देश में शीत जल मत्स्य पालन की अपार संभावनाओं को सतत और प्रभावी तरीके से विकसित करने के उद्देश्य से मत्स्य पालन विभाग, भारत सरकार द्वारा श्रीनगर के एसकेआईसीसी में राष्ट्रीय शीत जल मत्स्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन भारत में शीत जल मत्स्य क्षेत्र की संभावनाओं, चुनौतियों और विकास के अवसरों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संवाद के रूप में सामने आया।
सम्मेलन के साथ एक विशेष प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसमें शीत जल मत्स्य पालन से जुड़ी नवीनतम तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण इनपुट और आधुनिक प्रबंधन पद्धतियों को प्रदर्शित किया गया। इस प्रदर्शनी में 17 संस्थानों, सरकारी एजेंसियों, उद्योग जगत और प्रगतिशील उद्यमों ने भाग लिया। इसमें राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड, जम्मू-कश्मीर का मत्स्य विभाग, SKUAST-जम्मू, नाबार्ड, आईसीएआर-केंद्रीय शीत जल मत्स्य अनुसंधान संस्थान सहित कई निजी और सहकारी संस्थाएं शामिल रहीं। इन संस्थानों ने आधुनिक तकनीकों, ट्राउट मछली पालन से जुड़े नवाचारों और गुणवत्तापूर्ण फीड से संबंधित उत्पादों का प्रदर्शन किया।
सम्मेलन के दौरान विभिन्न तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें अनुसंधान एवं नवाचार, नई तकनीकों को अपनाने, बुनियादी ढांचे के विस्तार, संस्थागत समन्वय और उद्यमिता विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। इन सत्रों की अध्यक्षता मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलाक्ष लिखी ने की, जबकि संयुक्त सचिव (अंतर्देशीय मत्स्य) सागर मेहरा और आईसीएआर के उपमहानिदेशक (मत्स्य) डॉ. जे. के. जेना सह-अध्यक्ष के रूप में उपस्थित रहे। इन सत्रों में शिक्षाविदों, उद्योग प्रतिनिधियों, विशेषज्ञों, उद्यमियों और प्रगतिशील मछली किसानों ने सक्रिय भागीदारी की।
सम्मेलन के दौरान डॉ. अभिलाक्ष लिखी ने उद्यमियों और हितधारकों के साथ संवाद करते हुए जम्मू-कश्मीर और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में शीत जल मत्स्य पालन की जमीनी संभावनाओं और चुनौतियों के बारे में जानकारी प्राप्त की। मछली किसानों ने कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए, जिनमें रोग परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना, गुणवत्तापूर्ण बीज की नियमित उपलब्धता, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों की आवश्यकता तथा जलवायु-अनुकूल बीज विकसित करने जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
उत्तराखंड के उलगाजना समिति के सचिव प्रवेश बिष्ट ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में जल प्रदूषण, प्रयोगशाला सुविधाओं की कमी और बारिश के दौरान रेसवे में ऑक्सीजन की कमी जैसी समस्याएं अक्सर सामने आती हैं। वहीं खैबर एक्वाकल्चर के क़ैसर कौनेनैन ने कहा कि शीत जल मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए उद्यमिता को मजबूत करना, विभिन्न योजनाओं तक आसान पहुंच और उत्पादन-आधारित आधुनिक व्यापार मॉडल अपनाना जरूरी है।
हैदराबाद स्थित स्मार्ट ग्रीन एक्वाकल्चर के संस्थापक आदित्य रित्विक नर्रा ने बताया कि तकनीकी नवाचार और व्यावसायिक स्तर पर व्यापक अपनाने की कमी के कारण शीत जल मछली उत्पादन अभी सीमित है। उन्होंने इस क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों और कुशल मानव संसाधन के विकास पर जोर दिया।
चार तकनीकी सत्रों के दौरान विभिन्न हितधारकों ने सुझाव दिया कि शीत जल राज्यों में रेनबो ट्राउट मछली के लिए बहु-राज्य सहकारी संस्था बनाई जानी चाहिए। इसके साथ ही अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने, गुणवत्तापूर्ण बीज और ब्रूडस्टॉक की उपलब्धता बढ़ाने तथा रोग जांच और जैव-सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
सम्मेलन में यह भी सुझाव दिया गया कि निर्यात गुणवत्ता के मानकों को पूरा करने के लिए शीत जल राज्यों में एफएसएसएआई मानकों के अनुरूप प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन इकाइयों की स्थापना की जाए। इसके लिए आधुनिक कोल्ड-चेन नेटवर्क, आईक्यूएफ और ब्लास्ट-फ्रीजिंग जैसी सुविधाओं के विकास की जरूरत बताई गई, जिससे मछली उत्पादों के नुकसान को कम किया जा सके और किसानों की आय बढ़ाई जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस सम्मेलन से प्राप्त सुझाव और सिफारिशें देश में शीत जल मत्स्य पालन क्षेत्र के विकास, रोजगार सृजन और निर्यात संभावनाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

