भारत में मानव-जनित गतिविधियों के कारण भूमि क्षरण की समस्या कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। सरकार के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) द्वारा प्रकाशित भारत के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस-2021 के मुताबिक वर्ष 2018-19 तक देश में 6.38 लाख हेक्टेयर मरुस्थलीकृत और भूमि क्षरित क्षेत्र मानव-जनित था। हालांकि, सरकार ने भूमि क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि और फसल उत्पादकता पर इसके प्रत्यक्ष प्रभाव का कोई अलग आकलन नहीं किया है।
कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी और श्री बाबूभाई जेसंगभाई देसाई के प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।
सरकार के अनुसार, भूमि क्षरण से निपटने, मृदा उर्वरता बहाल करने, जल संरक्षण, सतत भूमि प्रबंधन और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।
महाराष्ट्र में भूमि क्षरण का क्षेत्र सबसे अधिक
सरकार की ओर से जारी राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में 14,306,029 हेक्टेयर भूमि भूमि क्षरण से प्रभावित बताई गई है। वहीं देश में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र राजस्थान में दर्ज किया गया है, जहां यह आंकड़ा 21,237,669 हेक्टेयर है।
राज्यवार आंकड़ों के अनुसार गुजरात में 10,248,057 हेक्टेयर, कर्नाटक में 6,959,847 हेक्टेयर, झारखंड में 5,482,260 हेक्टेयर, ओडिशा में 5,359,014 हेक्टेयर और मध्य प्रदेश में 3,859,735 हेक्टेयर भूमि प्रभावित बताई गई है।
सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक कुल 97,854,851 हेक्टेयर क्षेत्र भूमि क्षरण से प्रभावित है।
हालांकि, यह आंकड़ा कुल भूमि क्षरण प्रभावित क्षेत्र का है और इसे सीधे कृषि भूमि के नुकसान या फसल उत्पादन में हुई कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार ने स्पष्ट किया है कि भूमि क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि और फसल उत्पादकता पर इसके प्रभाव का कोई अलग आकलन नहीं किया गया है।
मृदा उर्वरता बहाल करने पर जोर
भूमि क्षरण के प्रभाव को कम करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अलग-अलग क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुरूप कई तकनीकों को विकसित और अनुशंसित किया है।
इनमें कंटूर खेती, अंतरफसल, फसल चक्रण, संरक्षण कृषि, मल्चिंग, हरित खाद, कम जुताई और कृषि वानिकी जैसी तकनीकें शामिल हैं। इनका उद्देश्य मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने, मृदा उर्वरता सुधारने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में मदद करना है।
लवण प्रभावित मिट्टी के प्रबंधन के लिए भी ICAR ने विभिन्न उपायों की सिफारिश की है। इनमें जिप्सम का प्रयोग, बायो-ड्रेनेज, उपसतह जल निकासी, लवण-सहिष्णु फसल किस्में और बायो-रिमेडिएशन उपाय शामिल हैं। इसके अलावा, लवण-सहिष्णु घासों के उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों के इस्तेमाल पर जोर
सरकार ने मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए सामान्य उर्वरक अनुशंसाएं (GFR) और मृदा परीक्षण फसल प्रतिक्रिया (STCR) आधारित अनुशंसाएं भी विकसित की हैं।
इन अनुशंसाओं को राज्यों के साथ साझा किया गया है, ताकि किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
इससे मृदा उर्वरता में सुधार, मृदा जैविक कार्बन बढ़ाने और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
जल संरक्षण के लिए वाटरशेड प्रबंधन
भूमि क्षरण को रोकने और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
ICAR द्वारा सुझाए गए उपायों में बायो-इंजीनियरिंग तकनीक, समोच्च एवं श्रेणीबद्ध बांध, पत्थर के बांध, समोच्च एवं क्रमिक ट्रेंच, बेंच टेरेस, चेक डैम और खेत तालाब तथा सामुदायिक तालाब जैसी जल संचयन संरचनाएं शामिल हैं।
इन उपायों का उद्देश्य वर्षा जल का संरक्षण करने के साथ मिट्टी के कटाव को कम करना और कृषि भूमि में नमी बनाए रखना है।
651 जिलों में जलवायु अनुकूल कृषि पर काम
सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के माध्यम से जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA) परियोजना को 651 जिलों में लागू कर रही है। इस परियोजना के तहत कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है तथा जिला स्तर पर जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन किया जाता है।
सरकार के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील के रूप में पहचाने गए 310 जिलों में 201 जिले ‘उच्च’ और 109 जिले ‘बहुत उच्च’ जलवायु-संवेदनशील श्रेणी में रखे गए हैं।
मौसम की असामान्य परिस्थितियों से निपटने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जलवायु अनुकूल फसलों, किस्मों और कृषि प्रबंधन तकनीकों की सिफारिश के लिए इन 651 जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएं (DACP) भी तैयार की गई हैं।
धान की खेती में जलवायु अनुकूल तकनीकों का प्रदर्शन
किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सक्षम बनाने के लिए कई स्थान-विशिष्ट तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इनमें धान गहनता प्रणाली (SRI), एरोबिक राइस, डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) और फसल अवशेषों का इन-सीटू प्रबंधन शामिल हैं।
NICRA के तहत 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 151 अतिसंवेदनशील जिलों के 448 जलवायु अनुकूल गांवों में जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।
किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने और जलवायु परिवर्तन के प्रति उनकी अनुकूलन क्षमता बढ़ाने के लिए ग्राम स्तर पर बीज बैंक और सामुदायिक नर्सरी को भी सहायता दी जा रही है।
