- दानों का भराव प्रभावित होता है।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है।
- उत्पादन और गुणवत्ता दोनों कम हो जाते हैं।
इससे किसानों की आय पर भी सीधा असर पड़ता है।
मिट्टी परीक्षण का बढ़ा महत्व
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी खेत में जिंक या बोरॉन डालने से पहले मिट्टी की जांच कराना सबसे बेहतर तरीका है।
मिट्टी परीक्षण से यह पता चल जाता है कि कौन-सा पोषक तत्व किस मात्रा में उपलब्ध है और किसकी कमी है। इसके आधार पर सही मात्रा में उर्वरक देने से लागत भी कम होती है और फसल को संतुलित पोषण मिलता है।
सरकार भी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को मिट्टी परीक्षण के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
संतुलित पोषण ही समाधान
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल जिंक या बोरॉन ही नहीं, बल्कि सभी पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
आज की आधुनिक खेती में 4R Nutrient Stewardship यानी—
- सही उर्वरक (Right Source)
- सही मात्रा (Right Rate)
- सही समय (Right Time)
- सही तरीका (Right Place)
को अपनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
इससे पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है और उत्पादन भी बेहतर मिलता है।
जिंक और बोरॉन उर्वरकों की मांग बढ़ रही
सूक्ष्म पोषक तत्वों के महत्व को देखते हुए बाजार में जिंक सल्फेट, बोरेट आधारित उर्वरकों और विभिन्न माइक्रोन्यूट्रिएंट मिश्रणों की मांग लगातार बढ़ रही है।
कई उर्वरक कंपनियां अब फसल-विशिष्ट माइक्रोन्यूट्रिएंट पैकेज भी विकसित कर रही हैं, ताकि किसानों को संतुलित पोषण उपलब्ध कराया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में माइक्रोन्यूट्रिएंट उर्वरकों का बाजार और तेजी से बढ़ सकता है।
कृषि विस्तार सेवाओं की भूमिका
कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और राज्य कृषि विभाग किसानों को संतुलित पोषण के बारे में लगातार जागरूक कर रहे हैं।
प्रशिक्षण कार्यक्रमों, खेत प्रदर्शन और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों को बताया जा रहा है कि केवल NPK पर्याप्त नहीं है। सूक्ष्म पोषक तत्व भी उतने ही आवश्यक हैं।
यदि किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करें तो कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
भविष्य की दिशा
जलवायु परिवर्तन, बढ़ती खाद्य मांग और सीमित कृषि भूमि को देखते हुए अब उत्पादन बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और संतुलित पोषण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की कृषि केवल अधिक उर्वरक डालने पर नहीं, बल्कि सही पोषक तत्व, सही मात्रा और सही समय पर आधारित होगी। जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
निष्कर्ष
जिंक और बोरॉन की कमी आज भारतीय कृषि के सामने उभरती हुई एक महत्वपूर्ण चुनौती है। इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की अनदेखी के कारण कई क्षेत्रों में फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। केवल NPK उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषण अपनाना होगा। यदि जिंक, बोरॉन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो उत्पादन बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और किसानों की आय में सुधार लाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की जा सकती है।
