भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल और उत्पादक बनाने की दिशा में The Fertiliser Association of India (एफएआई) एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रहा है। देश में जैव उर्वरकों और जैव-उत्तेजकों (बायोस्टिमुलेंट्स) के बढ़ते महत्व को देखते हुए एफएआई 11 से 14 मई 2026 तक अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के श्री विजय पुरम (पोर्ट ब्लेयर) में चार दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेगा। “कृषि स्थिरता के लिए जैव उर्वरक” विषय पर आधारित यह कार्यक्रम पीयरलेस रिजॉर्ट, कॉर्बिन्स कोव में आयोजित किया जाएगा।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम विशेष रूप से उर्वरक और कृषि-व्यवसाय क्षेत्र से जुड़े मध्यम और वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों के लिए तैयार किया गया है। इसमें जैव उर्वरक उत्पादन, बायोस्टिमुलेंट्स, कृषि सेवाओं, विपणन, सामग्री प्रबंधन तथा एग्री-बिजनेस से जुड़े पेशेवर भाग लेंगे। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को जैव उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग, नई तकनीकों और पोषण प्रबंधन रणनीतियों के बारे में व्यावहारिक जानकारी प्रदान करना है।
कार्यक्रम में एफएआई के महानिदेशक Dr. Suresh Kumar Chaudhari प्रतिभागियों को संबोधित करेंगे। वे जैव उर्वरकों और टिकाऊ कृषि से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपने अनुभव और विशेषज्ञता साझा करेंगे। उनके व्याख्यान में सरकार की ऑर्गेनिक उर्वरकों से संबंधित नीतियां, जैव उर्वरक एवं बायोस्टिमुलेंट्स का महत्व, इस क्षेत्र में नई तकनीकें और नवाचार, तथा फसल-विशिष्ट उपयोग जैसे विषय शामिल होंगे।
डॉ. चौधरी प्रतिभागियों को यह भी बताएंगे कि खेत स्तर पर पोषक तत्व प्रबंधन रणनीतियों में जैव उर्वरकों को किस प्रकार प्रभावी ढंग से शामिल किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, जबकि जैव उर्वरक मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषि क्षेत्र में नई सोच और व्यवहारिक बदलाव लाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत में जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि की ओर किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है। केंद्र और राज्य सरकारें भी रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने तथा टिकाऊ कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने पर जोर दे रही हैं। जैव उर्वरक न केवल मिट्टी की सेहत सुधारते हैं, बल्कि पौधों की वृद्धि, पोषक तत्व अवशोषण और फसल उत्पादकता बढ़ाने में भी सहायक होते हैं। इसके अलावा ये जल और भूमि प्रदूषण को कम करने में भी मदद करते हैं। इसी कारण कृषि विशेषज्ञ इन्हें भविष्य की खेती का महत्वपूर्ण आधार मान रहे हैं।
एफएआई द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम पारंपरिक व्याख्यान शैली से अलग इंटरैक्टिव और चर्चा-आधारित शिक्षण पद्धति पर केंद्रित होगा। प्रतिभागियों को केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं दी जाएगी, बल्कि उन्हें वास्तविक कृषि परिस्थितियों से जुड़े केस स्टडी, व्यवहारिक अनुभव और समस्या समाधान आधारित प्रशिक्षण भी मिलेगा। इससे वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सीखी गई तकनीकों और रणनीतियों को प्रभावी ढंग से लागू कर सकेंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत जैसे कृषि प्रधान देश में टिकाऊ खेती की दिशा में जैव उर्वरकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की घटती उर्वरता और उत्पादन लागत में वृद्धि जैसी चुनौतियों के बीच जैव उर्वरक किसानों के लिए किफायती और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बनकर उभर रहे हैं। यही कारण है कि उर्वरक उद्योग और कृषि कंपनियां इस क्षेत्र में तेजी से निवेश कर रही हैं तथा नई तकनीकों को अपनाने पर जोर दे रही हैं।
The Fertiliser Association of India की स्थापना वर्ष 1955 में हुई थी और आज यह देश के उर्वरक क्षेत्र की प्रमुख गैर-लाभकारी संस्था मानी जाती है। यह संस्था उर्वरक निर्माताओं, आयातकों, तकनीकी प्रदाताओं, उपकरण आपूर्तिकर्ताओं और कृषि शोधकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करती है। एफएआई का उद्देश्य उर्वरक क्षेत्र की कार्यकुशलता बढ़ाना, संतुलित एवं वैज्ञानिक उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना तथा देश की कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना है।
एफएआई उद्योग और सरकार के बीच सेतु की भूमिका भी निभाता है। संस्था नीति निर्माण में सुझाव देने, तकनीकी अध्ययन कराने, प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने का कार्य करती है। इसके चार क्षेत्रीय कार्यालय, तकनीकी प्रभाग और अनुसंधान गतिविधियां उर्वरक क्षेत्र में निरंतर सुधार के लिए काम कर रही हैं। संस्था द्वारा प्रकाशित शोध पत्रिकाएं और तकनीकी सामग्री भी नीति निर्धारण और उद्योग विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पोर्ट ब्लेयर में आयोजित होने वाला यह प्रशिक्षण कार्यक्रम देश में जैव उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे कृषि पेशेवरों को नई तकनीकों और आधुनिक पोषण प्रबंधन रणनीतियों की बेहतर समझ मिलेगी, जिसका लाभ अंततः किसानों और कृषि क्षेत्र को होगा। आने वाले समय में इस प्रकार की पहलें भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