वहीं, ग्राम जलवायु जोखिम प्रबंधन समितियों (VCRMC) के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
10 वर्षों में 2,900 नई किस्में जारी
सरकार ने बताया कि ICAR ने वर्ष 2014 से 2024 के दौरान 2,900 किस्में जारी की हैं। इनमें से 2,661 किस्में एक या अधिक जैविक और/या अजैविक दबावों के प्रति सहनशील हैं।
इन किस्मों के विकास से सूखा, लवणता, तापमान में बदलाव और अन्य जैविक एवं अजैविक दबावों जैसी परिस्थितियों में किसानों को अधिक अनुकूल कृषि विकल्प उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
‘प्रति बूंद अधिक फसल’ से जल उपयोग दक्षता को बढ़ावा
कृषि में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा प्रति बूंद अधिक फसल योजना लागू की जा रही है। इसके तहत खेत स्तर पर ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाता है।
इसके अलावा, वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास योजना के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को कम करने और कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए एकीकृत कृषि प्रणालियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सॉयल हेल्थ एंड फर्टिलिटी योजना के माध्यम से राज्यों को उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने में सहायता दी जा रही है।
जैविक और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा
सरकार परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के माध्यम से जैविक खेती तथा राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के माध्यम से प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रही है।
इसके अलावा, दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन के माध्यम से फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
एकीकृत बागवानी विकास मिशन, कृषि वानिकी और राष्ट्रीय बांस मिशन भी कृषि क्षेत्र में जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देने वाले महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल हैं।
फसल नुकसान की भरपाई के लिए बीमा सुरक्षा
प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु संबंधी जोखिमों से किसानों को होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) तथा मौसम सूचकांक आधारित पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू कर रही है।
इन योजनाओं के माध्यम से फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को बीमा कवर उपलब्ध कराया जाता है, जिससे प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु संबंधी जोखिमों के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई में सहायता मिलती है।
ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों में जल संरक्षण को प्राथमिकता
सरकार के अनुसार, विकसित भारत-रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन-ग्रामीण (VB-G RAM-G) के तहत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (NRM) कार्यों के माध्यम से जल संरक्षण गतिविधियों को प्राथमिकता दी जाती है।
इन कार्यक्रमों के तहत अनुमत 318 कार्यों में से 110 कार्य जल सुरक्षा और जल संरक्षण में सुधार से जुड़े हैं।
इसके अलावा, भूमि संसाधन विभाग के वाटरशेड प्रबंधन प्रभाग द्वारा देशभर में वर्षा सिंचित और निम्नीकृत भूमि के विकास के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के वाटरशेड विकास घटक (WDC-PMKSY) को लागू किया जा रहा है।
इसके तहत रिज एरिया ट्रीटमेंट, ड्रेनेज लाइन ट्रीटमेंट, मृदा एवं नमी संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नर्सरी निर्माण, चरागाह विकास और भूमिहीन लोगों के लिए आजीविका सहायता जैसी गतिविधियां की जाती हैं।
सरकार के अनुसार, इन उपायों से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में सुधार के साथ किसानों की जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है।
कृषि उत्पादन में भी दर्ज हुई बढ़ोतरी
सरकार ने यह भी बताया कि जैविक और अजैविक दबावों से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद कृषि क्षेत्र ने पिछले दशक में फसल उत्पादकता और कुल कृषि उत्पादन में लगातार वृद्धि दर्ज की है।
देश का खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 2014-15 में 252.03 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 357.73 मिलियन टन हो गया।
इसी अवधि में बागवानी उत्पादन 280.98 मिलियन टन से बढ़कर 370.73 मिलियन टन हो गया।
सरकार के अनुसार, ये आंकड़े देशभर में कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप कृषि क्षेत्र की अनुकूलन क्षमता को दर्शाते हैं।
भूमि क्षरण से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति
भूमि क्षरण कृषि क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक चुनौती है। इसका समाधान केवल मिट्टी के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, कृषि वानिकी, जलवायु अनुकूल किस्मों, सूक्ष्म सिंचाई और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को एक साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
सरकार द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी से स्पष्ट है कि कृषि उत्पादकता को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन तथा भूमि क्षरण के प्रभावों को कम करने के लिए अनुसंधान से लेकर किसान प्रशिक्षण और खेत स्तर की तकनीकों तक कई कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं।
हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भूमि क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि और फसल उत्पादकता पर इसके प्रत्यक्ष प्रभाव का अलग से आकलन अभी नहीं किया गया है।

